जसोदा नंगे पाँव चलती थी, चप्पल हाथ में लेकर। रबर के नीचे ज़मीन का ताप महसूस नहीं होता, और झरिया में ज़मीन का ताप ही ख़बर है। भोर के अँधेरे में वह बस्ती की गलियों से गुज़रती, हर दरार पर पंजा रखती, और जहाँ गरमी पिछले हफ़्ते से बढ़ी होती वहाँ चूने से एक गोला बना देती। गोले के भीतर तारीख़। यह काम उसे किसी ने नहीं दिया था। कंपनी का सर्वे साल में एक बार आता है। बस्ती को हर रोज़ चाहिए था।
झरिया के नीचे कोयला सौ साल से जल रहा है। आग बुझती नहीं, बस जगह बदलती रहती है। कहीं दरार से धुआँ उठता है, कहीं गंधक की बू आती है, कहीं जाड़े की सुबह ज़मीन इतनी गरम होती है कि लोग उस पर बैठकर हाथ सेंक लेते हैं। कंपनी वालों ने कई दरवाज़ों पर सफ़ेद रंग से नंबर लिख दिए थे। नंबर का मतलब था कि यह घर सूची में है और किसी दिन बेलगड़िया भेजा जाएगा। किस दिन, यह नंबर नहीं बताता था।
जसोदा के दरवाज़े पर भी नंबर था, इक्यावन। उसका आदमी बारह साल पहले खदान में नहीं, बुख़ार में मरा था, और तब से घर उसी के नाम चलता था। बस्ती में सब जानते थे कि घर छोड़ने का मतलब दावा छोड़ना है। जो चला गया, उसका नाम सूची से हट गया। इसलिए लोग गरम ज़मीन पर सोते रहे। डर के मारे नहीं। हिसाब के मारे।
जब परछाइयाँ जिंदा हुईं
पूस की एक रात वह पानी लेने उठी तो गली के सिरे पर उजियारा दिखा। आग की रोशनी नारंगी होती है और काँपती है। यह नहीं काँप रहा था। वह पास गई और देखा कि दरार वहीं थी जहाँ बरसों से थी, और उसमें से हवा आ रही थी। ठंडी हवा। झरिया में ठंडी दरार वैसी ही बात है जैसी नदी में सूखा।
ग्यारह दिन बाद उसी सिरे पर ज़मीन बैठ गई। रात में, बिना आवाज़ के। सुबह देखा तो गली के बीच एक गड्ढा था और उसके भीतर से भाप उठ रही थी। किसी का नुक़सान नहीं हुआ, सिर्फ़ एक ठेला उसमें गिरा था। लोग दो दिन बात करते रहे, फिर भूल गए। जसोदा नहीं भूली।
दूसरी बार उजियारा मुहर्रम के बाद वाले हफ़्ते में दिखा, चौथी गली में, कुएँ के पीछे। उसने आदत से चूने का गोला बना दिया। नौ दिन बाद वहाँ की दीवार गिरी। तीसरी बार छह दिन लगे। उसने कॉपी में तीन तारीख़ें लिखीं और उनके सामने तीन और तारीख़ें, और फिर बीच का फ़र्क़ गिना। ग्यारह। नौ। छह।
उसने वार्ड वाले हरिनंदन को बताया। हरिनंदन ने पूरी बात सुनी, सिर हिलाया, और रजिस्टर में लिख लिया कि औरत को रात में रोशनी दिखती है। फिर उसने पूछा कि रोशनी किस रंग की थी। जसोदा ने कुछ देर सोचा और कहा कि रंग नहीं था। हरिनंदन हँसा नहीं। यही सबसे बुरा था। उसने बस रजिस्टर बंद कर दिया।
एक बार उसने रुक्मिनी को समझाने की कोशिश की, जिसके घर के सामने उजियारा दो रात दिखा था। रुक्मिनी के पास तीन महीने का बच्चा था। उसने जसोदा की बात पूरी सुनी और फिर पूछा कि जाएँ कहाँ। सर्वे में उनका नंबर नहीं आया था, और बिना नंबर के बेलगड़िया में कमरा नहीं मिलता। इसका जवाब जसोदा के पास नहीं था। रुक्मिनी वहीं रही, और उस बार ज़मीन उसके घर के नीचे नहीं, दो घर आगे बैठी। किसी ने इसे जसोदा की बात से नहीं जोड़ा।
