उस सुबह पानी उस निशान से नीचे था जो खंभे पर सबसे नीचे लिखा हुआ था। प्रीतम नाव से उतरा और कीचड़ में पहला क़दम रखने से पहले उसने डंडा गाड़कर देखा। डंडा दो फ़ुट अंदर चला गया। वह वहीं रुक गया।
झील का कीचड़ वैसा नहीं होता जैसा नदी का होता है। वह बरसों की जमी हुई महीन गाद है, जो ऊपर से सूखकर पपड़ी बना लेती है और नीचे से वैसी ही गीली रहती है। ऊपर से वह ज़मीन लगती है। पैर रखते ही वह घुटने तक ले लेती है। उसके बाद वह अपने आप खींचती है।
हर उतार के मौसम में इसी में कोई न कोई जाता है। प्रीतम बारह बरस से यही नापता आया था।
उसका काम दिन में दो बार पानी का तल नापना था। सुबह सात और शाम पाँच। पैमाना कंक्रीट का एक खंभा था, जो किनारे पर गड़ा हुआ था और जिस पर मीटर के निशान काले रंग से बने थे। मई के आख़िर में झील सबसे नीचे रहती है।
बरसात से पहले पानी छोड़ा जाता है, ऊपर से नया आया नहीं होता, और तल हर दिन थोड़ा-थोड़ा गिरता जाता है। जून के पहले हफ़्ते में वह सबसे नीचे छूता है और फिर चढ़ने लगता है।
उस साल वह बहुत नीचे गया।
पुराना टिहरी उस पानी के नीचे है। शहर वहाँ से हटाया गया था, मकान ख़ाली कराए गए थे, और फिर पानी भर दिया गया था। जिस साल पानी ज़्यादा उतरता है, उस साल घंटाघर का ऊपरी हिस्सा दिखने लगता है और लोग नाव लेकर देखने आते हैं।
इस बार घंटाघर आठ फ़ुट तक दिखा। भीड़ लग गई। प्रीतम को उससे कोई मतलब नहीं था। उसे नंबर चाहिए था। नंबर खंभे पर था। खंभे पर सबसे नीचे वाला निशान अठारह सौ पैंतीस मीटर का था। बारह बरस में पानी उससे नीचे कभी नहीं गया था।
उस सुबह वह उससे भी नीचे था।
मतलब यह कि नापने के लिए उसे खंभे तक पैदल जाना पड़ेगा, कीचड़ में, और नीचे के हिस्से पर हाथ से नापकर देखना पड़ेगा कि आख़िरी निशान से कितना नीचे है। दफ़्तर को यह नंबर उसी दिन चाहिए था। प्रीतम ने नाव किनारे से बाँधी, डंडा उठाया, और चलना शुरू किया।
कीचड़ में चलने का एक ही तरीक़ा होता है। हर क़दम से पहले डंडा गाड़ो, जहाँ डंडा एक फ़ुट से कम जाए वहीं पैर रखो, और कभी भी दोनों पैर एक साथ मत धँसने दो। खंभा किनारे से चालीस क़दम था और उसे पहुँचने में अठारह मिनट लगे।
पास पहुँचकर उसने साँस ली। फिर ऊपर से नीचे तक देखा।
अठारह सौ पैंतीस वाला निशान उसकी छाती के बराबर था। उसके नीचे खंभा सादा था, बिना निशान के, क्योंकि विभाग को उम्मीद ही नहीं थी कि पानी कभी वहाँ तक जाएगा। उस सादे हिस्से पर एक जगह कंक्रीट चिकना था। बाक़ी जगह नहीं।
प्रीतम ने पहले सोचा कि पानी ने घिसा होगा। पानी घिसता है, पर वह पूरे खंभे को एक जैसा घिसता है, ऊपर से नीचे तक बराबर। यह एक ही जगह थी। बस एक।
क़रीब एक बालिश्त चौड़ी और उतनी ही लंबी, खंभे के उस तरफ़ जो गाँव की तरफ़ पड़ता था। बाक़ी खंभा खुरदुरा था, बजरी उभरी हुई, जैसा पुराना कंक्रीट होता है। और उस जगह पर वह इतना चिकना था जितना बरसों हाथ लगने से होता है।
प्रीतम ने अपना हाथ वहाँ रखा। हाथ अपने आप गया।
हथेली ठीक बैठ गई। उँगलियाँ अपने आप उन जगहों पर चली गईं जहाँ घिसाव थोड़ा और गहरा था। किसी ने वहाँ खड़े होकर, इसी तरह, खंभे को पकड़ा हुआ था। बहुत बार पकड़ा हुआ था। और वह जगह पानी के नीचे थी। बारह बरस से। लगातार।
उसने हाथ हटा लिया और नाप लेने लगा।
फ़ीता खोलते वक़्त उसकी उँगलियाँ ठीक से चल नहीं रही थीं और फ़ीता दो बार हाथ से छूट गया। तीसरी बार में उसने नाप ले ली। आख़िरी निशान से दो मीटर सात सेंटीमीटर नीचे। उसने नंबर याद कर लिया, क्योंकि लिखने के लिए झुकना पड़ता और वह झुकना नहीं चाहता था।
फिर वह मुड़ा। डंडा उसने आगे किया। लौटने में उसे अठारह मिनट नहीं लगे।
जाते वक़्त डंडे के निशान बने हुए थे और वह उन्हीं पर पैर रखता गया, इसलिए वापसी तेरह मिनट में हो गई। इन तेरह मिनटों में उसने पीछे एक बार भी नहीं देखा, और यही सबसे मुश्किल काम था, क्योंकि खुले कीचड़ में आदमी को लगातार लगता रहता है कि उसके पीछे कोई क़दम रख रहा है और वे क़दम उसके अपने क़दमों से ठीक एक क़दम पीछे हैं।
नाव तक पहुँचकर उसने रस्सी खोली। चप्पू उसने दोनों हाथों से पकड़ा। पानी में उतरने से पहले उसने अपने पैरों की तरफ़ देखा। कीचड़ घुटनों तक था और उसमें कोई और चीज़ नहीं लगी थी।
उस दिन का नंबर दफ़्तर चला गया और रिकॉर्ड में सबसे नीचे का तल दर्ज हो गया। जून के दूसरे हफ़्ते में ऊपर बारिश शुरू हुई और झील चढ़ने लगी।
बाईस जून तक पानी अठारह सौ पैंतीस वाले निशान से ऊपर आ गया और चिकनी जगह उसके नीचे चली गई। सितंबर तक घंटाघर भी डूब गया और नाव वाले लौट गए।
अगले बरस मई में वह फिर वहाँ गया।
उस साल पानी उतना नीचे नहीं उतरा, बस चार इंच नीचे, और चिकनी जगह का ऊपरी किनारा भर दिखा। प्रीतम ने नाव से ही नाप ली और उतरा नहीं। पर उसने वह किनारा देखा, और वह पिछले बरस के मुक़ाबले एक इंच ऊपर तक आ चुका था।