जगमाल उस गाँव में सिलाई मशीन ठीक करने आया था और तीन दिन वहाँ साहब कहलाया। इसमें उसकी कोई ग़लती नहीं थी। किसी की नहीं थी।

उस दिन वह सफ़ेद कमीज़ पहने था, क्योंकि उसकी दूसरी कमीज़ धुल रही थी। उसकी मोटरसाइकिल काली थी और उस पर पीछे एक कपड़े का थैला बँधा था, जिसमें काग़ज़ थे। काग़ज़ बिल थे। उसके अपने बिल, जो उसे महीने के आख़िर में जोड़ने होते हैं।

और उसी सुबह उस स्कूल में ब्लॉक से निरीक्षण आने की ख़बर आई थी। ख़बर पक्की थी और तारीख़ पक्की नहीं थी, यानी हफ़्ते में किसी दिन। इतना जान लेने पर आगे की सारी बात अपने आप बैठ जाती है।

जगमाल स्कूल के सामने रुका, क्योंकि उसे रास्ता पूछना था। वहाँ रामेश्वर खड़ा था, जो उस स्कूल में तेरह बरस से है और पानी, घंटी और रजिस्टर तीनों देखता है। रामेश्वर ने उसे देखा, कमीज़ देखी, थैला देखा, और उसने कहा कि नमस्ते साहब।

जगमाल ने कहा कि वह साहब नहीं है। साफ़ कहा। इस पर रामेश्वर हल्का-सा हँसा। उस हँसी का मतलब यह था कि उसे मालूम है। निरीक्षण करने वाले बताकर नहीं आते, यह उस स्कूल में सब जानते हैं, और पिछले बरस एक साहब बिना बताए आए भी थे।

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जगमाल ने दोबारा कहा कि वह मशीन ठीक करता है और उसे रुक्मणी देवी के घर जाना है। रामेश्वर ने कहा कि जी साहब, चलिए, मैं ले चलता हूँ। रुक्मणी देवी उस गाँव में सिलाई सिखाती हैं और उनकी मशीन का बॉबिन केस टूट गया था।

मशीन खुल गई और तब पता चला कि वह पुर्ज़ा गाँव में नहीं मिलेगा। वह जालोर से आना था और उसमें तीन दिन लगते हैं। यानी जगमाल तीन दिन वहीं था। तीन पूरे दिन। उन तीन दिनों में उस स्कूल में जो हुआ, वह उसने अपनी आँखों से देखा।

पहले दिन दोपहर तक पीछे की टूटी खिड़की में नया शीशा लग गया। उसी शाम पानी की टंकी साफ़ हुई, जो अप्रैल से नहीं हुई थी।

दूसरे दिन दो रजिस्टर पूरे किए गए और उनमें पिछले चार महीने की हाज़िरी स्याही से चढ़ाई गई, जो चढ़ी हुई थी ही, पर पेंसिल से। और दूसरे दिन दोपहर हेडमास्टर आए, जो उस दिन छुट्टी पर थे। जगमाल ने इन तीन दिनों में कम से कम आठ बार कहा कि वह निरीक्षक नहीं है।

हर बार उसकी बात का उलटा असर हुआ। जब उसने चाय के पैसे देने की कोशिश की, तो यह उसके सरकारी होने का सबूत माना गया, क्योंकि साहब लोग पैसे देने की कोशिश ज़रूर करते हैं। जब उसने अपना थैला खोलकर बिल दिखाए, तो रामेश्वर ने कहा कि साहब, इसकी क्या ज़रूरत थी।

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जब वह दूसरे दिन शाम को चिढ़ गया और ज़रा ऊँची आवाज़ में बोला, तो उसकी बात और पक्की हो गई। और जब उसने कहा कि वह कल चला जाएगा, तो हेडमास्टर ने कहा कि आप फिर आइएगा। इस पूरे मामले में एक बात साफ़ थी।

गाँव के लोग बेवक़ूफ़ नहीं थे। उनके पास जो-जो निशानी थी, उससे वही नतीजा निकलता था, और उन्होंने वही निकाला। तीसरे दिन असली निरीक्षक आए। जीप से उतरे। वे जीप में आए, जो और चार सवारियों से भरी थी, और उनकी कमीज़ चौख़ाने वाली थी।

उन्होंने आकर कहा कि वे ब्लॉक से आए हैं। उन पर किसी को भरोसा नहीं हुआ। एक को भी नहीं। इसकी वजह भी सादा थी। साहब पहले से मौजूद थे और वे रुक्मणी देवी के आँगन में मशीन खोलकर बैठे थे।

रामेश्वर ने असली निरीक्षक से बड़ी शालीनता से कहा कि साहब उधर हैं। उसके बाद जो हुआ, वह उस गाँव में अब भी सुनाया जाता है। असली निरीक्षक चलकर उस आँगन तक गए और उन्होंने जगमाल को देखा, जिसके हाथ काले थे और सामने मशीन के पुर्ज़े फैले थे।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा। दो-तीन मिनट देखा। फिर असली निरीक्षक ने पूछा कि आप कौन हैं। जगमाल ने कहा कि यही मैं तीन दिन से पूछ रहा हूँ।

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उसके बाद दोनों वहीं बैठे और उन्होंने चाय पी, और चाय के पैसे इस बार किसी ने नहीं लिए। निरीक्षण उसी दिन हुआ। वह ठीक निकला। रजिस्टर पूरे थे, टंकी साफ़ थी, और खिड़की में शीशा था।

एक बात उस दिन के बाद उस स्कूल में तय हो गई। जो भी सुधार उन तीन दिनों में हुए, उनमें से कोई वापस नहीं लौटा। शीशा लगा रहा। टंकी उसके बाद हर दो महीने में साफ़ होती है और उसकी तारीख़ रजिस्टर में लिखी जाती है, और यह लिखना रामेश्वर ने अपनी तरफ़ से शुरू किया।

जगमाल का पुर्ज़ा शाम की बस से आया और उसने मशीन उसी रात ठीक कर दी। जाते वक़्त उसने रामेश्वर से कुछ नहीं कहा और रामेश्वर ने भी नहीं, और दोनों ने हाथ जोड़े।

आठ बरस बाद उस गाँव में जगमाल की अपनी दुकान है, बस अड्डे के पास, और वह वहीं रहता है। पिछले बरस स्कूल में नई टंकी लगी और भुगतान से पहले समिति ने उससे कहा कि जोड़ ठीक हैं या नहीं, यह आप देख लो। वह गया, दो घंटे लगे, और उसने एक काग़ज़ पर तीन बातें लिखकर दे दीं, और पैसे नहीं लिए। उस काग़ज़ पर उसने अपना नाम लिखा और नाम से पहले कुछ नहीं लिखा।