रात के दो बजकर चालीस मिनट पर इकतालीस नंबर फिर घूमने लगी। मुरुगन गाड़ी की छत पर लेटा हुआ था और उसने आवाज़ से पहचान लिया।

पवनचक्की का सिर हवा की तरफ़ अपने आप घूमता है। ऊपर एक छोटा-सा पंखा लगा रहता है जो बताता है कि हवा किधर से है, और नीचे यॉ की मोटरें पूरे सिर को उसी तरफ़ कर देती हैं। उस घूमने की अपनी आवाज़ होती है, लोहे के दाँतों की, धीमी और बराबर।

मुप्पंदल में तीन सौ से ऊपर मशीनें हैं और रात में उनकी आवाज़ें अलग-अलग सुनाई देती हैं। मई का आख़िरी हफ़्ता था और हवा शुरू हो चुकी थी।

यहाँ हवा मौसम की तरह आती है। पश्चिमी घाट में अरलवायमोषि के पास पहाड़ों में एक दरार है और मानसून की हवा उसी दरार से निकलकर इस मैदान में आती है, इक्कीस-बाईस मीटर प्रति सेकंड, मई से सितंबर तक, दिन-रात एक ही तरफ़ से।

पश्चिम से। उस रात भी पश्चिम से थी। तीन सौ मशीनों के सिर पश्चिम की तरफ़ थे। इकतालीस नंबर का सिर पूरब की तरफ़ था। मुरुगन बत्तीस बरस का था और सात साल से इसी फ़ील्ड में था। सर्विस टीम में कुल चार लोग थे। रात की ड्यूटी बारी-बारी पड़ती थी।

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उसने पहली बार यह चार दिन पहले देखा था।

उस रात उसने सोचा कि हवा का पंखा ख़राब हो गया होगा। ऐसा होता है। पंखे में नमक जम जाता है, वह अटक जाता है, और मशीन ग़लत दिशा पकड़ लेती है। यहाँ समुद्र पास है। पर ख़राब पंखे वाली मशीन एक जगह अटक जाती है। यह अटकी नहीं थी।

यह रोज़ रात दो बजकर चालीस मिनट पर घूमती थी, पश्चिम से पूरब, पूरा एक सौ अस्सी अंश, और सुबह छह बजे के आसपास वापस पश्चिम की तरफ़ आ जाती थी। इसका एक और मतलब था और वही असल में ख़तरनाक था।

मशीन के अंदर बिजली के मोटे केबल ऊपर से नीचे तक जाते हैं। सिर हर बार एक ही तरफ़ घूमता रहे तो वे केबल मुड़ते जाते हैं, जैसे रस्सी में बल पड़ता है। इसीलिए मशीन गिनती रखती है और तय चक्करों के बाद ख़ुद को उलटा घुमाकर बल निकाल देती है। यह अपने आप होता है।

इकतालीस नंबर पाँच रात से एक ही तरफ़ बल डाल रही थी और उसकी उलटी घुमाई चल नहीं रही थी। केबल टूटता है तो वह अस्सी मीटर ऊपर टूटता है और खंभे के अंदर गिरता है। और अगली सुबह उस खंभे में कोई चढ़ता है।

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कन्नन सर को उसने दूसरे दिन ही बताया था। उन्होंने कहा कि वेंडर को लिखेंगे। वेंडर की टीम अगले हफ़्ते चेन्नई से आती। अगले हफ़्ते तक केबल टूट चुका होता।

सुबह की टीम में सेल्वम था, तेईस बरस का, तीन महीने पुराना, और उसके साथ दो और लड़के जो उससे भी नए थे। इकतालीस नंबर उन्हीं की लाइन में पड़ती थी।

मुरुगन ने उस रात हार्नेस उठाया।

अकेले, रात में, चलती हवा में खंभे पर चढ़ना नियम के ख़िलाफ़ है। दो आदमी चाहिए, दिन चाहिए, और हवा की रफ़्तार पंद्रह से कम चाहिए। उस रात तीनों में से एक भी बात पूरी नहीं थी। उसने गाड़ी इकतालीस नंबर के नीचे लगाई और दरवाज़ा खोला।