आधी रात के बाद
संक्रांति से एक रात पहले उजियारा हैंडपंप के पास दिखा। बस्ती का मीठा पानी वही एक था और भोर में वहाँ चालीस औरतें लाइन लगाती थीं। संक्रांति की सुबह और भी ज़्यादा, क्योंकि तिलकुट और खिचड़ी के लिए पानी सबसे पहले चाहिए होता है। जसोदा ने कॉपी नहीं खोली। उसे तीनों अंक याद थे। ग्यारह, नौ, छह। अगला अंक उसे नहीं पता था।
चिल्लाकर लोगों को हटाया नहीं जा सकता था। रजिस्टर में उसका नाम पहले से दर्ज था, रोशनी देखने वाली औरत। कोई सुन भी लेता तो सुबह तक भूल जाता। बस्ती को उस गली से दूर रखने का सिर्फ़ एक तरीक़ा था, और वह उसे जानती थी।
उसने घर से हथौड़ा उठाया और हैंडपंप का हत्था तोड़ दिया। लोहा पहली चोट में नहीं टूटा। तीसरी में टूटा। आवाज़ पूरी बस्ती में गई और कोई बाहर नहीं आया, क्योंकि झरिया में रात की आवाज़ें आम हैं। फिर वह वहीं बैठ गई, टूटे हत्थे के पास।
भोर में औरतें आईं। पहले हैरानी, फिर गुस्सा। रुक्मिनी ने पूछा कि अब बच्चे को क्या पिलाए। किसी ने कहा कि जसोदा का दिमाग़ हिल गया है और यह बात नई नहीं है। भीड़ हत्थे के चारों तरफ़ जमा होने लगी, ठीक उसी जगह जहाँ से उसे हटाना था। तब जसोदा ने टूटा हुआ हत्था उठाया और चलने लगी।
भीड़ पीछे आई, गाली देती हुई। वह चलती रही, मोड़ तक, फिर उससे आगे, और रुकी नहीं। पीछे गली ख़ाली हो गई।
आवाज़ वैसी नहीं थी जैसी उसने सोच रखी थी। कोई धमाका नहीं हुआ। ज़मीन ने बस साँस छोड़ी, जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ आख़िरकार बैठ गई हो। हैंडपंप उसी में चला गया और उसके साथ गली का वह हिस्सा भी, जहाँ एक मिनट पहले चालीस औरतें खड़ी थीं। गड्ढे से जो हवा उठी वह गरम नहीं थी। वह सफ़ेद थी। जसोदा उससे सबसे नज़दीक थी।
उसे पीछे खींच लिया गया, पर तब तक पाँव जल चुके थे। धनबाद के अस्पताल में उन्नीस दिन लगे। तलवों की खाल गई, और उसके साथ वह चीज़ भी चली गई जिससे वह ज़मीन पढ़ती थी। अब वह चप्पल पहनती है। पहननी पड़ती है।
बस्ती में यह तय हुआ कि हैंडपंप उस रात अपने आप टूटा और इसी से सबकी जान बची। कुछ लोग कहते हैं कि जसोदा ने तोड़ा था, पर वे भी यही कहते हैं कि उसने गुस्से में तोड़ा। सर्वे वाले महीने भर बाद आए और उस गली पर लाल निशान लगा गए। रुक्मिनी का नंबर अब भी नहीं आया है।
जसोदा अब भोर में नहीं निकलती। खिड़की से दिख जाता है, इतना काफ़ी है। पिछले जाड़े में उसने फिर देखा, सातवीं गली में, स्कूल की दीवार के पास। उसने किसी को नहीं बताया, क्योंकि बताने से कुछ होता नहीं, और कॉपी में सिर्फ़ तारीख़ लिख ली। उस तारीख़ के सामने वाला ख़ाना उसने ख़ाली छोड़ रखा है।