माँजा टूटने की आवाज़ बहुत बारीक होती है और एक बार सुन लो तो कभी नहीं भूलती। हसमुख ने लग्गी ऊपर की, हँसिया तार के नीचे लगाया और खींचा। ऊपर कहीं वह आवाज़ हुई। फिर पीला माँजा नीचे गिरने लगा, हवा में हिलता हुआ, और उसके साथ एक कटी हुई पतंग की कमानी भी आ गिरी। पीछे खड़े लड़के ने उसे बोरे में डाल लिया।
उत्तरायण के बाद अहमदाबाद के ऊपर हफ़्तों तक माँजा लटका रहता है। बिजली के तारों पर, पेड़ों पर, खंभों पर, होर्डिंग के पीछे। बरसात तक रहता है। और तब तक काटता रहता है। नगर निगम की टोली सोलह जनवरी से निकलती है और मार्च तक निकलती है। हसमुख उस टोली में बारह साल से था।
उसे माँजा देखकर उसकी उम्र मालूम हो जाती थी। ताज़ा माँजा चमकता है और उसका रंग गाढ़ा होता है। दस दिन धूप खा ले तो रंग उड़ने लगता है और उस पर धूल बैठ जाती है, जिससे वह दिखने में मोटा लगता है और काटने में उतना ही तेज़ रहता है। महीने भर पुराना माँजा दूर से सूखी घास जैसा दिखता है। यह हिसाब उसे किसी ने सिखाया नहीं था।
फ़रवरी में टोली शहर से बाहर वाले बाईपास पर गई, जहाँ जाने की असल में ज़रूरत नहीं थी। उधर मकान नहीं हैं, छतें नहीं हैं, पतंग उड़ाने वाला कोई नहीं है। दोनों तरफ़ बबूल हैं और उनके पीछे खारी ज़मीन है। जाना इसलिए पड़ा कि एक ट्रकवाले ने चौकी पर बताया था कि वहाँ सड़क के आर-पार कुछ बँधा है।
वह बँधा हुआ था। एक सिरा मील के पत्थर से, दूसरा बबूल की एक डाल से, और सड़क से ऊँचाई इतनी कि मोटरसाइकिल पर बैठे आदमी की गर्दन ठीक उसमें आए। हसमुख ने लग्गी से उसे काटा और लपेटकर बोरे में डाला। उस वक़्त उसने एक बात देखी और उसे कोई मतलब नहीं दिया। माँजा ताज़ा था।
चौकी पर सबने यही कहा कि लड़कों का काम है। हसमुख ने भी यही माना। दिक़्क़त सिर्फ़ इतनी थी कि फ़रवरी में ताज़ा माँजा कहीं नहीं होता। जो बना था वह जनवरी में उड़ चुका होता है और जो बचता है वह दुकानों में बंद रहता है।
दस दिन बाद वह फिर वहीं था। उसी मील के पत्थर से, उसी डाल तक, उतनी ही ऊँचाई पर। हसमुख लग्गी लेकर उतरा और पत्थर वाले सिरे के पास पहुँचा। वहीं वह रुक गया।
गाँठ उसकी थी। लग्गी वाले माँजे को उतारकर नीचे लाने के लिए वह उसे दो फंदों में लपेटता है और सिरा भीतर से खींच देता है, ताकि बोरे में जाकर वह खुले नहीं। यह उसका अपना तरीक़ा था। टोली में और कोई ऐसे नहीं बाँधता था। पत्थर पर वही दो फंदे थे और सिरा भीतर से खिंचा हुआ था।
उसने चौकी पर माँजे की बात लिखवाई। गाँठ की बात नहीं लिखवाई। इसकी वजह उसके पास तब भी नहीं थी और आज भी नहीं है।
मार्च में वे चीज़ें उसकी अपनी गली में दिखने लगीं। पहले नीम की डाल पर, जो सामान्य है। फिर बिजली के खंभे और उसके दरवाज़े के बीच, जो सामान्य नहीं है, क्योंकि वहाँ ऊपर कुछ है ही नहीं जिससे उलझकर माँजा वहाँ आ जाए। एक सुबह वह बाहर निकला तो वह उसके अपने फाटक के आर-पार बँधा था, छाती की ऊँचाई पर, और ताज़ा था।
जिग्नेश उसकी बहन का लड़का था, उन्नीस का, और दूध की दो कैनें लेकर सुबह साढ़े चार बजे उसी बाईपास से जाता था। बाईपास पर उस वक़्त और कोई नहीं होता। हसमुख ने उससे कहा था कि हैंडल पर रॉड लगवा ले, जैसे सब लगवाते हैं। जिग्नेश ने कहा था कि गाड़ी भद्दी लगती है। यह बात दो बार हुई और दूसरी बार के बाद हसमुख ने कहना छोड़ दिया।
बाईस मार्च की रात वह चार बजे उठा, लग्गी और टॉर्च लेकर साइकिल पर निकला, और मील के पत्थर तक पहुँचा। अँधेरा था और खारी ज़मीन से ठंडी हवा आ रही थी। माँजा वहीं था। उसने टॉर्च दाँतों में दबाई, लग्गी ऊपर की, और उसे काट दिया। वही बारीक आवाज़ हुई और वह नीचे आ गिरा।
वह लौटने के लिए मुड़ा। दो क़दम चला। दूसरा वहीं था। पहले वाले से बीस क़दम पीछे, यानी उस तरफ़ जिससे वह आया था और जहाँ आते वक़्त कुछ नहीं था। टॉर्च नीचे थी। उसने उसे देखा नहीं, बस गले पर ठंडा सा लगा और उसी झटके में उसका हाथ ऊपर चला गया। माँजा कलाई से कोहनी तक चला गया।
अस्पताल में सत्ताईस टाँके लगे और दो नसें कट चुकी थीं। बाएँ हाथ की दो उँगलियाँ अब पूरी मुड़ती नहीं हैं। लग्गी दोनों हाथों से पकड़नी पड़ती है और ऊपर की तरफ़ ज़ोर लगाना पड़ता है, इसलिए वह काम उससे नहीं होता। अब वह गाड़ी में बैठता है और बोरे गिनता है और जहाँ उतरना हो वहाँ लड़कों को बताता है कि कहाँ देखना है।
जिग्नेश ने उसके बाद हैंडल पर रॉड लगवा ली। बाईपास पर उस साल के बाद कुछ नहीं मिला, न उस मार्च में, न अगले साल। टोली अब भी हर फ़रवरी में एक चक्कर उधर का लगाती है, इसलिए नहीं कि कुछ मिलता है, बल्कि इसलिए कि रजिस्टर में वह रास्ता चढ़ चुका है। मील का पत्थर वहीं खड़ा है, और उसके ऊपरी किनारे पर, सड़क से उलटी तरफ़, एक घिसाव पड़ गया है, जैसा तब पड़ता है जब किसी चीज़ को बार-बार उसी जगह कसा और खोला गया हो।
बोरे अब लड़के बाँधते हैं और वे एक ही फंदा लगाते हैं, क्योंकि दूसरा तरीक़ा उन्हें किसी ने सिखाया नहीं। हसमुख भी नहीं सिखाता। पिछली फ़रवरी में गाड़ी के पीछे बैठे-बैठे उसने एक बोरा खोलकर देखा और भीतर एक लच्छी पड़ी थी, दो फंदों में लिपटी हुई, सिरा भीतर से खिंचा हुआ। उसने बोरा वापस बाँधा और बाक़ी रास्ते सड़क की तरफ़ देखता रहा।