रजिस्टर में उस दिन दोनों की हाज़िरी लगी थी और दोनों में से कोई वहाँ नहीं था। यह उन्नीस महीने चला था। पूरे उन्नीस। जगह क़स्बे का एक पशु चिकित्सालय है, जिसमें तीन लोग हैं। एक डॉक्टर, जो हफ़्ते में तीन दिन आता है, क्योंकि उसका ज़िम्मा दो केंद्रों का है।

और दो कर्मचारी, लालचंद और भोलाराम। लालचंद की ड्यूटी सुबह आठ से है और भोलाराम की भी आठ से। हाज़िरी रजिस्टर मेज़ की दराज़ में रहता है और दराज़ की चाबी दोनों के पास है। यह इंतज़ाम पुराना है और उसकी वजह भी थी।

जो पहले आता, वह ताला खोलता, रजिस्टर निकालता, अपनी हाज़िरी लगाता, और रजिस्टर मेज़ पर खुला छोड़ देता। दूसरा आकर अपनी लगा लेता। बस इतना। इसमें कोई गड़बड़ नहीं है। यह चलन है। गड़बड़ उन्नीस महीने पहले शुरू हुई। जनवरी की एक सुबह लालचंद को देर हो गई, क्योंकि उसकी लड़की की तबीयत ख़राब थी।

वह सवा नौ बजे पहुँचा। सवा घंटा देर। भोलाराम आठ बजे आ चुका था और उसने रजिस्टर में लालचंद की हाज़िरी लगा दी थी। उसने यह अपनी तरफ़ से किया। बिना पूछे। पहुँचने पर लालचंद ने रजिस्टर देखा और अपना नाम पहले से लगा पाया।

उसने भोलाराम को धन्यवाद कहा और भोलाराम ने कहा कि इसमें क्या है। यहाँ तक यह अच्छी बात है। आगे जो हुआ, वह इसलिए हुआ कि दोनों ने इस पर दोबारा बात नहीं की। फरवरी में भोलाराम को देर हुई और लालचंद ने उसकी हाज़िरी लगा दी।

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उसने भी यह अपनी तरफ़ से किया और उसने भी इसका ज़िक्र नहीं किया। भोलाराम ने पहुँचकर देखा, समझ लिया, और कुछ नहीं कहा। उसने धन्यवाद भी नहीं कहा। एक शब्द नहीं। इसकी वजह वह बाद में बताता है, और वह ठीक है।

धन्यवाद कहने से यह बात एक इंतज़ाम बन जाती, और इंतज़ाम बन जाने पर वह ग़लत काम लगने लगता। जब तक कोई कुछ न कहे, वह एहसान रहता है। उन्नीस महीने में यह उन्तालीस बार हुआ। लालचंद के लिए इक्कीस बार और भोलाराम के लिए अठारह।

यह गिनती बाद में निकली और उसे निकालने में एक घंटा लगा, क्योंकि रजिस्टर में लिखावट से पकड़ना पड़ा। दोनों की लिखावट अलग है और दोनों में से किसी ने दूसरे की लिखावट की नक़ल करने की कोशिश नहीं की।

यह इस पूरे किस्से की सबसे भोली बात है। अब उस दिन की बात। अगस्त की चौदह तारीख़ थी और वह गुरुवार था। लालचंद की बहन के घर एक कार्यक्रम था और उसे साढ़े नौ बजे तक पहुँचना था। भोलाराम की मोटरसाइकिल उस सुबह चालू नहीं हुई। एक बार भी नहीं।

दोनों की देरी का कोई आपसी संबंध नहीं था। लालचंद पौने दस बजे पहुँचा। पूरे पौने दो घंटे देर। उसने ताला खोला, दराज़ खोली, और रजिस्टर निकाला। उसमें उसकी अपनी हाज़िरी लगी हुई थी। यहाँ उसे रुककर सोचना चाहिए था और उसने सोचा नहीं।

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उसने यह मान लिया कि भोलाराम आ चुका है और कहीं बाहर गया है, और उसने भोलाराम की हाज़िरी भी लगा दी, जैसा वह करता आया था। पर भोलाराम आया ही नहीं था। वह घर पर था। उसकी हाज़िरी उसने ख़ुद पिछली शाम लगा दी थी।

यह उसने पहली बार किया था और उसका कारण भी था। उसे मालूम था कि सुबह उसकी मोटरसाइकिल ठीक होनी है और देर हो सकती है, इसलिए उसने बुधवार शाम जाते वक़्त अगले दिन की हाज़िरी लगा दी। यानी उस दिन दस बजे रजिस्टर में दोनों की हाज़िरी लगी थी।

और दस बजे वहाँ कोई नहीं था। लालचंद बाहर नल पर हाथ धो रहा था। इसका पता उसी दिन चला और चलने का तरीक़ा सादा था। डॉक्टर उस दिन आया, जो गुरुवार को नहीं आता। वह किसी और काम से क़स्बे में था और उसने सोचा कि हो आए।

उसने रजिस्टर देखा और उसमें दोनों की हाज़िरी थी, और भोलाराम वहाँ नहीं था। उसने लालचंद से पूछा कि भोलाराम कहाँ है। लालचंद ने कहा कि अभी बाहर गया है। यह झूठ था और वह झूठ बचाने के लिए बोला गया था।

भोलाराम सवा ग्यारह बजे पहुँचा। मोटरसाइकिल ठीक हो गई थी। उसने आकर सबसे पहले रजिस्टर देखा, आदत से, और उसमें अपनी हाज़िरी दो बार लगी पाई। एक अपनी लिखावट में और एक लालचंद की। उसने ऊपर देखा और डॉक्टर बैठा हुआ था।

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उसके बाद जो हुआ, उसमें डाँट कम थी और सवाल ज़्यादा। डॉक्टर ने दोनों से पूछा कि यह कितने दिन से चल रहा है। दोनों ने सच बता दिया, अलग-अलग, और दोनों के हिसाब में उन्तालीस का आँकड़ा तब नहीं आया, वह बाद में निकाला गया।

डॉक्टर ने रिपोर्ट नहीं लिखी। एक लाइन भी नहीं। उसने जो किया, वह इससे बेहतर था। उसने रजिस्टर की दराज़ का ताला बदलवाया और चाबी अपने पास रखी, और दोनों से कहा कि हाज़िरी अब एक-दूसरे के सामने लगेगी। इसका असर यह हुआ कि अब जो पहले आता है, वह दूसरे का इंतज़ार करता है।

और दोनों अब आठ बजे से पहले आते हैं, क्योंकि दूसरे को इंतज़ार कराना उन्नीस महीने की उस मदद से भारी पड़ता है।

वह रजिस्टर अब भी उसी चिकित्सालय में है और उसमें अगस्त की चौदह तारीख़ वाला पन्ना किसी ने फाड़ा नहीं। उस पन्ने पर भोलाराम का नाम दो बार लिखा है, एक के नीचे एक, और दोनों के आगे वही तारीख़ है। नया आदमी उस रजिस्टर के पुराने पन्ने पलटे तो वहाँ रुक जाता है, और पूछने पर दोनों में से जो सामने बैठा हो, वह कहता है कि लिखने में ग़लती हो गई थी।