आवाज़ छत्ते की थी और छत्ता कहीं नहीं था। हरिपद ने हाथ उठाकर बाक़ी तीनों को रोक दिया और ख़ुद कान लगाकर खड़ा रहा।
जीवित छत्ते की आवाज़ को कोई मौले भूल नहीं सकता। वह भिनभिनाहट नहीं होती। वह एक गहरी, बराबर चलने वाली गूँज होती है, जैसे बहुत दूर कोई मोटर चल रही हो, और वह हवा के साथ घटती-बढ़ती नहीं। वह बस चलती रहती है।
वह आवाज़ सामने थी, बीस-पच्चीस क़दम दूर। और रुक नहीं रही थी। सामने सुंदरी और गेवा के पेड़ थे और किसी डाल पर कुछ नहीं लटका था। मई का पहला हफ़्ता था और यह उनका तीसरा दिन था।
अप्रैल के आख़िर में परमिट निकलता है और सात दिन का मिलता है। कंपार्टमेंट का नंबर उसी पर लिखा होता है और उसी में घूमना होता है। हरिपद बाईस मौसम से यही करता आया था।
जाने से पहले वे गोसाबा के थान पर बोनबीबी को हाथ जोड़कर आए थे, जैसे सब आते हैं, चाहे हिंदू हों या मुसलमान। शंभु ने वहीं नाव की रस्सी की गाँठ भी बदली थी, क्योंकि पुरानी गाँठ पिछले मौसम की थी।
जंगल में चलना आसान नहीं होता। कीचड़ घुटनों तक आता है और उसमें से साँस वाली जड़ें नुकीली होकर ऊपर निकली रहती हैं। नंगे पैर उन पर पड़े तो तलवा चिर जाता है, और चप्पल कीचड़ खींच लेता है। जंगल जल्दी थका देता है।
इसलिए वे लाइन में चलते हैं, एक के पीछे एक, आगे वाले के पैर के निशान पर पैर रखते हुए। और सबसे पीछे वाला अपने सिर के पीछे मुखौटा बाँधकर चलता है।
यह इसलिए कि बाघ पीछे से आता है और मुँह देखकर नहीं आता। मुखौटा उसे रोकता है या नहीं, इस पर बहस बहुत हुई है। पीछे वाला फिर भी बाँधता है।
उस दिन सबसे पीछे फणी था।
पहले दो दिन ठीक गए थे। दो छत्ते मिले थे और कुल मिलाकर उन्नीस किलो शहद नाव पर पहुँच चुका था। तीसरा दिन अलग निकला। उस दिन वे अंदर की तरफ़ गए, जहाँ कीचड़ कम और ज़मीन थोड़ी ऊँची थी।
उसी रास्ते पर निताई ने पहला निशान देखा था। एक गेवा के तने पर दाव से तीन खाँचे कटे हुए थे, एक के नीचे एक।
मौले पेड़ पर निशान लगाते हैं ताकि दोबारा वहीं पहुँच सकें। पर तीन खाँचे वाला निशान अब कोई नहीं लगाता। विभाग ने अट्ठानबे में तरीक़ा बदल दिया था और तब से एक ही लंबी लकीर लगाई जाती है। वे खाँचे पुराने थे। छाल उनके किनारों पर मुड़कर मोटी हो चुकी थी।
निताई ने पूछा कि किसका होगा। हरिपद ने कहा कि चलो, और आगे बढ़ गया। अब दोपहर हो चुकी थी। आवाज़ अब भी वहीं थी।
वे धीरे-धीरे उस तरफ़ बढ़े। शंभु ने मशाल की गठरी सुलगा ली, क्योंकि छत्ता कहीं भी हो सकता था और मधुमक्खियाँ एक बार उठ जाएँ तो आदमी को कीचड़ में गिरा देती हैं। हवा बिलकुल नहीं थी। आवाज़ एक बूढ़े सुंदरी के पेड़ में थी।
उस पर कोई छत्ता नहीं था। न डाल पर, न तने पर, न ऊपर की किसी शाख़ पर। पेड़ मोटा था और उसके तने में ज़मीन से चार फ़ुट ऊपर एक कोटर था, आदमी के सिर जितना बड़ा। उसका मुँह काला था।
