अमरचंद नौ दिन उस गाँव में रहा और उसने अठारह बार पूरा खाना खाया। दिन में दो बार। दो घरों में। दोनों घर आमने-सामने हैं और उनके बीच गली आठ फ़ुट की है। एक घर धनकौर का है और दूसरा चंपादेवी का।
दोनों में रिश्ता है और वह रिश्ता दूर का है, यानी दोनों एक ही परिवार से नहीं हैं, पर दोनों की ससुराल एक ही गाँव में है। अमरचंद दोनों का रिश्तेदार है और दोनों तरफ़ से बराबर का। धनकौर का वह चचेरा भाई है।
चंपादेवी के पति का वह ममेरा भाई है। यही पूरी दिक़्क़त है। यह गिनती किसी ने बनाई नहीं थी। वह आया शादी के लिए, जो गाँव में तीसरे घर पर थी, और उसे नौ दिन रुकना था, क्योंकि उसे वापसी की टिकट उसी हिसाब से मिली थी।
पहुँचते वक़्त वह बस से उतरा और गली में घुसा। दोनों दरवाज़ों पर उसे देख लिया गया। धनकौर ने कहा कि सामान अंदर रखो। बस इतना कहा। चंपादेवी ने कहा कि ऊपर का कमरा ख़ाली है। दोनों बातें एक ही वक़्त कही गईं और यह उस गली में खड़े दो-तीन लोगों ने सुना।
अमरचंद ने जो किया, वह उस वक़्त सबसे सुरक्षित लगा था। उसने सामान धनकौर के घर रखा और कहा कि खाना वह चंपादेवी के यहाँ खाएगा। यह बात दोनों ने मान ली। ऊपर से मान ली। अंदर से किसी ने नहीं मानी और यह उसी शाम साफ़ हो गया।
पहली शाम उसने चंपादेवी के यहाँ खाया। लौटकर धनकौर के घर पहुँचा तो थाली लगी हुई थी। थाली लगाने वाले को यह मालूम था कि वह खाकर आ रहा है। थाली इसीलिए लगी थी। यही उसका मक़सद था। अमरचंद ने कहा कि उसने खा लिया है।
धनकौर ने कहा कि थोड़ा-सा ले लो। बस थोड़ा-सा। यह वाक्य उस पूरे किस्से में सत्रह बार आया, दोनों घरों से मिलाकर। थोड़ा-सा का मतलब वहाँ थोड़ा-सा नहीं होता।
उस रात उसने दूसरी बार खाया, और अगले दिन से यह चलन बन गया। सुबह का खाना धनकौर के यहाँ, दोपहर का चंपादेवी के यहाँ, शाम का धनकौर के यहाँ, और रात का चंपादेवी के यहाँ। दो बार वह पेट भरने के लिए खाता था और दो बार बचने के लिए।
बचने वाले खाने में उसने एक तरीक़ा निकाला और वह चार दिन काम आया। वह रोटी नहीं लेता था, बस दाल-सब्ज़ी लेता था, और चावल आधे।
पाँचवें दिन धनकौर ने पूछा कि रोटी क्यों नहीं लेते। उसने कहा कि पेट में गैस है। यह उसने सोचकर कहा था। यह जवाब उस घर में दो घंटे में फैल गया और उसका नतीजा उलटा निकला।
उस शाम उसके लिए अलग से हल्का खाना बना, दलिया, और वह उसे खाना पड़ा, पूरा, क्योंकि वह अलग से बना था। उसके बाद उसने गैस का ज़िक्र दोबारा नहीं किया। इस बीच एक और बात चल रही थी, जिसका उसे छठे दिन पता चला।
दोनों घरों में यह पूछा जाता था कि दूसरी तरफ़ क्या बना था। पूछने का तरीक़ा सीधा नहीं होता। कभी नहीं होता। धनकौर पूछती थी कि आज दोपहर में क्या खाया। अमरचंद नाम गिना देता था और उसके बाद उस शाम उससे एक चीज़ ज़्यादा बनती थी।
चंपादेवी का तरीक़ा और अच्छा था। वह पूछती ही नहीं थी। वह अपने बेटे से पूछ लेती थी, जो गली में खेलता था और जिसे दोनों रसोइयों की गंध का हिसाब रहता था। सातवें दिन अमरचंद ने वह काम किया जो उसे पहले दिन करना चाहिए था।
उसने दोनों से एक साथ बात करने की कोशिश की। उसने दोनों को अपने कमरे में बुलाया, जो धनकौर के घर में था, और यही उसकी ग़लती थी। चंपादेवी वहाँ नहीं आई। आई ही नहीं। उसने कहा कि वह बाद में सुन लेगी और वह बाद कभी नहीं आया।
आठवें और नौवें दिन उसने कोशिश छोड़ दी और चारों खाने खाए। जाते वक़्त दोनों घरों ने उसे रास्ते का खाना बाँधकर दिया। दोनों पोटलियाँ उसने बस में रखीं और दोनों घर तक नहीं खोलीं। एक पोटली उसने रास्ते में खोली और दूसरी घर पहुँचकर, और यह क्रम उसने जान-बूझकर रखा।
नौ दिन में उसका वज़न कितना बढ़ा, यह उसने घर पहुँचकर नापा। तीन किलो। इसमें से डेढ़ किलो अगले महीने में उतर गया और डेढ़ नहीं उतरा। एक और चीज़ हुई जो उसे नौ दिन तक करनी पड़ी और जो सबसे थका देने वाली थी।
उसे हर बार यह ध्यान रखना पड़ता था कि वह किस दरवाज़े से निकल रहा है और दूसरी तरफ़ कोई खड़ा है या नहीं। गली आठ फ़ुट की है और दोनों दरवाज़े आमने-सामने हैं। उसने चौथे दिन से एक तरीक़ा निकाल लिया, कि वह पहले गली में झाँकता था, फिर निकलता था।
यह उसे उन नौ दिनों का सबसे मुश्किल काम लगा, खाने से भी ज़्यादा। अगले बरस उसी गाँव में एक और शादी थी और अमरचंद को दोबारा जाना था। उस बार उसने पहले से चिट्ठी भेज दी और उसमें लिखा कि वह धर्मशाला में रुकेगा, जो मंदिर के पीछे है।
इसे दोनों घरों ने अपनी हार माना और दोनों ने यह किसी से कहा नहीं। पर दोनों ने उसके खाने का इंतज़ाम वहीं करवा दिया, और दोनों टिफ़िन एक ही वक़्त पहुँचते थे, बारह बजे, और धर्मशाला के उस कमरे में एक ही मेज़ है, इसलिए वे दोनों उसी पर रखे जाते थे, आमने-सामने।