शुरुआत छह इंच से हुई और यह सबको मालूम है।

हजारी और सज्जन के घर आमने-सामने नहीं हैं, बग़ल-बग़ल हैं, और उनके बीच की दीवार साझा नहीं है। दोनों की अपनी-अपनी है और उनके बीच चार इंच की जगह है। दो हज़ार चौबीस के मार्च में हजारी ने अपनी दीवार पर छह इंच की एक कोर चढ़वा दी।

इसकी वजह मुर्ग़ी थी। सज्जन के घर मुर्ग़ियाँ हैं और उनमें से एक हजारी के आँगन में कूदकर आ जाती थी और तुलसी के गमले में मिट्टी खोद देती थी। हजारी ने सज्जन से इसकी शिकायत की और सज्जन ने कहा कि मुर्ग़ी को समझाना मेरे बस में नहीं है।

यह जवाब मज़ाक़ में दिया गया था और हजारी ने उसे मज़ाक़ में नहीं लिया। छह इंच की कोर चढ़ गई। उसके बाद जो हुआ, वह मुर्ग़ी के बारे में नहीं था। सज्जन ने अगले महीने अपनी दीवार पर आठ इंच चढ़वा दी।

उसकी दीवार पर मुर्ग़ी नहीं चढ़ती थी और उसे उस कोर की कोई ज़रूरत नहीं थी। पूछने पर उसने कहा कि उसे धूप की दिक़्क़त थी। अगस्त में हजारी ने अपनी पर एक फ़ुट चढ़वाया और उसका कारण उसने यह बताया कि बरसात में छींटे आते हैं।

📚 यह भी पढ़ें छह बजे की लाइन
छह बजे की लाइन

नवंबर में सज्जन ने डेढ़ फ़ुट।

उस वक़्त तक गाँव को यह दिखने लगा था और लोग उस गली से गुज़रते हुए ऊपर देखने लगे थे। दो हज़ार पच्चीस के मार्च में हजारी ने दो फ़ुट चढ़वाया। इसमें उसका सत्रह हज़ार लगा और उसका कोई फ़ायदा नहीं था, क्योंकि उसका आँगन अब दिन में दो घंटे कम धूप पाता था।

यह उसे मालूम था। उसने फिर भी चढ़वाया। जुलाई में सज्जन ने ढाई फ़ुट चढ़वाने के लिए मिस्तरी बुलाया और वहाँ बात रुक गई। मिस्तरी ने मना कर दिया। साफ़ मना। उसने कहा कि दीवार की नींव उतनी नहीं है और इतनी ऊँची करने पर वह पहली तेज़ बरसात में गिरेगी।

यह पहली बार था जब उस पूरे मामले में किसी ने सच बोला। सज्जन ने दो और मिस्तरी बुलाए और दोनों ने वही कहा।

इस बीच गली में शर्तें लगने लगी थीं। नुक्कड़ की दुकान पर तीन-चार लोग रोज़ बैठते हैं और उन्होंने इस पर हिसाब बनाना शुरू कर दिया था, कि अगली कोर कौन चढ़वाएगा और कितने की। दुकान वाले ने बाद में बताया कि उस दौर में उसकी चाय की बिक्री बढ़ गई थी।

📚 यह भी पढ़ें नौवाँ लिफ़ाफ़ा
नौवाँ लिफ़ाफ़ा

अब सज्जन के पास दो रास्ते थे। एक, रुक जाना। दो, नींव खुदवाकर दीवार दोबारा बनवाना, जिसमें चालीस हज़ार से ऊपर लगता। उसने तीसरा रास्ता निकाला। उसने पंचायत में अर्ज़ी दे दी। लिखकर। अर्ज़ी में उसने लिखा कि हजारी की दीवार ज़्यादा ऊँची है और उससे उसके आँगन में धूप नहीं आती।

यह बात सही थी और उसने यह नहीं लिखा कि उसकी अपनी दीवार भी ठीक उसी वजह से ऊँची है। पंचायत की बैठक सितंबर में हुई और उसमें उस गली के इकतीस लोग आए, जबकि मामला दो घरों का था।

बैठक में पहला सवाल यही उठा कि किसकी दीवार ज़्यादा ऊँची है। इसका जवाब किसी को नहीं मालूम था। दोनों ने दावा किया कि दूसरे की ज़्यादा है। यहीं वह चीज़ हुई जो उस गाँव में आज तक सुनाई जाती है।

सरपंच ने फ़ीता मँगवाया। दर्ज़ी का फ़ीता। फ़ीता आया और दो लड़के छत पर चढ़े और दोनों दीवारें नापी गईं, ज़मीन से। नाप में हजारी की दीवार आठ फ़ुट चार इंच निकली। सज्जन की आठ फ़ुट सात इंच निकली। यानी सज्जन की ज़्यादा ऊँची थी, तीन इंच से, और अर्ज़ी उसी ने दी थी।

बैठक में इस पर कुछ देर सन्नाटा रहा और फिर पीछे बैठे किसी ने हँस दिया, और उसके बाद तीस लोग हँसे। सज्जन ने उस दिन कहा कि नाप ग़लत है, क्योंकि ज़मीन बराबर नहीं है। यह बात भी सही थी और उस पर आधा घंटा और लगा, और दोबारा नापा गया, और फ़र्क़ दो इंच निकला, जो अब भी उसी तरफ़ था।

📚 यह भी पढ़ें हूबहू
हूबहू

पंचायत ने फ़ैसला यह दिया कि दोनों जहाँ हैं वहीं रहें और आगे कोई कोर नहीं चढ़ेगी। यह फ़ैसला दोनों ने मान लिया, और मानने की असल वजह यह थी कि दोनों के पास पैसा भी ख़त्म हो चुका था।

फ़ैसले के बाद एक बात और हुई, जो किसी ने नहीं सोची थी। गली के बाक़ी लोगों ने पंचायत से पूछा कि उनकी दीवारों का क्या, क्योंकि अब उस गली में सबसे नीची दीवारें उनकी थीं। सरपंच ने कहा कि जिसे ऊँची करनी हो अपने पैसे से करे, और उस पर कोई आगे नहीं बढ़ा।

दोनों दीवारें आज भी वैसी हैं, और वे उस गली में सबसे ऊँची हैं और सबसे बेढब हैं, क्योंकि उन पर तीन-तीन कोरें अलग-अलग रंग के प्लास्टर की चढ़ी हैं और वे दूर से गिनी जा सकती हैं। मुर्ग़ी अब भी वहीं है और वह अब हजारी के आँगन में नहीं आती।

उसका कारण दीवार नहीं है। वह मुर्ग़ी दो बरस पहले ही बूढ़ी हो चुकी थी और अब कहीं नहीं कूदती, और यह बात दोनों घरों में किसी ने नहीं उठाई है।