पहला ख़ाली घड़ा उस बरस सावन की छठी रात को मिला। धरमवीर ने उसे उठाकर हिलाया और उसमें से कोई आवाज़ नहीं आई। उसका स्टैंड सैंतालीसवें किलोमीटर पर था।

काँवड़ का एक ही नियम सबसे ऊपर है। घड़े ज़मीन को नहीं छू सकते। हरिद्वार से पानी भरने के बाद, जब तक वह मंदिर में नहीं चढ़ता, काँवड़ नीचे नहीं रखी जाती। छू जाए तो पूरी यात्रा शुरू से करनी पड़ती है।

इसीलिए रास्ते भर स्टैंड बने रहते हैं।

लोहे के ढाँचे, आदमी की ऊँचाई से थोड़े ऊँचे, जिन पर काँवड़ें टिका दी जाती हैं और नीचे काँवड़िये बैठकर सुस्ता लेते हैं। ये स्टैंड सेवा वाले बनवाते हैं और सावन भर चलाते हैं। धरमवीर का परिवार यह ग्यारह बरस से कर रहा था। बिना नागा।

उसका स्टैंड सबसे अच्छी जगह पर था। खतौली से पहले, मोड़ के बाद, जहाँ चढ़ाई ख़त्म होती है और आदमी सबसे थका हुआ होता है। रात में वहाँ एक साथ डेढ़ सौ काँवड़ें टँगी रहती थीं। अच्छी जगह का मतलब सिर्फ़ भीड़ नहीं होता।

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जिस स्टैंड पर सबसे ज़्यादा लोग रुकते हैं, उसी के नाम से लोग चंदा देते हैं, और उसी परिवार की सेवा का नाम अगले बरस तक चलता है। धरमवीर के बाप ने वह जगह ली थी। घड़े ऊपर से मिट्टी और कपड़े से बंद किए जाते हैं।

हरिद्वार में भरने के बाद उन पर लाल कपड़ा बाँधकर, उस पर गीली मिट्टी लगाकर मुहर कर दी जाती है, ताकि रास्ते में पानी छलके नहीं और कोई हाथ न लगाए। मुहर टूटी हो तो पानी अशुद्ध माना जाता है।

छठी रात वाले उस घड़े की मुहर साबुत थी। मिट्टी की परत बिना दरार के थी, कपड़ा कसा हुआ था, और डोरी की गाँठ वैसी ही बँधी थी जैसी हरिद्वार में बाँधी जाती है।

घड़ा ख़ाली था। एक बूँद नहीं।

काँवड़िया बीस-बाईस बरस का लड़का था और वह रोने लगा। उसके साथ वाले उसे समझाने लगे कि कहीं रास्ते में रिस गया होगा। मिट्टी का घड़ा रिसता है, यह सही है। पर वह धीरे-धीरे रिसता है और बाहर से गीला रहता है।

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वह घड़ा बाहर से सूखा था। बिलकुल सूखा। धरमवीर ने उस रात यह बात दबा दी। उसने लड़के को अपने पैसे से हरिद्वार की बस में बिठा दिया, जहाँ से वह दोबारा भरकर आ सकता था। सातवीं रात दो घड़े निकले।

आठवीं को एक भी नहीं। नौवीं को तीन निकले। दसवीं रात तक धरमवीर ने गिनना छोड़ दिया और सोचना शुरू कर दिया। एक बात साफ़ थी। ऐसा हर काँवड़ के साथ नहीं हो रहा था। डेढ़ सौ में से दो-तीन।

और दूसरी बात इससे भी साफ़ थी। ख़ाली घड़े हमेशा एक ही तरफ़ वाले खंभे पर टँगी काँवड़ों के निकलते थे। स्टैंड के पश्चिमी सिरे पर, आख़िरी चार खाँचों में। उसने ग्यारहवीं रात वे चारों खाँचे ख़ाली रखे। किसी को टाँगने नहीं दिया।

उस रात एक भी घड़ा ख़ाली नहीं निकला। बारहवीं रात उसने वहाँ फिर काँवड़ें टँगने दीं और उस रात दो निकले। अब उसके सामने वह सवाल था जिसका कोई अच्छा जवाब नहीं था।

बताने का मतलब यह होता कि रात में तीन हज़ार लोग, थके हुए, हाईवे पर, यह सुनते कि उनका पानी ग़ायब हो रहा है। सावन की उन रातों में हाईवे पर भगदड़ का मतलब लाशें होता है और यह उस रास्ते पर पहले हो चुका है।

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न बताने का मतलब भी साफ़ था। तेरहवीं की रात, तीन बजे, जब स्टैंड लगभग ख़ाली था, धरमवीर वहाँ अकेला गया। उसके हाथ में अपना घड़ा था। भरा हुआ। वह उसी शाम हरिद्वार से नहीं आया था। उसने अपने घर के हैंडपंप का पानी भरा था, कपड़ा बाँधा था, और मिट्टी लगाकर उसी तरह मुहर की थी।

उसने उसे पश्चिमी सिरे के आख़िरी खाँचे में टाँग दिया। फिर वह नीचे बैठ गया। और देखता रहा।

हाईवे पर उस वक़्त भी गाड़ियाँ चल रही थीं और लाउडस्पीकर कहीं दूर से बज रहा था। ऊपर पानी की हल्की बूँदें पड़ रही थीं। स्टैंड के लोहे पर वे बजती हैं और उसकी अपनी आवाज़ होती है। बीच में कुछ देर के लिए वह आवाज़ बंद हो गई।

बारिश नहीं रुकी थी। धरमवीर के अपने कंधों पर बूँदें पड़ती रहीं। सिर्फ़ लोहे पर से आवाज़ गई। चुप्पी लगभग चालीस सेकंड रही। उसके बाद वह वापस आ गई और बाक़ी रात वैसी ही रही। सुबह चार बजे उसने अपना घड़ा उतारा। दोनों हाथों से।

मुहर साबुत थी। कपड़ा कसा हुआ था। घड़ा हल्का था।

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धरमवीर ने उस बरस की बाक़ी यात्रा उसी तरह चलाई, पर पश्चिमी सिरे के चार खाँचों में उसने रस्सी बाँधकर उन्हें बंद कर दिया और वहाँ किसी को काँवड़ नहीं टाँगने दी।

अगले बरस उसने स्टैंड चार सौ मीटर आगे लगवाया। उसी सावन से।

उसने अर्ज़ी में कारण यह लिखा कि पुरानी जगह पर बरसात का पानी भरता है, जो सच था। नई जगह मोड़ से पहले पड़ती है, जहाँ चढ़ाई अभी बाक़ी होती है और आदमी रुकता नहीं। वहाँ रात भर में पचास-साठ काँवड़ें टँगती हैं, डेढ़ सौ नहीं।

चंदा उसके बाद कभी उतना नहीं आया और सेवा में उसके परिवार का नाम धीरे-धीरे पीछे चला गया। जो घड़ा उस रात उसने टाँगा था, वह उसे घर ले आया।

वह उसके घर की उसी ताक़ पर रखा है जहाँ पूजा का सामान रहता है। उस पर मिट्टी की मुहर आज भी लगी हुई है और डोरी की गाँठ वैसी ही बँधी है। धरमवीर ने उसे कभी नहीं खोला, और इसकी वजह वह बताता नहीं, क्योंकि खोलने पर जो निकलेगा वह दोनों में से जो भी हो, उसके बाद उसे उस जगह के बारे में कुछ न कुछ मानना ही पड़ेगा।