वह चक्की रीवा के उस मोहल्ले में इकतालीस बरस से थी और उसे अल्ताफ़ के बाप ने लगवाया था।

मशीन पुरानी थी। मोटर अलग रखी थी और उससे एक चमड़े का पट्टा ऊपर जाकर चक्की के पहिये पर चढ़ता था। ऐसी मशीनों में शोर बहुत होता है और वह शोर मोहल्ले भर में जाता है। अल्ताफ़ ने दुकान अपने बाप के गुज़रने के बाद बंद कर दी।

बाप उसी दुकान में गुज़रा था। शाम का वक़्त था, चक्की चल रही थी, और वह मोटर के पास बैठा था। जब मशीन बंद हुई तब पता चला। इस बात का ज़िक्र मोहल्ले में होता था और अल्ताफ़ के सामने नहीं होता था, और उसे यह मालूम था कि होता है।

इसकी वजह डर नहीं थी। वजह यह थी कि पैकेट वाला आटा आ गया था और चक्की पर पिसाने वाले घट गए थे, और महीने का बिजली का बिल कमाई से ज़्यादा बैठने लगा था। उसने मीटर कटवा दिया और शटर गिराकर ताला लगा दिया।

यह मार्च की बात है और उस मार्च में और कुछ नहीं हुआ। जुलाई में मोहल्ले के लोगों ने रात में चक्की की आवाज़ सुनी। सबसे पहले सग़ीरन ने सुनी, जो बग़ल वाले घर में रहती थी और जिसकी नींद वैसे भी टूटी-टूटी आती थी।

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आवाज़ तीन बजे के आसपास शुरू हुई और लगभग बीस मिनट चली। उसने सुबह अल्ताफ़ को बताया। अल्ताफ़ ने ताला देखा। वह लगा हुआ था। उसने शटर देखा। वह नीचे था।

उसने भीतर जाकर देखा और वहाँ सब कुछ वैसा ही था जैसा उसने चार महीने पहले छोड़ा था। मशीन पर धूल थी और पट्टा उतारकर एक कील पर टाँग दिया गया था, जैसा हर चक्की वाला बंद करते वक़्त करता है ताकि चमड़ा तना न रहे।

अगली रात आवाज़ फिर आई। इस बार दो और लोगों ने सुनी।

तीसरी रात अल्ताफ़ ख़ुद जागा और उसने सुनी। वह अपने घर की छत पर था और आवाज़ नीचे से आ रही थी, उसी दुकान से, और वह चक्की की ही आवाज़ थी। इकतालीस बरस की आवाज़ को वह पहचानता था।

वह नीचे आया और उसने ताला खोला। ताला खुलते ही आवाज़ बंद हो गई। भीतर सब कुछ बंद था। पट्टा कील पर टँगा था। पर फ़र्श पर आटा पड़ा हुआ था, और वह वहाँ चार महीने से नहीं हो सकता था।

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चक्की के नीचे वाले हिस्से में, जहाँ आटा गिरता है, थोड़ा सा आटा पड़ा था। ताज़ा, गरम नहीं, पर ताज़ा। चार महीने पुराना आटा गीली हवा में जम जाता है और उसकी बू बदल जाती है। यह वैसा नहीं था।

अल्ताफ़ ने उसे हाथ से उठाकर देखा और फिर उसने उसे वहीं छोड़ दिया। उसने अगले दिन बिजली वाले को बुलाकर दिखाया कि मीटर कटा हुआ है और तार में करंट नहीं है। बिजली वाले ने टेस्टर लगाकर दिखा दिया कि नहीं है।

मोहल्ले में यह बात फैल गई और उसके बाद लोग रात में उस गली से निकलना कम कर दिए।

जो लोग निकलते थे वे तेज़ चलकर निकलते थे और यह उन्होंने आपस में तय नहीं किया था। सग़ीरन ने अपने बिस्तर की जगह बदल ली और वह भीतर वाले कमरे में सोने लगी, जहाँ गर्मी ज़्यादा थी और आवाज़ कम आती थी। तीन महीने में यह मोहल्ले की आदत का हिस्सा बन गया।

अगस्त में अल्ताफ़ ने तय किया कि वह मशीन बेच देगा। कबाड़ी लोहे के भाव देने को तैयार था। जिस रात उसे यह तय किया, उसी रात उसने कुछ और तय किया। उसने तय किया कि वह उस रात दुकान के भीतर सोएगा।

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उसने यह किसी को नहीं बताया, अपनी पत्नी को भी नहीं, और वह रात के ग्यारह बजे दुकान में जाकर बैठ गया, शटर भीतर से गिराकर। तीन बजकर कुछ मिनट पर आवाज़ शुरू हुई। आवाज़ उसके सामने से आ रही थी, तीन हाथ की दूरी से।

मशीन नहीं चल रही थी। पहिया नहीं घूम रहा था। पट्टा कील पर टँगा था और हिल भी नहीं रहा था। आवाज़ पूरी थी। पहिये की, पट्टे की, पत्थर की, और उसके भीतर वह हल्की सी घरघराहट भी जो तब आती है जब गेहूँ ख़त्म होने को हो।

अल्ताफ़ के सामने दो चीज़ें थीं। शटर उसके पीछे था और उसे उठाने में सात-आठ सेकंड लगते। वह उठा नहीं और उसने शटर की तरफ़ देखा तक नहीं।

वह बीस मिनट वहीं बैठा रहा, फ़र्श पर, दीवार से टिका हुआ, और उसने आवाज़ पूरी सुनी। यह उसने डर से नहीं किया। उसने बाद में अपनी पत्नी से यही कहा कि वह उठ सकता था और उसने उठना नहीं चाहा।

आवाज़ बंद हुई और उसके बाद चुप्पी थी।

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उस चुप्पी में उसे अपनी साँस सुनाई दी और शटर के बाहर से गली की आवाज़ें आती रहीं, कुत्ते, कोई दूर की गाड़ी, वही सब जो हर रात होता है। वह और आधा घंटा वहीं बैठा रहा और फिर उसने शटर उठाया और बाहर निकल आया। सुबह की पहली अज़ान उसी वक़्त हुई।

उस रात के बाद वह आवाज़ दोबारा नहीं आई। न उस हफ़्ते, न उस बरस। मशीन उसने नहीं बेची। वह वहीं रखी रही और शटर बंद रहा।

पट्टा अब भी उसी कील पर टँगा है और चमड़ा सूखकर सख़्त हो चुका है। उस पर हाथ फेरने से अब भी आटे की हल्की सी बू आती है, जो हर चक्की के पट्टे से आती है, चाहे वह कितने भी बरस से न चला हो।