अवधेश और उसके तीन दोस्त उस दोपहर खंडहर तक इसलिए पहुँच गए क्योंकि गेंद उधर चली गई थी। वे वहाँ जाते नहीं थे। जगह ख़राब मानी जाती थी। गेंद ढूँढ़ते हुए अवधेश एक टूटी दीवार के पीछे गया, और वहीं रुक गया। ज़मीन पर एक कटा हुआ हाथ पड़ा था। इंसान का। और उसके कटे हिस्से से ख़ून नहीं बह रहा था।
चारों भागे। भागते हुए किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और गाँव तक कोई नहीं रुका। अवधेश को बाद में सिर्फ़ दो चीज़ें ठीक-ठीक याद रहीं। हाथ सीधा पड़ा था, हथेली ऊपर। और उँगलियाँ आधी मुड़ी हुई थीं, जैसे कोई चीज़ पकड़ते-पकड़ते छूट गई हो।
बैसाख के दिन थे। खेत कट चुके थे और उनमें हल चल रहा था। ऐसे दिनों में ज़मीन से चीज़ें निकलती हैं। ठीकरे, हड्डियाँ, कभी कोई पुराना सिक्का। इस पर कोई हैरान नहीं होता।
गाँव में बात दस मिनट में फैल गई। जो हुआ वह यह था कि बड़े लोग बहुत जल्दी तैयार हो गए। इतनी जल्दी कि अवधेश को उसी वक़्त अजीब लगा। किसी ने यह नहीं पूछा कि सचमुच हाथ था या कुछ और। किसी ने थाने का नाम नहीं लिया।
छह आदमी खंडहर की तरफ़ चले और अवधेश को साथ ले गए, क्योंकि जगह उसी को दिखानी थी। रास्ते में कोई बात नहीं हुई। इतने आदमी साथ चलें और कोई कुछ न बोले, यह अपने आप में एक बात है।
अवधेश के पिता रामनाथ उनमें नहीं थे। वे घर पर ही रहे। यह भी अजीब था, क्योंकि खंडहर वाला खेत उन्हीं की तरफ़ पड़ता है और वे उस दिन खाली भी थे।
खंडहर पर पहुँचकर आदमियों ने हाथ देखा और उसे देखते ही सब चुप हो गए। फिर उन्होंने एक बोरी मँगाई और उसे बोरी में डाल लिया। किसी ने उसे छुआ नहीं, दो लोगों ने लकड़ी से खिसकाया।
किसी ने यह नहीं पूछा कि यह किसका है।
अवधेश ने पूछा। उसने ज़ोर से नहीं पूछा, बग़ल में खड़े आदमी से पूछा, कि चाचा किसका होगा। उस आदमी ने उसकी तरफ़ देखा और कहा कि तू घर चल। यही एकमात्र जवाब था जो उसे उस पूरे दिन मिला।
शाम को तय हुआ कि इसे नहर में डाल देंगे। वजहें गिनाई गईं और सब वाजिब थीं। थाना आएगा तो खेत नपेंगे। नपेंगे तो पुराने झगड़े खुलेंगे। और वैसे भी यह किसी का हो सकता है, कहीं से भी आ सकता है, बहकर भी आ सकता है।
अवधेश ने कहा कि इसे गाड़ देना चाहिए। वह बारह साल का था और उसकी बात पर कोई नाराज़ भी नहीं हुआ। सब सुनते रहे और फिर वही किया जो पहले तय हो चुका था। रात को दो आदमी बोरी लेकर नहर की तरफ़ गए।
तीसरे दिन दोपहर में उसे दूसरे घर के एक लड़के ने देखा। खंडहर पर। उसी टूटी दीवार के पीछे।
इस बार गाँव तेज़ नहीं चला। ख़बर उसी रफ़्तार से फैली, पर उठा कोई नहीं। दो दिन तक बोरी वहीं पड़ी रही और वहाँ जाने वाला रास्ता लोगों ने अपने आप छोड़ दिया।
अवधेश उन दो दिनों में एक ही बात सोचता रहा, और वह बात किसी आवाज़ या साये की नहीं थी। बैसाख की गर्मी है। तीन दिन नहर के पानी में रहा है। फिर भी वैसा ही है। न फूला, न किसी जानवर ने छुआ, और कटी हुई जगह पर अब भी वैसी ही साफ़ धार है।
इसका मतलब क्या है, यह उसे नहीं पता था। इतना पता था कि यह किसी हादसे का हाथ नहीं है।
चौथे दिन उसके पिता ने पहली बार इस पर मुँह खोला। उन्होंने अवधेश की तरफ़ देखे बिना इतना कहा कि उस खेत में हल नहीं चलाना चाहिए था। इसके बाद उन्होंने बात ख़त्म कर दी और अवधेश ने आगे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं की।
उसी दोपहर, चार बजे, अवधेश अकेला खंडहर तक गया। उजाला पूरा था और यही उसने सोचकर किया था। वह यह देखना चाहता था कि बोरी वहीं है या नहीं, क्योंकि यह ऐसी बात थी जिसे कोई और देखने नहीं जा रहा था।
बोरी वहीं थी। बोरी का मुँह खुला हुआ था और हाथ बाहर था, दीवार के पास, सीधा पड़ा हुआ, हथेली ऊपर, उँगलियाँ आधी मुड़ी हुई। बिल्कुल उसी तरह जैसे पहले दिन। अवधेश ने वहाँ खड़े होकर यह तय करने की कोशिश नहीं की कि यह किसने किया होगा। वह लौट आया, और लौटते हुए वह दौड़ा नहीं, क्योंकि दौड़ने से लोग पूछते।
शाम को वह छेदीलाल के पास गया, जो गाँव में सबसे बूढ़ा था और जिससे कोई कुछ नहीं पूछता था। अवधेश ने सीधा पूछा कि क्या करना चाहिए। छेदीलाल ने कहा कि गाड़ दो। अवधेश ने पूछा कि कहाँ। बूढ़े ने खंडहर वाले खेत की तरफ़ हाथ किया और कुछ और नहीं कहा।
पंडित के कहने पर गाँव वालों ने वह हाथ ज़मीन में दफ़्न किया, उसी जगह के पास जहाँ बरसों पहले वह आदमी मारा गया था। कोई पास खड़ा नहीं रहना चाहता था। सब दूर से देखते रहे। मिट्टी डालते वक़्त अवधेश के हाथ से दो बार मिट्टी गिर गई, और उसने यह किसी को दिखने नहीं दिया। काम ख़त्म होने के बाद गाँव में एक अजीब सी ख़ामोशी थी, जैसी बरसात रुकने के बाद होती है। अवधेश उस रात पहली बार बिना जागे सोया।
उसके बाद वह हाथ फिर कभी नहीं दिखा। खेत उसी तरह जोते जाते रहे और लोग धीरे धीरे उस बात को कम करने लगे। सिर्फ़ एक चीज़ नहीं बदली। जिस जगह हाथ दफ़्न हुआ था, वहाँ की ज़मीन पर कुछ नहीं उगता। अवधेश हर साल वहाँ बीज डालता है, हर साल कुछ नहीं होता, और वह अगले साल फिर डालता है। गाँव में लोग कहते हैं कि वह बेकार में मेहनत करता है। अवधेश कुछ जवाब नहीं देता।