पंप की आवाज़ बंद हुई और जीवा उसी चुप्पी से जाग गया।
रण पर आवाज़ ही घड़ी होती है। पंप चलता रहे तो नींद आती रहती है। बंद हो जाए तो नींद उसी सेकंड टूटती है, चाहे आदमी कितना ही थका हो। उस रात वह दो बजे रुका। वह चटाई से उठा और झोंपड़ी के बाहर निकला।
छोटे रण में मई की रात ठंडी नहीं होती, बस दिन से कम गरम होती है। चारों तरफ़ सफ़ेद पपड़ी थी और उस पर तारों की रौशनी पड़कर ज़मीन को हल्का नीला कर रही थी। कोई पेड़ नहीं, कोई मोड़ नहीं, कोई दीवार नहीं। आठ महीने से यही सामने था।
अक्टूबर में वे रण पर आए थे, जैसे हर साल आते हैं। पानी सूख जाने के बाद, बैलगाड़ी और ट्रैक्टर पर सामान लादकर, चालीस किलोमीटर अंदर।
यहाँ कुआँ खोदा जाता है और नीचे से खारा पानी निकलता है। पंप उसे क्यारियों में भरता है, धूप उसे पचास दिन में सुखाती है, और नीचे नमक की परत जम जाती है। यही फ़सल है। जीवा की छह क्यारियाँ थीं और छठी अब तैयार होने के आख़िरी दिनों में थी।
पंप उसने छूकर देखा। डीज़ल था, पाइप ठीक था, पर वह चल नहीं रहा था। तीसरी बार खींचने पर वह चला।
लौटते वक़्त उसने ज़मीन देखी।
नमक की पपड़ी हर चीज़ का निशान रखती है। हवा न चले तो निशान हफ़्तों रहता है। उसकी अपनी चप्पल का निशान झोंपड़ी से पंप तक साफ़ बना हुआ था, बीस-पच्चीस क़दम, एक सीधी लाइन में। वह लाइन एक ही तरफ़ जा रही थी।
वापसी का निशान कहीं नहीं था, न उस रात का, न पहले किसी दिन का, हालाँकि वह उस पंप तक आठ महीने में सैकड़ों बार गया था और सैकड़ों बार लौटा था। जीवा दस मिनट वहीं खड़ा रहा। फिर वह झोंपड़ी लौट आया और सुबह तक जागता रहा।
सुबह उजाला होते ही उसने दोबारा देखा। दिन की रौशनी में निशान और साफ़ थे। जाने वाले क़दम बने हुए थे। लौटने वाले नहीं थे। और उसके अपने पैरों में चप्पल वही थी। वालजी ने कहा कि हवा ने आधे उड़ा दिए होंगे।
वालजी उसका साढ़ू था और चार मौसम से उसी के साथ था। दुबला आदमी, ज़्यादा बोलने वाला नहीं, और रण को जीवा से भी ज़्यादा जानने वाला। उसने बात हँसकर टाल दी, पर उस दोपहर वह दो बार उस लाइन के पास से घूमकर निकला।
हीरबाई ने कुछ नहीं पूछा। उसने बस बच्चों को उस तरफ़ जाने से मना कर दिया। मई के तीसरे हफ़्ते में मौसम बदलने लगा।
रण पर बादल दिखते ही आदमी का पेट गिरता है। बारिश की एक रात आठ महीने का काम घोल देती है। नमक पानी में वापस चला जाता है और मुकादम का दिया हुआ पेशगी वहीं का वहीं खड़ा रहता है।
जीवा ने अक्टूबर में भचु से पैंतालीस हज़ार लिए थे। उसमें से बीस हीरबाई के भाई के इलाज में गए थे और बाक़ी आठ महीने खाने में। बीस तारीख़ की शाम को पश्चिम से हवा चली और उसमें मिट्टी थी।
क्यारियों की मेड़ें कच्ची होती हैं। हवा और पानी उन्हें एक जगह से काटते हैं और फिर सब कुछ एक-दूसरे में मिल जाता है। तूफ़ान से पहले मेड़ों पर चलकर हर कमज़ोर जगह पर फावड़े से मिट्टी चढ़ानी पड़ती है।
छठी क्यारी सबसे दूर थी, झोंपड़ी से लगभग तीन किलोमीटर। और छठी क्यारी के आगे वह जगह थी जिसके बारे में वालजी ने चार दिन पहले बताया था।
