हवा बाहर की तरफ़ चली और डोनबोक ने वहीं हाथ उठा दिया। उसके पीछे चार लोग थे और चारों रुक गए। गुफ़ा साँस लेती है, यह जयंतिया पहाड़ों में हर आदमी जानता है।
बाहर की हवा और अंदर की हवा में जब फ़र्क़ आता है तो हवा मुँह से अंदर या बाहर चलने लगती है, और सर्दियों में एक तरफ़ चलती है और गर्मियों में दूसरी तरफ़। पर बरसात में उसका एक और मतलब होता है।
अंदर पानी चढ़े तो वह अपने आगे की हवा को धकेलता है। पानी दिखने से पहले हवा आती है। यही चेतावनी है। इससे ज़्यादा गुफ़ा कुछ नहीं देती।
उस दिन दो दिन से बारिश नहीं हुई थी।
मेघालय में यह अपने आप में अजीब बात है। जून में वहाँ रोज़ पानी पड़ता है और चेरा की तरफ़ तो दिन में कई बार पड़ता है। दो सूखे दिन साल में उँगलियों पर गिने जाते हैं। डोनबोक बत्तीस बरस का था और नौ साल से यही काम कर रहा था।
हर बरस जनवरी-फ़रवरी में विदेशी टोलियाँ आती हैं और गुफ़ाओं की नाप-जोख करती हैं। वे रस्सी, बत्ती और काग़ज़ लाती हैं, और साथ में एक स्थानीय आदमी रखती हैं, जो रास्ता जानता हो और पानी पढ़ना जानता हो। जून में कोई अंदर नहीं जाता। कोई भी नहीं।
बरसात में इन गुफ़ाओं के निचले हिस्से भर जाते हैं और जो जगह मार्च में सूखी होती है वह जुलाई में छत तक पानी में रहती है। इसीलिए नाप-जोख का मौसम जाड़ा है। उस बार टोली जून में आई थी।
उनके पास एक ही हफ़्ता था और उन्हें बस एक जगह देखनी थी, जिसे वे पिछली बार अधूरा छोड़ गए थे। उन्होंने डोनबोक को उसकी रोज़ की मज़दूरी का चार गुना कहा। उसने पहले मना किया था। दो बार।
फिर उसने हाँ कर दी, क्योंकि चार गुने का मतलब उस पूरे बरसात के मौसम की कमाई एक हफ़्ते में हो जाना था, और बरसात में वहाँ और कोई काम नहीं होता। उन्होंने तीन दिन में तीन बार अंदर जाकर देखा और तीनों बार हवा अंदर की तरफ़ चल रही थी, जो ठीक था।
चौथे दिन वे सबसे लंबे रास्ते पर गए।
मुँह से चार सौ मीटर अंदर तक जाना था, और उसमें एक जगह पेट के बल रेंगकर निकलना पड़ता था, जिसे वे लोग सँकरा गला कहते थे। उससे आगे एक बड़ा कमरा था और वहीं से आगे का काम बाक़ी था।
गले से निकलने के बाद डोनबोक ने रुककर लौ देखी। वह अपने साथ एक छोटी मोमबत्ती रखता था, बत्ती के अलावा, क्योंकि हवा की चाल लौ से दिखती है और मीटर से नहीं।
लौ सीधी थी। बिलकुल सीधी।
वे आगे बढ़े। कमरे में काम शुरू हुआ और वे लोग नाप लेने लगे। डोनबोक एक तरफ़ बैठ गया और मोमबत्ती अपने सामने रख ली। चालीस मिनट बाद लौ झुकी। थोड़ी-सी। बाहर की तरफ़। उसने उठकर हाथ उठा दिया और सब रुक गए। टोली का मुखिया, जो चार बार पहले भी आ चुका था, वहीं से बोला कि बीस मिनट और चाहिए।
'नहीं,' डोनबोक ने कहा।
उसने वजह भी बताई। हवा बाहर जा रही है, इसका मतलब पानी चढ़ रहा है, और चढ़ता हुआ पानी सँकरे गले को सबसे पहले बंद करता है, और उसके बंद होते ही उस कमरे से निकलने का कोई रास्ता नहीं बचता।
मुखिया ने याद दिलाया कि दो दिन से बारिश नहीं हुई है। यह भी सही था और डोनबोक के पास इसका जवाब नहीं था। उसने बस इतना कहा कि लौ झुकी हुई है। वे लौटे। सब लौटे। गले से निकलने में उन्हें बारह मिनट लगे और वहाँ पानी नहीं था। ज़मीन उतनी ही गीली थी जितनी आते वक़्त थी।
बीच के रास्ते में एक जगह सीढ़ी जैसी चढ़ाई आती है और वहाँ डोनबोक सबसे पीछे था। वहीं उसे गंध आई। एक ही साँस में।
गुफ़ा की अपनी गंध होती है और वह हर गुफ़ा में एक जैसी होती है। गीला चूना, ठंडी मिट्टी, और चमगादड़। बरसों में उसकी नाक इसकी आदी हो चुकी थी और वह उसे अलग से महसूस भी नहीं करता था।
जो गंध आई वह कटी घास की थी। ताज़ा कटी घास, वैसी जैसी ढलान पर हँसिया चलने के बाद घंटे भर तक रहती है।
वह गंध हवा के साथ अंदर से आ रही थी, यानी उस तरफ़ से जिधर से वे अभी लौटे थे, और जिधर चार सौ मीटर पत्थर के अलावा कुछ नहीं था। डोनबोक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। चारों को उसने कुछ बताया भी नहीं।
वे मुँह तक पहुँचे। फिर बाहर निकले।
बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। पहाड़ के उस पार से, जहाँ से पानी उस गुफ़ा में जाता है, बादल की एक मोटी पट्टी नीचे उतर रही थी और वह वहाँ दो घंटे से बरस रही थी, हालाँकि उनके अपने ऊपर आसमान खुला हुआ था।
टोली ने उसके बाद उसे नहीं बुलाया।
उन्होंने बाक़ी तीन दिन दूसरा आदमी लेकर काम किया और उन्हें कुछ नहीं हुआ। अगले बरस जाड़े में वे फिर आए और तब भी उन्होंने किसी और को रखा। डोनबोक की चार गुनी मज़दूरी उसी एक दिन पर ख़त्म हो गई।
अब वह गुफ़ा के मुँह पर एक चीज़ बाँधकर रखता है।
कपड़े की एक पतली पट्टी, आधा हाथ लंबी, जो गुफ़ा के मुँह की छत में ठोंकी हुई कील से लटकती है। अंदर जाने से पहले वह उसे देख लेता है। बरसात के महीनों में वह अक्सर बाहर की तरफ़ उड़ती रहती है, और उन दिनों में डोनबोक किसी को उस गले से आगे नहीं ले जाता, चाहे बाहर धूप ही क्यों न निकली हो।