उस दीवार पर अब पाँच स्विच हैं और ट्यूबलाइट एक है। काम करता एक ही है। सिर्फ़ एक। बात मंदिर के बरामदे की है, जहाँ शाम को लोग बैठते हैं। ट्यूबलाइट वहाँ दो हज़ार बीस में लगी थी और तीन बरस ठीक चली।

फिर वह टिमटिमाने लगी। रोज़ शाम। टिमटिमाना बिजली की भाषा में एक ही चीज़ का नाम नहीं है और इसीलिए यह पूरा किस्सा बना। पहले हरिराम ने उसे देखा। हरिराम मंदिर के पास ही रहता है और उसे बिजली का काम आता है, सीखा हुआ नहीं, देखा हुआ।

उसने चोक बदल दिया। अपने पैसे से। चोक बदलने पर वह चार दिन ठीक चली और पाँचवें दिन फिर टिमटिमाई। पाँचवें दिन उसने यह किसी को नहीं बताया कि चोक उसने बदला था। उसने किसी से नहीं कहा। किसी से भी नहीं।

इसकी वजह छोटी है और असली है। बिजली का काम करके बताने पर, अगर वह ठीक न हो, तो आदमी की बात कमज़ोर पड़ती है। और अगर वह ठीक हो जाए, तो बताने की ज़रूरत भी नहीं रहती, क्योंकि लाइट जलती दिख जाती है।

यानी दोनों हालत में चुप रहना बेहतर है। चारों ने यही किया, अलग-अलग, बिना एक-दूसरे को जाने। दूसरा मानसिंह था। उसे कुछ मालूम नहीं था। उसने महीने भर बाद उसे देखा और उसने स्टार्टर बदल दिया। स्टार्टर सस्ता होता है और वह पहली कोशिश में यही बदला जाता है।

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चोक नया है, यह उसे मालूम नहीं था। अगर मालूम होता तो वह स्टार्टर पर वक़्त नहीं देता, क्योंकि नया चोक और पुराना स्टार्टर एक साथ ख़राब नहीं होते। स्टार्टर बदलने पर वह छह दिन ठीक चली। तीसरा भागचंद था और उसने सबसे बड़ा काम किया।

उसने यह मान लिया कि तार पुराना है, जो एक ठीक अंदाज़ा था। उसने बरामदे की छत के नीचे से एक नया तार खींचा और उसके लिए एक नया स्विच लगाया, क्योंकि पुराने स्विच तक जाने का रास्ता उसे मुश्किल लगा।

यहाँ पहला अतिरिक्त स्विच आया। दूसरा वाला। पुराना स्विच उसने हटाया नहीं। हटाने में प्लास्टर टूटता है और मंदिर की दीवार का प्लास्टर तोड़ने की बात वह अपने ऊपर नहीं लेना चाहता था। नए तार पर वह ट्यूबलाइट ग्यारह दिन ठीक चली।

ग्यारह दिन बाद जो हुआ, उसमें ट्यूबलाइट की कोई ग़लती नहीं थी। पुराना स्विच किसी ने चढ़ा दिया। किसने, यह आज तक नहीं मालूम। अब दोनों तार जुड़े हुए थे, दोनों स्विच से, और उससे वह ऐसी जलने लगी जैसे टिमटिमा रही हो।

चौथा ऊधम था, जो सबसे कम जानता था और जिसने सबसे ठीक काम किया। उसने ट्यूबलाइट बदल दी। पूरी बदल दी। नई ट्यूब में सत्तर रुपए लगे और वह अपने पैसे से लाया। वह ठीक जली और आज भी जल रही है।

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पर उसने भी एक नया स्विच लगाया, क्योंकि उस वक़्त दीवार पर दो स्विच थे और उसे यह नहीं मालूम था कि कौन सा किस चीज़ का है। उसने दोनों को छोड़ दिया और तीसरा लगाया। यह तीसरा है और पाँच की गिनती अभी बाक़ी है।

बीच में एक शाम ऐसी आई जब वह ट्यूबलाइट जली ही नहीं। उस शाम बरामदे में अठारह लोग थे, क्योंकि सावन का सोमवार था। अँधेरे में तीनों स्विच बारी-बारी दबाए गए और किसी से कुछ नहीं हुआ। फिर एक लड़के ने बताया कि पूरे मुहल्ले की बिजली गई हुई है।

यह बात पहले किसी ने नहीं देखी थी, क्योंकि बाहर की सड़क पर बल्ब नहीं है। उस अँधेरे में लगभग दस मिनट स्विचों पर बहस हुई और वह बहस बाद में कई बार सुनाई गई।

चौथा स्विच समिति ने लगवाया।

समिति की बैठक में यह बात उठी कि बरामदे में तीन स्विच हैं और किसी को नहीं मालूम कौन सा चलता है। तय हुआ कि एक बिजली वाला बुलाया जाए, क़स्बे से, पैसे देकर। बिजली वाला आया और उसने आधा घंटा लगाया।

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उसने बताया कि तीनों में से एक चलता है और दो में तार जुड़े ही नहीं हैं। उसे साफ़ करने के लिए उसने एक नया, ठीक स्विच लगाया और उसके नीचे एक पर्ची चिपकाई, जिस पर लिखा था कि यही चलता है।

पुराने तीनों उसने नहीं हटाए और इसकी वजह उसने बता दी, कि हटाने में ज़्यादा पैसा लगेगा। पर्ची चार महीने में गल गई। बरसात में। पाँचवाँ स्विच सबसे नया है और वह उस पर्ची के गलने के बाद लगा। वह किसी ने नहीं लगाया, वह पहले से वहीं था।

बरामदे के कोने में एक पुराना गोल स्विच है, जो पंखे का था और जिसका पंखा बरसों पहले उतर चुका है। पर्ची गलने के बाद लोग उसे भी दबाकर देखने लगे और उस तरह वह गिनती में आ गया। यानी पाँच में से एक चलता है और चार बेकार हैं।

और उस एक को सब जानते हैं। सब बुज़ुर्ग जानते हैं। जानने का तरीक़ा यह है कि वह बाईं तरफ़ से तीसरा है, और यह बात वहाँ बैठने वाले सब बुज़ुर्गों को याद है। नए आदमी को यह बताना पड़ता है और बताने वाला हर बार हाथ से इशारा करता है, गिनकर।

पिछले जेठ में हरिराम, मानसिंह, भागचंद और ऊधम एक ही शाम वहाँ बैठे थे और बात स्विचों पर आ गई। तब पहली बार चारों ने बताया कि किसने क्या किया था, और उसमें आधा घंटा लगा, और चारों को यह जानकर अच्छा लगा कि उनमें से कोई अकेला ग़लत नहीं था। उस शाम यह भी तय हुआ कि चारों बेकार स्विच उतरवा दिए जाएँ, और यह बात उसके बाद किसी बैठक में नहीं उठी।