कमरा इलाहाबाद के उस मोहल्ले में था जहाँ ज़्यादातर मकान पुराने हैं और उनकी छतें ऊँची हैं। वहीदा ने वह कमरा नौकरी लगने के बाद लिया था। एक कमरा, एक रसोई, और छत पर जाने का साझा ज़ीना। मकान मालकिन नीचे रहती थी और उसने किराया लेते वक़्त एक ही बात कही थी, कि डाक नीचे नहीं आती, ऊपर ही जाती है।

पहली चिट्ठी तीसरे हफ़्ते आई।

इलाहाबाद के उस मोहल्ले में डाक का अपना तरीक़ा था। डाकिया नीचे से आवाज़ लगाता था और जिसकी चिट्ठी होती वह उतरकर ले जाता। ऊपर तक वह तभी जाता जब कोई नीचे न मिले, और तब वह उसे दरवाज़े के नीचे से सरका देता था। यह वहीदा को मालकिन ने पहले ही दिन बता दिया था।

वह दरवाज़े के नीचे से सरकाई गई थी और उस पर जो नाम लिखा था वह वहीदा का नहीं था। नाम था रामनरेश। पता वही था। उसने वह चिट्ठी मकान मालकिन को दे दी और पूछा कि यह कौन हैं।

मालकिन ने कहा कि उससे पहले वही रहता था और वह डेढ़ बरस पहले चला गया, और उसने पता नहीं छोड़ा। वहीदा ने चिट्ठी वापस डाकिये को देनी चाही और डाकिया अगले हफ़्ते नहीं आया। दूसरी चिट्ठी दस दिन बाद आई। उसी नाम की।

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उसने दोनों एक तरफ़ रख दीं।

तीसरी चिट्ठी आने पर उसने लिफ़ाफ़ा देखा। उस पर भेजने वाले का पता नहीं था। सिर्फ़ नाम, पता, और डाकख़ाने की मुहर, जो धुँधली थी और जिससे शहर नहीं पढ़ा जा रहा था। यह उसे अजीब लगा और उसने तीनों लिफ़ाफ़े मिलाकर देखे।

तीनों पर लिखावट अलग थी। यही उसे खटका। अलग होना बड़ी बात नहीं। तीन लोगों ने लिखी होंगी।

पर वह ऐसी अलग नहीं थी। तीनों में वही अक्षर थे, वही ढलान थी, वही तरीक़ा था जिससे 'र' का पेट बनता है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि पहली चिट्ठी की लिखावट साफ़ थी, दूसरी की थोड़ी काँपती हुई, और तीसरी की काफ़ी काँपती हुई।

यह एक ही आदमी की लिखावट थी, तीन हालतों में।

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वहीदा ने यह दो बार जाँचा। उसने तीनों लिफ़ाफ़े मेज़ पर एक क़तार में रखे और उन्हें खिड़की की रोशनी में देखा। पहली और तीसरी के बीच का फ़र्क़ इतना था कि उन्हें अलग-अलग देखने पर कोई नहीं कहता कि एक ही हाथ का है। साथ रखने पर कोई दूसरा नतीजा निकलता ही नहीं था।

चौथी चिट्ठी उसने खोल ली। यह उसने बहुत सोचकर नहीं किया। किसी और की चिट्ठी खोलना ग़लत है और यह उसे मालूम था। भीतर एक काग़ज़ था और उस पर तीन लाइनें थीं। उनमें कोई अभिवादन नहीं था और कोई नाम नहीं था।

लिखा था कि दरवाज़ा मत खोलना। दूसरी लाइन में लिखा था कि नीचे मत जाना। तीसरी लाइन आधी थी और वह वहीं ख़त्म हो जाती थी, जैसे लिखने वाले ने क़लम उठा लिया हो। वहीदा ने वह काग़ज़ वापस लिफ़ाफ़े में रखा और लिफ़ाफ़ा अलमारी में।

उस रात दरवाज़े के नीचे से पाँचवीं चिट्ठी आई। डाक रात में नहीं आती। यह उसे मालूम था। वह उठी और उसने दरवाज़ा खोलने के लिए कुंडी पर हाथ रखा। फिर उसने हाथ हटा लिया।

यह उसने डर से नहीं किया। उसने बाद में यही कहा कि उस वक़्त उसे लगा कि दरवाज़ा खोलना और न खोलना, दोनों में से कोई एक चुनना है, और वह इसे चुन रही है, किसी के कहने पर नहीं।

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उसने चिट्ठी उठाई और वापस बिस्तर पर बैठ गई। वह लिफ़ाफ़ा ख़ाली था। भीतर कुछ नहीं था। सुबह उसने मकान मालकिन से पूछा कि रामनरेश गया कहाँ था। मालकिन ने पहले वही कहा जो पहले कहा था। फिर उसने कहा कि वह गया नहीं था।

"मतलब?" "सामान यहीं छोड़ गया था। बीस दिन बाद उसका भाई आया और ले गया।" "वह ख़ुद?" मालकिन ने इसका जवाब नहीं दिया और वह भीतर चली गई। वहीदा ने वह कमरा उसी महीने छोड़ दिया।

छोड़ने की वजह उसने दफ़्तर में यह बताई कि किराया ज़्यादा है, जो सच नहीं था। नया कमरा उसे उसी शहर में मिला, दूसरी तरफ़, और वह पहले वाले से छोटा था और उसका किराया उतना ही था। वहाँ डाक नीचे आती थी और मकान मालिक उसे शाम को हाथ में देता था।

जाते हुए उसने चारों बंद लिफ़ाफ़े और वह खुला हुआ, पाँचों, मकान मालकिन को दे दिए। उसने वे लिए और उन्हें अपनी अलमारी में रख लिया, और उसने उन्हें खोला या नहीं, यह वहीदा को कभी मालूम नहीं हुआ। नए किराएदार को कमरा दो महीने बाद मिला। वह एक लड़का था जो किसी तैयारी में लगा था।

वहीदा उसी शहर में रही और उसे एक बार वह मोहल्ला पार करना पड़ा। उसने ऊपर देखा और उस कमरे की खिड़की में रोशनी थी, जो ठीक था, क्योंकि वहाँ अब कोई रहता था।

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उसने यह नहीं देखा कि उस खिड़की के नीचे वाले दरवाज़े पर, ज़मीन से एक बालिश्त ऊपर, एक नया लोहे का पट्टा लगवा दिया गया है, जिस तरह का पट्टा तब लगाया जाता है जब दरवाज़े के नीचे की दरार बंद करनी हो।