गूँज उसी कोटर के अंदर से आ रही थी। फणी ने कहा कि अंदर छत्ता होगा। ऐसा होता है, कभी-कभी मक्खियाँ खोखले में बैठ जाती हैं।
निताई की आँखों में वह चीज़ आ गई जो जवान मौले की आँखों में इस मौक़े पर आती है। खोखले का छत्ता बरसों पुराना हो सकता है। एक ही पेड़ से पचास-साठ किलो निकल सकता है। पूरा मौसम एक दोपहर में बन सकता है।
और हरिपद को उस दोपहर तक पैंतीस किलो और चाहिए था। नाव का डीज़ल, परमिट की फ़ीस और चार आदमियों का पेशगी, सब महाजन का दिया हुआ था और सब उन्नीस किलो से नहीं उतरता। उसने मशाल शंभु से ली और कोटर के मुँह के पास ले गया। बाक़ी तीनों पीछे हट गए।
धुआँ अंदर गया और वापस बाहर आ गया। अंदर से एक भी मक्खी नहीं निकली। गूँज वैसी की वैसी चलती रही, न तेज़ हुई, न धीमी। जीवित छत्ते में धुआँ जाते ही आवाज़ बदल जाती है। यह नहीं बदली। हरिपद ने मशाल थोड़ी और पास की और कोटर के अंदर देखा।
वह देर तक देखता रहा, शायद दस सेकंड, शायद उससे कम। फिर उसने मशाल नीचे कर ली और कहा, 'चलो।' निताई ने कहा कि एक बार मैं देख लूँ। 'चलो।'
उसने दाव कमर में खोंसा और मुड़ गया, और यह वह जगह थी जहाँ बहस नहीं होती। लाइन में सबसे आगे वाला जिधर चलता है उधर सब चलते हैं, क्योंकि जंगल में चार अलग-अलग राय का मतलब चार अलग-अलग आदमी होता है। चारों उसके पीछे मुड़ गए।
लौटते वक़्त निताई ने एक ही बात पूछी, और उस वक़्त पूछी जब वे तीनों उसके आगे थे और वह अकेला पीछे नहीं रह गया था।
'अंदर क्या था?'
हरिपद ने जवाब नहीं दिया। उसने बस इतना बताया कि कोटर का मुँह अंदर की तरफ़ से घिसा हुआ था, चारों तरफ़ से बराबर, जैसे कोई चीज़ बरसों से उसमें से आती-जाती रही हो। धूप ढलने लगी थी। कीचड़ में लौटने में तीन घंटे लगे।
आधे रास्ते में उन्हें ताज़ा पगचिह्न मिले, चार, उनकी अपनी लाइन को काटते हुए, और उनमें पानी अभी भर रहा था। बाघ उसी वक़्त उधर से निकला था और उसी तरफ़ गया था जिधर उनका छोटा रास्ता जाता था।
हरिपद ने लंबा रास्ता लिया।
उसका मतलब यह था कि वे भाटे तक नाव तक नहीं पहुँचेंगे और उन्हें एक रात जंगल के किनारे ऊँची ज़मीन पर बितानी पड़ेगी, और महाजन की एक दिन की डीज़ल और गिनी जाएगी। चारों ने वह रात पीठ से पीठ सटाकर काटी, बीच में मशाल जलाकर। किसी ने आँख नहीं लगाई। सुबह होते ही वे चल दिए।
उस मौसम में उनकी नाव उन्नीस किलो शहद लेकर लौटी।
लौटते वक़्त नाव में मुखौटे उतार दिए जाते हैं और गठरी में बाँध दिए जाते हैं। फणी ने अपना उतार दिया। हरिपद ने उसे लेकर अपने सिर के पीछे बाँध लिया और गोसाबा का घाट आने तक वैसे ही बैठा रहा, मुँह नाव के आगे की तरफ़ और मुखौटा जंगल की तरफ़, जो अब पीछे छूटता जा रहा था और जिसके और उसके बीच में सिर्फ़ खुला पानी बचा था।