उस दिन वालजी हद देखने गया था और लौटकर उसने कहा था कि उधर पुराना पाटा है, बहुत पुराना, और वहाँ जाने की ज़रूरत नहीं।
जीवा उधर गया था।
पुरानी क्यारी की पपड़ी नई पपड़ी से अलग होती है। रंग पीला पड़ जाता है और सतह पर छोटी-छोटी दरारें आ जाती हैं। वहाँ पंद्रह-बीस बरस से कोई नहीं आया था।
उसके बीचोंबीच एक मुरा खड़ा था।
नमक खींचने वाला लकड़ी का पुराना मुरा, जिसका डंडा नमक में इतना गहरा गड़ा था कि वह सीधा खड़ा था। ऐसे मुरे अब नहीं बनते। अब लोहे के आते हैं। और उसके पास पपड़ी में एक लंबा गड्ढा-सा था, आदमी जितना, जिसके ऊपर नमक दोबारा जम चुका था।
जीवा ने वहाँ खोदा नहीं। वह लौट आया था और उसने वालजी से भी इस पर बात नहीं की। अब बीस तारीख़ की रात थी और मेड़ें चलनी थीं। वालजी को उसने पंप और तीन नज़दीक की क्यारियाँ दीं। छठी उसने अपने पास रखी।
फावड़ा कंधे पर रखकर वह निकला। लालटेन उसने नहीं ली, क्योंकि हवा में लालटेन जलती नहीं है, और रण पर तारों में भी काम हो जाता है। पहले दो किलोमीटर हवा पीछे से आ रही थी। फिर वह छठी क्यारी पर पहुँचा और मेड़ पर चढ़ गया।
काम सीधा था और लंबा था। हर दस क़दम पर मेड़ को पैर से दबाकर देखो, जहाँ नरम लगे वहाँ फावड़े से दो-तीन बार मिट्टी चढ़ा दो, आगे बढ़ जाओ। पूरी क्यारी का चक्कर ऐसे में दो घंटे लेता है।
पहला चक्कर आधा होने पर उसे लगा कि मेड़ के दूसरी तरफ़, नीचे नमक पर, कोई साथ-साथ चल रहा है।
क़दम की आवाज़ नहीं थी। नमक पर चलने की अपनी आवाज़ होती है, काँच पर चलने जैसी, और वह आवाज़ नहीं आ रही थी। जो आ रहा था वह हवा से अलग था। जैसे कोई साँस ले रहा हो और उसे रोक-रोककर ले रहा हो।
जीवा ने गर्दन नहीं घुमाई। उसने फावड़ा चलाना बंद नहीं किया। दस क़दम, दबाओ, मिट्टी, आगे। दस क़दम, दबाओ, मिट्टी, आगे। जो साथ चल रहा था वह हमेशा उतना ही दूर रहा। न पास आया, न पीछे छूटा।
मेड़ का वह हिस्सा जो पुराने पाटे की तरफ़ पड़ता था, सबसे लंबा था। वहाँ उसे चौदह जगह मिट्टी चढ़ानी पड़ी और हर बार झुकना पड़ा। झुकते वक़्त आदमी की गर्दन अपने आप घूमती है। उसने चौदह बार अपनी गर्दन को रोका।
तीन बजे के आसपास हवा गिर गई और बारिश नहीं आई। जब वह मुड़कर वापस चला तो उसके साथ कोई नहीं था।
अगली सुबह उसने मेड़ के नीचे नमक पर देखा। वहाँ कुछ नहीं था, न निशान, न लकीर, कुछ भी नहीं, और नमक इतना सख़्त था कि उस पर उसका अपना फावड़ा भी निशान नहीं छोड़ रहा था।
मौसम उस साल बच गया। छब्बीस मई से कटाई शुरू हुई और छहों क्यारियों से मिलाकर एक सौ नब्बे टन नमक निकला, जो पिछले बरस से बीस टन ज़्यादा था।
छठी क्यारी की पपड़ी उठाते वक़्त एक जगह वह पूरे टुकड़े में उखड़ी, थाली जितनी बड़ी। उसके नीचे वाली सतह पर पैर का निशान बना हुआ था, एड़ी से उँगलियों तक पूरा, और वह जीवा के पैर से बड़ा था। उसने वह टुकड़ा तोड़ा नहीं और किसी को दिखाया भी नहीं। उसने उसे उसी तरह बोरी में डाला, बोरी का मुँह सिल दिया, और वह बोरी उसी दोपहर ट्रक पर चढ़कर चली गई।