नौवाँ लिफ़ाफ़ा तिलकराम के घर मंगलवार की सुबह पहुँचा और उसे देखकर उसकी बहू हँस पड़ी, क्योंकि वह अब तक के सब लिफ़ाफ़ों में सबसे अच्छा था।
उस पर सुनहरी किनारी थी।
इससे पहले के आठ सादे थे और उनमें से दो पर दुकान का नाम छपा था, जो लिफ़ाफ़ा भेजने वालों के हिसाब से ठीक नहीं माना जाता। पूरा मामला ढाई सौ रुपए का है। यह पंद्रह महीने पुराना मामला है।
दो हज़ार चौबीस के अगस्त में तिलकराम का पोता बीमार पड़ा और उसे रात के ग्यारह बजे नागौर ले जाना पड़ा। गाड़ी घासीराम की थी और वह ख़ुद चलाकर ले गया। रास्ते में डीज़ल डलवाया गया और उसका बिल ढाई सौ का बना।
पैसे घासीराम ने दिए, क्योंकि उस वक़्त तिलकराम की जेब में जो था वह अस्पताल में लगना था। यहाँ तक कोई दिक़्क़त नहीं है। दिक़्क़त तीन दिन बाद शुरू हुई। तिलकराम ने पहला लिफ़ाफ़ा भेजा, जिसमें ढाई सौ रुपए थे और एक परची थी, और परची पर लिखा था कि डीज़ल का हिसाब।
घासीराम ने वह उसी शाम लौटा दिया। बिना खोले। उसने कहा कि गाड़ी उस रात नागौर जा ही रही थी, क्योंकि उसे सुबह मंडी जाना था, इसलिए डीज़ल का हिसाब बनता नहीं है। यह बात आधी सही थी। गाड़ी सचमुच जानी थी, पर वह सुबह जाती, और रात ग्यारह बजे नहीं।
दूसरा लिफ़ाफ़ा तिलकराम ने पंद्रह दिन बाद भेजा और उसमें तीन सौ रुपए थे। पचास उसने अपनी तरफ़ से जोड़े थे, इस बात के लिए कि लिफ़ाफ़ा दोबारा भेजना पड़ा। यहीं से यह मामला हिसाब का नहीं रहा। तीसरा लिफ़ाफ़ा घासीराम का था और उसमें तीन सौ पचास थे, क्योंकि जोड़ने का चलन अब बन चुका था।
उसके साथ एक किलो लड्डू भी आए। लड्डू लौटाना नामुमकिन है। चौथे लिफ़ाफ़े में तिलकराम ने चार सौ रखे और उसके साथ कुछ नहीं भेजा, क्योंकि लड्डू के बराबर की कोई चीज़ उसे मिली नहीं। पाँचवें में घासीराम ने चार सौ पचास रखे और उसके साथ अपनी बहू के हाथ का बना अचार भेजा, दो किलो।
इस पर तिलकराम की पत्नी ने पहली बार दख़ल दिया। उसने कहा कि अब इसे बंद करो, क्योंकि आगे कोई बड़ी चीज़ आएगी। उसकी यह बात सही निकली। छठे लिफ़ाफ़े में पाँच सौ थे और उसके साथ एक कंबल गया, क्योंकि दिसंबर था।
सातवाँ लिफ़ाफ़ा घासीराम ने भेजा और उसके साथ कुछ नहीं भेजा, और इसकी वजह उसने बाद में बताई। उसे कोई चीज़ मिल नहीं रही थी जो कंबल के बराबर हो और कंबल से बड़ी न हो। इस बीच गाँव को यह सब मालूम हो चुका था।
मालूम कैसे हुआ, यह सादा है। दोनों घरों के बीच लिफ़ाफ़ा ले जाने का काम एक ही लड़का करता था, जो घासीराम के भाई का बेटा है, और उसने अपने दोस्तों को बता दिया।
उसके बाद उससे हर बार पूछा जाता था कि इस बार कितने हैं। आठवें पर नुक्कड़ की दुकान वाले ने बीच में पड़ने की कोशिश की। उसका सुझाव अच्छा था। उसने कहा कि पैसे उसके पास रख दिए जाएँ और दोनों उन्हें भूल जाएँ।
दोनों ने मना कर दिया। तिलकराम ने कहा कि तीसरे आदमी के पास रखा पैसा उधार हो जाता है। घासीराम ने कहा कि पैसा उसका नहीं है, तो वह रखवाएगा किस हैसियत से। दोनों बातें ठीक थीं। दुकान वाला पीछे हट गया।
नौवें लिफ़ाफ़े में छह सौ पचास रुपए थे और परची पर पहली बार पूरा हिसाब लिखा था, ढाई सौ से छह सौ पचास तक, नौ लाइनों में। वह हिसाब घासीराम ने अपने बेटे से लिखवाया था और उसमें एक भी ग़लती नहीं थी।
यह देखकर तिलकराम बैठ गया। चारपाई पर। उसने उस दिन पहली बार यह सोचा कि इसका कोई सिरा नहीं है। फिर वह सरपंच के पास गया और उसने पूरी बात बता दी, शुरू से। सरपंच पहले हँसा, फिर उसने एक तरीक़ा निकाला, और वह तरीक़ा किसी को भी ग़लत नहीं लगा।
उन दिनों स्कूल में पानी की टंकी के लिए चंदा चल रहा था। सरपंच ने कहा कि छह सौ पचास दो हिस्सों में बाँट लो और दोनों अपना-अपना हिस्सा टंकी में जमा करा दो। आधा तीन सौ पच्चीस बैठता है।
दोनों ने उसी हफ़्ते जमा करा दिया और रसीद कापी में तीन सौ पच्चीस की दो रसीदें कटीं। उस कापी में बाक़ी सब रक़में सौ, दो सौ और पाँच सौ की हैं, और लिखने वाले मास्टर ने दोनों बार पूछा कि पच्चीस क्यों।
पूछने पर तिलकराम ने कहा कि हिसाब ऐसा ही बना। घासीराम ने भी वही कहा, अलग दिन, बिना एक-दूसरे से पूछे। उसके बाद उन दोनों में कोई लिफ़ाफ़ा नहीं गया और दोनों अब भी उसी तरह मिलते हैं, चाय पर, और उस बात का ज़िक्र कोई नहीं करता।
नौ लिफ़ाफ़े अब भी हैं। वे उस लड़के के पास हैं, जो उन्हें ले जाता था। उसने हर बार ख़ाली लिफ़ाफ़ा अपने पास रख लिया था, बिना किसी वजह के, और अब उसके पास पूरे नौ हैं, तारीख़ के हिसाब से जमे हुए, और सबसे ऊपर वह सुनहरी किनारी वाला है। शादियों में वह उन्हें दिखाता है और लोग नौवाँ हाथ में लेकर उलटते-पलटते हैं, और हर बार कोई यह पूछता है कि दसवाँ क्यों नहीं आया।