छपी हुई सूची में मंगलचंद का नाम था और खेलना उसके बेटे को था। फ़ॉर्म उसने ख़ुद भरा था। अपने हाथ से। ब्लॉक का खेल दिवस हर बरस अगहन में होता है और उसमें दौड़, कबड्डी और रस्साकशी होती है।

रस्साकशी में आठ आदमी की टीम होती है और उसमें उम्र की कोई सीमा नहीं है। यही बात आगे काम आई और यही सबसे बड़ी दिक़्क़त बनी। फ़ॉर्म में तीन ख़ाने थे। खिलाड़ी का नाम, पिता का नाम, और गाँव।

मंगलचंद ने पहले ख़ाने में अपना नाम लिखा, आदत से, क्योंकि वह जो भी काग़ज़ भरता है उसमें पहला नाम अपना लिखता है। दूसरे ख़ाने में उसने अपने पिता का नाम लिखा। यानी पूरा फ़ॉर्म उसका बन गया, और उसके बेटे फतेह का नाम उसमें कहीं नहीं था।

उसे यह उसी वक़्त पकड़ लेना चाहिए था और उसने पकड़ा नहीं। वजह यह थी कि फ़ॉर्म भरते वक़्त वह घर के बाहर खड़ा था और स्कूल का लड़का जल्दी में था। फ़ॉर्म चला गया। उसी दिन। सूची पंद्रह दिन बाद छपकर आई और स्कूल की दीवार पर चिपकी।

उस सूची में उस गाँव से आठ नाम थे और सातवाँ मंगलचंद था। फतेह ने वह सूची पहले देखी। सबसे पहले। उसने घर आकर बताया और बताते वक़्त वह हँस नहीं रहा था। वह चौदह का है और उसने पूरे बरस इसका इंतज़ार किया था।

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मंगलचंद उसी शाम स्कूल गया। पैदल। मास्टर ने बात सुनी और कहा कि नाम बदलवाना पड़ेगा। बदलवाने का तरीक़ा यह था कि एक अर्ज़ी ब्लॉक कार्यालय भेजी जाए, जिस पर स्कूल की मुहर हो, और उसमें कारण लिखा हो। यहाँ मंगलचंद ने वह सवाल पूछा जो कोई भी पूछता।

उसने पूछा कि कारण में क्या लिखेंगे। मास्टर ने कहा कि सच लिख देंगे। और सच यही था। सच यह था कि फ़ॉर्म भरने वाले ने अपना नाम लिख दिया। वह अर्ज़ी ब्लॉक में जाती, वहाँ पढ़ी जाती, और चार-पाँच लोगों को मालूम हो जाता।

इससे बुरा यह था कि अर्ज़ी की एक कापी स्कूल में रहती। मंगलचंद ने दो दिन सोचा और तीसरे दिन उसने मास्टर से कहा कि अर्ज़ी नहीं भेजनी। मास्टर ने पूछा कि फिर क्या। उसने कहा कि वह ख़ुद खेल लेगा। इकतालीस की उम्र में।

यह जवाब सुनकर मास्टर ने उसे दो मिनट देखा और फिर एक ही बात कही, कि टीम आठ की है और वह आठवाँ नहीं है, सातवाँ है। इसका मतलब यह था कि उसे सचमुच रस्सा पकड़ना पड़ेगा। मंगलचंद इकतालीस का है और उसका काम खेत का है, तो ताक़त की कमी नहीं थी।

रस्साकशी में ताक़त आधी चीज़ है। सिर्फ़ आधी। बाक़ी आधी यह है कि आठ आदमी एक ही वक़्त पर खींचें, और यह अभ्यास से आता है। गाँव की टीम इक्कीस दिन तक शाम को अभ्यास करती रही और मंगलचंद उसमें सातवें पर लगा।

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फतेह हर शाम वहाँ आता था। वह खेल नहीं सकता था और उसे भेजा भी नहीं जा सकता था। पहले चार दिन वह किनारे बैठा रहा। चुपचाप।

पाँचवें दिन उसने एक काम पकड़ लिया। वह रस्से पर निशान की जगह देखता था और खींचते वक़्त गिनती बोलता था, एक-दो, एक-दो, ताकि सब एक साथ खींचें। यह काम असली था। किसी ने उसे यह करने को नहीं कहा था।

इक्कीस दिन के अभ्यास में जो सबसे मुश्किल बात निकली, वह उम्र नहीं थी। वह यह थी कि मंगलचंद को सबसे आगे लगने की आदत है। खेत का काम हो, मेड़ बाँधनी हो, या छत की ढलाई हो, वह आगे लगता है।

रस्साकशी में सातवाँ आदमी पीछे से दूसरा होता है और उसका काम खींचना नहीं, टिकना है। पहले छह दिन वह हर बार आगे की तरफ़ झुक जाता था और इससे पूरी लाइन आगे खिंच जाती थी। उसे यह टीम के कप्तान ने बताया, जो उससे बारह बरस छोटा है।

बताने में उसने बहुत नरमी बरती और मंगलचंद ने उस पर कुछ नहीं कहा, बस अगले दिन से पैर पीछे टिकाकर खड़ा होने लगा। अगहन में खेल दिवस हुआ और उस गाँव की टीम तीसरे नंबर पर आई, आठ टीमों में।

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पहला दौर वे जीते, दूसरा जीते, और तीसरे में हार गए, क्योंकि सामने वाली टीम में पाँच आदमी पत्थर तोड़ने वाले थे। तीसरा दौर छब्बीस सेकंड चला, जो उस दिन का सबसे लंबा दौर था, और उसमें रस्सा दो बार बीच पर लौटा।

तीसरे नंबर पर प्रमाण पत्र मिलता है और वह मंगलचंद के नाम से बना। प्रमाण पत्र उसके घर की दीवार पर लगा है, बैठक में, फ़्रेम में। उसमें उसका नाम है और उसके नीचे उसके पिता का नाम है, और फतेह का नाम उसमें कहीं नहीं है।

अगले बरस का फ़ॉर्म फतेह ने ख़ुद भरा और उसमें उसने अपना नाम पहले ख़ाने में लिखा, और लिखने के बाद उसे अपने बाप को दिखाया, दो बार। वह टीम में लगा और उसी शाम से अभ्यास शुरू हुआ, और उस अभ्यास में मंगलचंद किनारे पर खड़ा होता है और गिनती बोलता है, एक-दो, एक-दो, जो काम पिछले बरस उसका बेटा करता था।