कुर्सियाँ इक्यावन ख़रीदी गई थीं और यह गिनती जान-बूझकर रखी गई थी, क्योंकि शुभ मानी जाती है। मंदिर समिति ने उन्हें दो हज़ार चौबीस में ख़रीदा, चंदे के पैसे से, तीन सौ बीस रुपए की एक। मक़सद यह था कि गाँव में किसी के घर कार्यक्रम हो तो कुर्सियाँ किराए पर न लानी पड़ें। यह मक़सद पूरा भी हुआ।
डेढ़ बरस बाद जब गिनी गईं, तब सत्रह थीं। सिर्फ़ सत्रह। चोरी एक भी नहीं हुई थी। एक भी नहीं। चौंतीस कुर्सियाँ गाँव के अलग-अलग घरों में थीं और हर घर में उनके होने का एक कारण था। समिति ने पहली बैठक की और उसमें यह तय हुआ कि सब घरों से कुर्सियाँ वापस माँगी जाएँ।
यह काम किशनलाल को दिया गया, जो समिति का कोषाध्यक्ष है और जिसे गाँव में हिसाब का आदमी माना जाता है। उसने घर-घर जाना शुरू किया और पहले ही घर में उसे समझ आ गया कि यह काम वैसा नहीं है जैसा दिखता है।
पहले घर में तीन कुर्सियाँ थीं। तीनों वहीं पड़ी थीं।
उस घर के आदमी ने कहा कि ये तीन उसे तेरहवीं के दिन दी गई थीं और वापस माँगी नहीं गईं, इसलिए वह मान बैठा कि दे दी गई हैं। किशनलाल ने कहा कि दान में कुर्सी नहीं दी जाती। कभी नहीं।
उस आदमी का जवाब यह था कि तो लिखकर देना चाहिए था। पहली कुर्सी लौटी और बाक़ी दो पर बात होती रही और वे भी लौट आईं, चौथे चक्कर में। दूसरे घर में चार थीं और वहाँ मामला दूसरा था। उस घर वाले ने कहा कि उसकी अपनी दो कुर्सियाँ मंदिर में रह गई थीं और उनके बदले में उसने ये चार रखी हैं।
किशनलाल ने पूछा कि दो के बदले चार क्यों रखीं। उसने कहा कि उसकी दोनों लोहे की थीं। ये प्लास्टिक की हैं। यह हिसाब ग़लत नहीं था और उसे मानने का कोई तरीक़ा भी नहीं था। आख़िर में तीन लौटीं और एक वहीं रह गई, और वह आज भी वहीं है।
तीसरे घर में सात कुर्सियाँ थीं। वहाँ कोई बहस नहीं हुई। उस घर के लड़के की शादी थी और उसने सातों लौटा दीं, उसी दिन, बिना कुछ कहे। पर उनमें से पाँच पर सफ़ेद रंग से एक नंबर लिखा था, जो उसने अपनी शादी में लिखवाया था, ताकि उसकी कुर्सियाँ मिल जाएँ।
यानी मंदिर की पाँच कुर्सियों पर अब उस घर का नंबर लिखा था। इस पर समिति की दूसरी बैठक हुई और उसमें आधा घंटा इस बात पर गया कि नंबर मिटाया जाए या रहने दिया जाए। मिटाने पर प्लास्टिक ख़राब होता है। यह एक आदमी ने बताया।
रहने देने पर लोग समझेंगे कि वे उस घर की हैं, यह दूसरे ने बताया। आख़िर में तय हुआ कि सब कुर्सियों पर नंबर लिखा जाए, मंदिर का, और उसी सफ़ेद रंग से। यह अच्छा फ़ैसला था और उसे लागू करने में तीन महीने लगे, क्योंकि तब तक सारी कुर्सियाँ इकट्ठा ही नहीं हुई थीं।
चौथे घर में दो थीं और वह घर सबसे मुश्किल निकला।
उस घर की बूढ़ी औरत उन्हीं दो में से एक पर बैठती थी और उसे उसकी आदत पड़ चुकी थी, क्योंकि उसकी ऊँचाई उसके घुटने के हिसाब से ठीक थी। किशनलाल दो बार गया और दोनों बार वह उसी कुर्सी पर बैठी मिली।
तीसरी बार वह मंदिर से एक दूसरी कुर्सी उठाकर ले गया और उसने कहा कि यह ले लो, वह दे दो। उस औरत ने दोनों पर बैठकर देखा और कहा कि यह नीची है। दोनों एक ही जैसी थीं। एक ही दिन, एक ही दुकान से आई थीं।
किशनलाल ने उससे आगे कुछ नहीं पूछा और वह कुर्सी वहीं छोड़ आया।
पाँचवें से पंद्रहवें घर तक जो हुआ, वह लगभग एक ही था। हर घर में कुर्सियाँ एक से चार के बीच थीं और हर घर में एक कारण था, और वे कारण दोहराए नहीं जा रहे। सबसे आम कारण यह था कि कुर्सी माँगी नहीं गई थी, इसलिए रख ली गई। किशनलाल ने बाद में गिनकर बताया कि उसने कुल एक सौ छह चक्कर लगाए।
सोलहवाँ घर उस पूरे काम का सबसे अच्छा हिस्सा है। उस घर में तीन कुर्सियाँ थीं और तीनों पर मंदिर का नया नंबर लिखा हुआ था, सफ़ेद रंग से, जो समिति ने ख़ुद लिखवाया था। उस घर के आदमी ने कहा कि नंबर लिखा है, तो साफ़ है कि किसने दी हैं। किशनलाल ने कहा कि नंबर इसलिए लिखा है कि पता रहे किसकी हैं। घर वाले ने हाथ उठाकर कहा कि हाँ, यही तो वह कह रहा है। इस पर आधा घंटा गया।
पूरा हिसाब बैठने में इक्कीस महीने लगे। पूरे इक्कीस। आख़िरी गिनती में सैंतालीस कुर्सियाँ मंदिर में थीं। चार अब भी बाहर हैं और चारों जगहों का नाम समिति के रजिस्टर में लिखा है।
उन चारों के आगे कारण भी लिखा है और वे कारण किशनलाल ने अपने हाथ से लिखे हैं। एक के आगे लिखा है कि लोहे की दो कुर्सियों के बदले। दूसरे के आगे, कि बुज़ुर्ग की ऊँचाई। तीसरे और चौथे के आगे उसने वही लिखा है जो उसे बताया गया था, और वह रजिस्टर बैठक में पढ़ा जाता है और हर बार उस पर कोई हँस देता है।