शादियों का सीज़न दर्ज़ी के लिए साल के बाक़ी दस महीनों से भारी होता है। इरफ़ान की दुकान गली के मोड़ पर थी और उन हफ़्तों में वह रात के दो-तीन बजे तक मशीन पर बैठा रहता था। दिन में नाप लेता, शाम को काटता, और रात को सिलता। इसके अलावा कोई तरीक़ा नहीं था, क्योंकि साल भर का काम इन्हीं छह हफ़्तों में आता है।
दुकान छोटी थी और उसमें हवा नहीं आती थी, इसलिए वह दरवाज़ा खुला रखता था। ऊपर एक ट्यूबलाइट थी और वह सीधे उसके सिर के पीछे लगी थी। इस वजह से उसका साया दरवाज़े से निकलकर बाहर गली में जाकर पड़ता था, लंबा, दहलीज़ से शुरू होकर सामने वाली दीवार तक।
यह साया उसे रोज़ दिखता था और उसने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया, वैसे ही जैसे आदमी अपनी ही चीज़ों पर ध्यान नहीं देता। कभी काम से नज़र उठती तो सामने की दीवार पर वह हिलता हुआ दिख जाता। बस इतना ही।
गली में उस वक़्त कोई नहीं होता। सामने वाली दुकान ग्यारह बजे बंद हो जाती है और उसके बाद पूरी गली में सिर्फ़ इरफ़ान की ट्यूबलाइट जलती है। इसी वजह से रात में उसकी दुकान का उजाला दूर से दिख जाता था, और लोग कहते थे कि दर्ज़ी की बत्ती जल रही है, मतलब सीज़न चल रहा है।
उस रात वह ब्लाउज़ का गला काढ़ रहा था और उसमें मशीन धीमी चलानी पड़ती है। इसी वजह से उसने सिर उठाया और बाहर देखा।
गली में दो साये थे।
एक उसका था, दहलीज़ से शुरू होकर दीवार तक। दूसरा उसके बग़ल में था, थोड़ा छोटा, और वह दहलीज़ से शुरू नहीं होता था। वह बीच गली में शुरू होता था, जहाँ से किसी साये का शुरू होना मुमकिन नहीं, क्योंकि साया वहीं से बनता है जहाँ रोशनी किसी चीज़ से रुकती है।
इरफ़ान ने पीछे देखा। दुकान में वह अकेला था। उसने दरवाज़े के बाहर झाँका और गली दोनों तरफ़ ख़ाली थी। लौटकर उसने फिर देखा तो दूसरा साया वहीं था, उसी जगह, उतना ही।
उसने अपना हाथ हिलाया। उसका साया हिला। दूसरा नहीं हिला।
उसने अगले दिन दोपहर में जाकर देखा। दिन के उजाले में गली वैसी ही थी जैसी हमेशा रहती है। न कोई खंभा, न कोई तार, न कोई ऐसी चीज़ जिससे उस जगह पर कुछ बन सके। उसने अपने हाथ से ज़मीन पर वह जगह छूकर भी देखी। ज़मीन ज़मीन थी।
आदमी ऐसी चीज़ के साथ जो करता है, वही उसने किया। उसने ट्यूबलाइट बंद की और घर चला गया। सुबह उठकर उसे यह सारी बात इतनी बेतुकी लगी कि उसने किसी से कही भी नहीं।
दूसरी रात वह फिर था। तीसरी रात भी। चौथी रात इरफ़ान ने उसे ग़ौर से देखा और तब उसे वह बात दिखी जो उसे नहीं दिखनी चाहिए थी। साया अब पहले जितनी दूर नहीं था। वह दहलीज़ की तरफ़ थोड़ा सरक आया था।
इसके बाद उसने रात का काम छोड़ने के बारे में सोचा। सोचकर देखा और पाया कि छोड़ नहीं सकता। सत्रह जोड़े कपड़े उसके पास पड़े थे और उन सबकी तारीख़ें तय थीं, क्योंकि शादियाँ तारीख़ देखकर होती हैं और दर्ज़ी की सुविधा देखकर नहीं। एक भी जोड़ा वक़्त पर न दे तो अगले साल वह घर उसके पास नहीं आएगा।
उसने काम जारी रखा और साये को देखना बंद कर दिया। यह सबसे मुश्किल हिस्सा था, क्योंकि जिस चीज़ को न देखने का फ़ैसला किया जाए, नज़र उसी पर जाती है। वह हर बीस-पच्चीस मिनट में एक बार देख ही लेता था।
वह पाँच रातें उसने इसी तरह काटीं। सिलाई का काम हाथ का होता है और उसमें मन कहीं और भी रह सकता है, इसलिए उसका काम रुका नहीं, पर उन रातों में उसने जितनी बार सुई में धागा डाला उतनी बार वह चूका भी। उँगली में तीन बार सुई लगी, जो पिछले नौ साल में कुल मिलाकर इतनी बार नहीं लगी थी।
पाँचवीं रात साया दहलीज़ पर था। छठी रात उसका सिरा दुकान के अंदर आ चुका था, फ़र्श पर, दरवाज़े से एक बालिश्त भीतर।
मेज़ घुमाने से पहले उसने एक बात और सोची, और वह यह कि दुकान बंद करके घर पर काम कर ले। पर घर में मशीन नहीं थी और मशीन उठाकर ले जाने का मतलब था दो दिन का काम बंद। सत्रह जोड़ों में से पाँच अभी बाक़ी थे। उसने मेज़ घुमा दी।
उस रात इरफ़ान ने वह किया जो उसे उसी दिन कर लेना चाहिए था। उसने ट्यूबलाइट के नीचे खड़े होकर देखा कि रोशनी किधर से आ रही है, और उसने अपनी मेज़ को उठाकर दूसरी तरफ़ कर दिया। अब उसकी पीठ दरवाज़े की तरफ़ थी और उसका अपना साया मेज़ के नीचे, अंदर की तरफ़ गिरता था।
पीठ दरवाज़े की तरफ़ करके काम करना अच्छा नहीं लगता। रोशनी भी ठीक से नहीं पड़ती और सुई का छेद देखने में दिक़्क़त होती है। उस साल उसकी सिलाई पहले जैसी नहीं रही और दो घरों ने यह कहा भी।
सीज़न के आख़िरी दिन आख़िरी जोड़ा उसने चार बजे ख़त्म किया। उसे तह करके, काग़ज़ में लपेटकर, नाम की पर्ची लगाकर उसने ऊपर वाले खाने में रख दिया। फिर वह कुछ देर बैठा रहा, क्योंकि छह हफ़्ते बाद अचानक कोई काम बचा न हो तो आदमी उठ नहीं पाता।
फिर उसने ट्यूबलाइट बंद कर दी।
बाहर गली में सुबह का धुँधलका था, वह वाला जिसमें चीज़ें दिखती हैं पर उनके साये नहीं बनते। न उसका, न किसी और का। इरफ़ान दहलीज़ पर बैठ गया और वहीं बैठा रहा। जब सूरज सामने वाले छज्जे के ऊपर आया और गली में रोशनी सीधी पड़ी, तब उसने अपना साया अपने आगे बनते देखा, अकेला, और तब वह उठकर घर गया।