लाइन छह बजे शुरू हुई और सवा बारह बजे टूटी। दफ़्तर उस दिन खुलने वाला ही नहीं था। सुगनचंद सबसे पहले पहुँचा और यह उसकी आदत है। उसे आय का प्रमाण पत्र बनवाना था, जिसके लिए तीन बार आना पड़ चुका था।
पहली बार भीड़ थी। दूसरी बार बाबू नहीं था। तीसरी बार फ़ॉर्म का नया नमूना आ गया था। इसलिए इस बार वह छह बजे आया, जबकि दफ़्तर दस बजे खुलता है। गेट पर ताला था। छह बजे यह सामान्य बात है।
वह दीवार से पीठ लगाकर बैठ गया। सात बजे तक उसके पीछे नौ लोग थे। आठ बजे तक इक्कीस हो गए। नौ बजे तक चौंतीस, और लाइन गेट से मुड़कर सड़क की तरफ़ चली गई थी।
लाइन में लगने का एक तरीक़ा होता है और उस क़स्बे में वह तरीक़ा यह है कि आदमी अपना नंबर हथेली पर लिख लेता है, स्याही से, और आगे वाले का चेहरा याद कर लेता है। यह इसलिए ज़रूरी है कि लोग बीच-बीच में चाय पीने जाते हैं और लौटकर उसी जगह घुसते हैं।
उस दिन नंबर हथेली पर लिखे गए, चौंतीस तक। दस बजे कुछ नहीं हुआ। ताला वैसा ही रहा। यह भी असामान्य नहीं था और सब जानते हैं कि दस का मतलब सवा दस होता है। साढ़े दस पर पहली आवाज़ उठी और उसने पूछा कि आज कोई छुट्टी है क्या।
इसका जवाब किसी के पास नहीं था। यहाँ पर वह चीज़ शुरू हुई जिसकी वजह से यह किस्सा बना। अब लाइन में लगे हर आदमी के पास दो रास्ते थे। एक, पूछकर पता करना और अगर छुट्टी है तो चले जाना।
दो, लगे रहना। पहला रास्ता सुनने में बेहतर लगता है और उसमें एक दिक़्क़त है। पता करने के लिए लाइन छोड़नी पड़ती है। और अगर पता करने के बीच में दफ़्तर खुल गया, तो जो आदमी पता करने गया था, वह पीछे चला जाता है।
चौंतीस में से कोई भी यह ख़तरा लेने को तैयार नहीं था। पीछे वाले तो और भी नहीं, क्योंकि उनके पीछे कोई नहीं था और वे नीचे से गिने जाते। इसलिए एक बीच का रास्ता निकाला गया, और वह भी काम नहीं आया।
तय हुआ कि किसी बच्चे को भेजा जाए। पास वाली गली से एक लड़का बुलाया गया और उसे पाँच रुपए देकर तहसील की तरफ़ भेजा गया। लड़का बीस मिनट में लौटा और उसने जो बताया, वह आधा-अधूरा था। उसने कहा कि वहाँ भी ताला है।
इससे यह साबित नहीं होता कि छुट्टी है। कुछ भी साबित नहीं होता। इससे यह साबित होता है कि तहसील भी बंद है, जो और डरावनी बात है, क्योंकि तहसील बंद होने का मतलब कुछ बड़ा है। इस पर लाइन में पंद्रह मिनट बहस हुई और उसमें तीन बातें कही गईं।
पहली, कि किसी बड़े आदमी का देहांत हो गया होगा। दूसरी, कि आज कोई राष्ट्रीय दिन है जो किसी को याद नहीं। तीसरी, धन्नालाल की थी, जो सत्रहवें नंबर पर था। उसने कहा कि आज इतवार है। बस इतना कहा।
यह बात लाइन में किसी को नहीं जमी। पूछने पर धन्नालाल ने कहा कि उसे पक्का नहीं मालूम, बस लग रहा है। और यहाँ एक बात खुली, जो उस लाइन में किसी ने पहले नहीं सोची थी।
चौंतीस लोगों में से किसी के पास ऐसा फ़ोन नहीं था जिसमें तारीख़ देखने की उसे आदत हो, और तीन के पास फ़ोन था और तीनों ने देखा नहीं, क्योंकि तारीख़ देखने की ज़रूरत रोज़ नहीं पड़ती। आख़िर में एक आदमी ने अपने बेटे को फ़ोन किया, जो जयपुर में था।
बेटे ने बताया कि आज सोमवार है। यानी धन्नालाल ग़लत था। पूरा ग़लत।
पर उसी बेटे ने आगे यह भी बताया कि आज कोई सरकारी छुट्टी है, जिसका नाम उसे भी ठीक से नहीं मालूम था, और यह उसने अपने दफ़्तर के हिसाब से कहा। बारह बजने से पहले एक आख़िरी कोशिश हुई और वह सबसे अच्छी थी।
ग्यारहवें नंबर वाले आदमी ने कहा कि दफ़्तर के चपरासी का घर वह जानता है, दो गली छोड़कर। उससे कहा गया कि जाकर पूछ आए और उसने मना कर दिया। उसने साफ़ कहा कि उसका नंबर ग्यारह है और वह उसे छोड़ने वाला नहीं है।
इस पर लाइन में किसी ने उसे ग़लत नहीं कहा। आख़िर में उसी लड़के को दोबारा भेजा गया, और उस बार दस रुपए लगे, क्योंकि दूसरा चक्कर था। लड़का लौटा और उसने बताया कि चपरासी के घर पर ताला है और पड़ोसी ने कहा कि वह गाँव गया है।
सवा बारह बजे लाइन टूटी। कोई एक साथ नहीं गया। एक-एक करके गए। पहले सबसे पीछे वाले छह गए, फिर बीच वाले, और सुगनचंद सबसे आख़िर में उठा। उठने से पहले उसने अपनी हथेली देखी, जिस पर स्याही से एक लिखा था, और वह अब भी साफ़ था।
अगले दिन वह फिर छह बजे आया और दफ़्तर उस दिन खुला, और उसका काम ग्यारह बजे तक हो गया। उस दिन लाइन में सत्रह लोग थे और उनमें से नौ पिछले दिन वाले ही थे, और नंबर उसी क्रम में थे।
यह क्रम किसी ने तय नहीं किया था। सबको याद था।
उस गेट के सामने अब सुबह पौने छह बजे एक चाय वाला ठेला लगाता है, जो पहले सात बजे आता था। उसने बताया कि उसे उस दिन के बाद यह समझ आया कि लाइन दफ़्तर के खुलने से नहीं, आदमी के पहुँचने से बनती है। वह ठेला अब रोज़ वहीं लगता है, छुट्टी के दिन भी, क्योंकि छुट्टी के दिन भी दो-चार लोग आ जाते हैं।