मुकेश के गाँव से बाहर निकलने का एक ही सीधा रास्ता था, और वह कब्रिस्तान के पास से होकर जाता था। दिन में यह कोई बात नहीं थी। शाम के बाद लोग घूमकर जाते, चाहे आधा घंटा ज़्यादा लगे। बुज़ुर्ग कहते थे कि रात को उस रास्ते पर कुछ चलता है, और वह अकेला नहीं चलता। मुकेश ने यह बात बचपन से सुनी थी और कभी उस पर सोचा नहीं था।
मुकेश चावल मिल में रात की पाली करता था, ग्यारह बजे से सुबह सात बजे तक, हफ़्ते में छह दिन। मिल कब्रिस्तान के उस तरफ़ थी। घूमकर जाने में पचास मिनट लगते थे और सीधे रास्ते से अठारह। पचास मिनट का मतलब था पाली में देर, और तीन बार देर होने पर आधे दिन की मज़दूरी कटती थी। घर में पिता की दवा चलती थी, महीने का साढ़े ग्यारह सौ का ख़र्च, और मुकेश के अलावा कमाने वाला कोई नहीं था। पहले महीने उसने घूमकर जाना आज़माया और दो बार तनख़्वाह कटवाई। उसके बाद उसने आज़माना छोड़ दिया। मुकेश सीधे रास्ते से जाता था।
मिल में बोरियाँ गिनना उसका काम था, और गिनती उसकी आदत बन चुकी थी। वह रास्ते में भी क़दम गिनता था, बिना सोचे। कब्रिस्तान की दीवार से मोड़ तक चार सौ अस्सी क़दम। यह गिनती बरसों में कभी दस से ज़्यादा ऊपर-नीचे नहीं हुई थी। इसी वजह से उसे उस रात फ़र्क़ पता चला।
डर की असली शुरुआत
उस रात गिनती चार सौ अस्सी पर पूरी हुई, पर आवाज़ें उसके बाद भी आती रहीं। तीन क़दम ज़्यादा। मुकेश रुक गया। आवाज़ भी रुकी, पर आधा क़दम देर से। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि आवाज़ पीछे से आ ही नहीं रही थी। वह बाईं तरफ़ से आ रही थी। इतने पास से कि हाथ फैलाता तो छू लेता।
अगली रात उसने जान-बूझकर धीरे चलकर देखा। दूसरी आवाज़ ने भी रफ़्तार कम कर ली। बीच रास्ते में उसने रुककर जूते का फ़ीता बाँधा। दूसरी आवाज़ रुकी और इंतज़ार करती रही। मुकेश ने उस रात टॉर्च नहीं जलाई, और यह बात उसने ख़ुद को यह कहकर समझाई कि बैटरी बचानी है।
तीसरी रात मिल के दो आदमी उसके साथ मोड़ तक आए, क्योंकि उनका रास्ता भी उधर ही था। उस रात कोई दूसरी आवाज़ नहीं थी। अगले हफ़्ते मुकेश ने इसे तीन बार जाँचा। अकेले चलो तो साथ में कोई चलता है। दो लोग चलो तो कोई नहीं चलता। बुज़ुर्ग बचपन से यही कहते आए थे, और मुकेश ने कभी उनकी बात को ध्यान से नहीं सुना था।
एक इतवार मुकेश दिन के उजाले में उस दीवार तक गया। दिन में वह जगह कुछ भी नहीं थी: टूटी दीवार, बबूल, बकरियाँ चरती हुईं। दीवार की जड़ में पत्थर पड़े थे, छोटे, हथेली भर के, एक कतार में। पहली नज़र में वे यूँ ही पड़े लगते थे, पर उनके बीच की दूरी बराबर थी। उसने गिने। इकत्तीस। हर पत्थर पर किसी नुकीली चीज़ से एक नाम खुरचा हुआ था। ज़्यादातर नाम घिस चुके थे और कुछ पर सिर्फ़ आधा अक्षर बचा था। जो पूरे बचे थे, उनमें एक नाम उसके पिता का था।
मुकेश ने घर आकर पूछा। पिता ने सीधा जवाब नहीं दिया, पर इतना बताया कि तीस साल पहले वे भी रात की पाली करते थे, और एक दिन उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी थी। छोड़ने की वजह उन्होंने घर में कभी नहीं बताई थी। इसके बाद उन्होंने मुकेश से कहा कि वह मिल की नौकरी छोड़ दे। मुकेश ने मेज़ पर रखी दवा की शीशी की तरफ़ देखा और बात बदल दी।
किसी के होने का एहसास
जाड़े में मिल में नए लड़के रखे गए, और उनमें छोटू भी था, मुकेश की बहन का बेटा, चौदह साल का। पहली रात छोटू ने कहा कि वह मुकेश के साथ चलेगा, क्योंकि उसे अकेले डर लगता है। मुकेश ने हाँ कर दी। उस रात दोनों साथ चले और कोई दूसरी आवाज़ नहीं आई। छोटू रास्ते भर बोलता रहा। मुकेश उस रात गिनती नहीं गिन पाया।
तीसरी रात मुकेश ने छोटू से कहा कि वह मिल के बाक़ी लड़कों के साथ जाए। छोटू ने वजह पूछी। मुकेश ने कह दिया कि उसे रास्ते में एक जगह रुकना है। छोटू मान गया। उस रात मुकेश अकेला निकला, और दीवार के पास पहुँचते ही दूसरी आवाज़ लौट आई, पहले से पास। इतनी पास कि कपड़े की सरसराहट सुनाई दी। मुकेश ने बाईं तरफ़ नहीं देखा। उसने चार सौ अस्सी तक गिना, और उसके बाद भी गिनता रहा।
अब मुकेश हमेशा अकेला जाता है। मिल में लोग समझते हैं कि उसे साथ चलना पसंद नहीं, और वह इस ग़लतफ़हमी को ठीक करने की कोशिश नहीं करता। छोटू दूसरे लड़कों के साथ जाता है और उसे आज तक कुछ सुनाई नहीं दिया। पिता ने दोबारा नौकरी छोड़ने की बात नहीं उठाई, पर वे अब रात को दरवाज़े की कुंडी नहीं लगाते और सुबह सात बजे तक जागते रहते हैं। पिछले इतवार मुकेश उस दीवार के पास फिर गया था। अब वहाँ बत्तीस पत्थर हैं। आख़िरी पत्थर पर जो नाम खुरचा है, वह अभी नया है और साफ़ पढ़ा जाता है।