अंदर अँधेरा और गूँज थी। खंभा लोहे का सिलेंडर है और उसके भीतर हर आवाज़ लौटकर आती है। सीढ़ी दीवार से सटी हुई ऊपर जाती है और बीच में तीन जगह आराम के प्लेटफ़ॉर्म हैं। रोशनी उसने अपनी जलाई। अस्सी मीटर चढ़ने में उसे इक्कीस मिनट लगे।

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चढ़ते वक़्त उसे ऊपर से वही आवाज़ आती रही, लोहे के दाँतों की, धीमी और बराबर। ऊपर नैसेल का हैच खोलकर वह अंदर घुसा।

नैसेल एक कमरे जितना होता है, गियरबॉक्स, जनरेटर, और पीछे की तरफ़ यॉ का हिस्सा। वह सीधा यॉ की तरफ़ गया, क्योंकि उसे मोटरों की सप्लाई काटनी थी और फिर हाथ से बल निकालना था। हवा बाहर तेज़ थी।

मोटरें ठंडी थीं।

उसने हथेली तीनों पर रखी। चलती हुई यॉ मोटर छूने लायक़ नहीं रहती। इतनी गरम हो जाती है। ये ठंडी थीं, जैसे कई घंटे से बंद हों। फिर उसने ब्रेक देखा। यॉ का ब्रेक लगा हुआ था। ब्रेक लगा हो तो सिर घूम नहीं सकता।

सिर घूम रहा था।

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मुरुगन वहीं बैठ गया और उसने अपना हाथ नैसेल की दीवार पर रखा। कंपन साफ़ महसूस हो रहा था और वह बहुत धीमा था, जैसे बहुत भारी चीज़ को कोई बहुत आराम से खिसका रहा हो। उसने सप्लाई काटी और बल हाथ से निकाला। यह काम उसने पूरा किया, क्योंकि वह इसीलिए ऊपर आया था।

उसमें चालीस मिनट लगे। जब वह ख़त्म हुआ तो सिर पूरब की तरफ़ ही था। जाने से पहले उसने पीछे का हैच खोला और बाहर देखा, उस तरफ़ जिस तरफ़ मशीन का मुँह था।

पूरब में दो किलोमीटर दूर पुरानी मशीनों की क़तार है। नब्बे के दशक की, छोटी, दो सौ पच्चीस किलोवाट वाली। उनमें से ज़्यादातर बीस बरस से बंद हैं और कई के पंखे उतर चुके हैं। उस लाइन में बिजली नहीं जाती।

तारों के बिना, ब्रेक के बिना, और किसी हवा के पंखे के बिना, उस क़तार की एक मशीन का सिर भी पूरब की तरफ़ नहीं था। वह पश्चिम की तरफ़ था, इकतालीस नंबर की तरफ़। और उसका खुला हुआ हब, जिस पर एक भी पंखा नहीं बचा था, धीरे-धीरे घूम रहा था।

मुरुगन ने हैच बंद किया और नीचे उतर आया। उतरने में उसे नौ मिनट लगे, जो चढ़ने से आधे से भी कम थे, और नीचे पहुँचकर उसने गाड़ी का दरवाज़ा बंद करके इंजन चालू रखा। सुबह सेल्वम की टीम आई। उन्हें कुछ भी असामान्य नहीं मिला। केबल ठीक था और गिनती शून्य पर थी।

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इकतालीस नंबर उसी साल बंद कर दी गई। वजह में लिखा गया कि यॉ का ढाँचा घिस चुका है। पंखे उतार लिए गए और खंभा वैसे ही खड़ा है, नंबर अब भी पढ़ा जाता है, और नैसेल का मुँह जिस तरफ़ उस रात रुका था उसी तरफ़ है। दो किलोमीटर पूरब में, पुरानी मशीनों की क़तार में, एक मशीन आज भी अपना सिर उसी की तरफ़ किए खड़ी है।