रात तीन बजे उस सड़क पर कुछ भी नहीं होता। हुकम ने छड़ बाहर खींची और उस पर गीलापन उससे ऊपर तक था जितना होना चाहिए था। उसने उसे कपड़े से पोंछा और दोबारा डाला।

टंकी नापने का तरीक़ा सौ बरस से एक ही है। लकड़ी की लंबी छड़, नीचे पीतल की टोपी, ऊपर इंच के निशान। छेद में सीधी उतारो, तली छूने दो, और एक ही झटके में निकाल लो। जहाँ तक गीली हो, उतना तेल है।

दूसरी बार भी वही निकला। पौने चार इंच ज़्यादा। पंप जैसलमेर वाली सड़क पर था, पोकरण से पैंतीस किलोमीटर आगे, और उसके चारों तरफ़ कुछ नहीं था। दिन में वहाँ ट्रक रुकते थे, फ़ौज की गाड़ियाँ निकलती थीं, और गर्मियों में हवा ऐसी चलती थी कि शेड की टीन रात भर बजती रहती थी।

रात की पाली अकेले की होती है। आठ बजे से आठ बजे तक। हुकम को यह नौकरी करते तीन साल हो चुके थे।

रात तीन बजे का वक़्त सबसे ख़ाली होता है। उस वक़्त वह टंकी नापता था, क्योंकि तब कोई गाड़ी नहीं आती और तेल हिलता नहीं। हिलता हुआ तेल ठीक नाप नहीं देता। दो महीने से नाप ज़्यादा आ रही थी।

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यह उलटी बात है और इसीलिए वह परेशान था।

टंकी में तेल कम निकले तो वजह ढूँढ़ी जाती है। लीकेज, चोरी, मीटर की गड़बड़, कुछ न कुछ मिल जाता है। किसी को यह नहीं सिखाया जाता कि तेल ज़्यादा निकले तो क्या करें, क्योंकि ऐसा होता नहीं। पहले हफ़्ते आधा इंच था। फिर एक। अब पौने चार।

पौने चार इंच का मतलब उस टंकी में लगभग ग्यारह सौ लिटर होता है। उसने तेजाराम को बताया था।

तेजाराम पंप का मालिक था और शहर में रहता था। उसने कहा कि छड़ फूल गई होगी, लकड़ी है, नमी खा जाती है। हुकम ने कहा कि यहाँ नमी कहाँ से आएगी। तेजाराम ने कहा कि टंकी बैठ गई होगी, ज़मीन धँसती है।

फिर उसने वह कहा जो असल बात थी। 'रजिस्टर में मीटर वाला नंबर लिख। छड़ वाला मत लिख।' हुकम ने वही किया, क्योंकि नौकरी थी। पर नापना उसने बंद नहीं किया। चार तारीख़ को टैंकर आना था।

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यही असली दिक़्क़त थी। टैंकर बारह हज़ार लिटर लेकर आता है और वह पूरा उतारा जाता है। अगर टंकी में सच में ग्यारह सौ लिटर ज़्यादा पड़ा है, तो वह भरते वक़्त ऊपर तक आ जाएगा और चेंबर में फैलेगा।

चेंबर में डीज़ल फैलने का मतलब सबको मालूम है। पंप बंद, जुर्माना, और अगर उस वक़्त कोई गाड़ी स्टार्ट हो जाए तो उससे भी ज़्यादा। तीन तारीख़ की रात हुकम ने ढक्कन खोला।

टंकी ज़मीन के नीचे है और उसके ऊपर एक कंक्रीट का चेंबर होता है, आदमी के बैठने जितना गहरा, जिसमें भरने का मुँह और नापने का छेद खुलते हैं। ढक्कन लोहे का है और उसे उठाने के लिए दो आदमी चाहिए।

उसने अकेले उठाया, सरिये को अड़ाकर। अंदर से जो हवा निकली वह भारी थी।

डीज़ल की भाप हवा से भारी होती है और चेंबर में नीचे बैठी रहती है। उसमें उतरने से पहले ढक्कन खोलकर आधा घंटा छोड़ना पड़ता है, और तब भी टॉर्च चिंगारी वाली नहीं होनी चाहिए। यह सब हुकम जानता था। हर साल कोई न कोई इन्हीं चेंबरों में जाता है।

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उसने आधा घंटा नहीं छोड़ा। उसने दस मिनट छोड़े। फिर वह अंदर उतरा।

अंदर बैठने की जगह थी, बस। घुटने छाती तक आ रहे थे। दीवारों पर तेल की पुरानी परत जमी थी और सिर के ऊपर पंप की बत्तियों का उजाला एक चौकोर टुकड़े में दिख रहा था। उसने नापने वाला ढक्कन खोला और टॉर्च नीचे की।

तेल की सतह दिखी। वह हिल नहीं रही थी। रुका हुआ तेल आईने जैसा हो जाता है और उसमें टॉर्च का गोला साफ़ बनता है। उस सतह पर धूल की एक परत थी।

थार की वही महीन धूल, जो हर चीज़ पर बैठती है। वह पूरी सतह पर फैली हुई थी, किनारे से किनारे तक, बिना किसी दरार के, बिना किसी लकीर के। हुकम बहुत देर तक उसे देखता रहा।

जिस तेल में से हर रात दो-तीन हज़ार लिटर खींचा जाता है, उसकी सतह पर धूल नहीं बैठ सकती। सतह हर बार गिरती है, हर बार हिलती है, और जो ऊपर बैठा हो वह किनारों पर चिपक जाता है। यह परत हिली नहीं थी।

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उसने अपनी छड़ उठाई और सतह को छुआ।

धूल फटी और छड़ के चारों तरफ़ एक गोला बन गया, और उस गोले के बाहर बाक़ी परत वैसी की वैसी रही, और हुकम ने छड़ बाहर खींच ली और उसके बाद चेंबर में एक मिनट भी नहीं बैठा। ऊपर आकर उसने ढक्कन लगाया और शेड के खंभे से टिककर बैठ गया।

सुबह टैंकर आया।

हुकम ने उसे उतारने नहीं दिया। उसने ड्राइवर से कहा कि आज नहीं, कल आना, और वजह नहीं बताई। ड्राइवर सौ किलोमीटर से आया था और उसने गालियाँ दीं और चला गया।

तेजाराम दोपहर को पहुँचा।

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उसने चिल्लाकर पूछा कि टैंकर क्यों लौटाया, हुकम से जवाब नहीं बना, और उसकी उस महीने की तनख़्वाह से आठ सौ काट लिए गए। उसे यह भी बता दिया गया कि अगली बार कोई और आ जाएगा।

अगले दिन टैंकर दोबारा आया और उतरा। टंकी नहीं भरी। भरने में उतना ही तेल गया जितना जाना चाहिए था और चेंबर सूखा रहा। उस रात तीन बजे हुकम ने छड़ डाली और नाप बिलकुल सही निकली।

उसके बाद वह दो साल और उसी पंप पर रहा। हर रात तीन बजे उसने नापा और नाप हर रात सही रही। छड़ पर विभाग के इंच के निशान अब भी हैं, और उन सबसे नीचे एक और निशान है, चाकू से खुरचकर बनाया हुआ, जो हुकम ने उसी रात बनाया था, और वह अकेला निशान है जो उस छड़ पर किसी आदमी ने अपने हाथ से बनाया है।