शिवचरण के बेटे की शादी में ग्यारह दीवार घड़ियाँ आईं। ग्यारह, एक ही तरह की। एक ही नाप की। आठ का रंग भूरा था और तीन का सुनहरा, और नाप ग्यारहों की एक ही थी। इसकी वजह एक आदमी था और उसका नाम दौलतराम है।

दौलतराम उस मुहल्ले में वह आदमी है जिससे लोग पूछते हैं। क्या पहनना है, कहाँ से लेना है, कितने का लेना है, और शादी में क्या देना है। उसकी सलाह अच्छी होती है और यह मानी हुई बात है। शादी से महीना पहले उससे तेरह लोगों ने यह पूछा कि शिवचरण के घर क्या दें।

तेरह लोगों ने। अलग-अलग दिन, अलग-अलग जगह। और उसने तेरहों को वही जवाब दिया, जो उसकी नज़र में सबसे ठीक जवाब था। उसने कहा कि दीवार घड़ी दे दो। यही सबसे ठीक है। इसके पीछे उसकी अपनी सोच थी और वह ग़लत नहीं थी।

शिवचरण का घर नया बना था, उसमें चार कमरे थे, और चारों में घड़ी नहीं थी। दूसरी बात, घड़ी सस्ती-महँगी दोनों मिलती है, तो देने वाला अपने हिसाब से ले सकता है। तीसरी बात, वह टिकती है और खाई नहीं जाती।

यह सब कहते वक़्त उसे यह ध्यान नहीं रहा कि वह यह बात तेरहवीं बार कह रहा है। इसकी वजह भी सादा है। पूछने वाले उससे अकेले में पूछते थे, क्योंकि यह बात दूसरों के सामने नहीं पूछी जाती, और वह जवाब भी अकेले में देता था।

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यानी तेरह लोगों में से किसी को यह मालूम नहीं था कि बारह और लोग यही पूछ चुके हैं। दुकान की तरफ़ से भी कोई सुराग़ नहीं मिला। उस बाज़ार में घड़ी की चार दुकानें हैं और तेरहों ने अलग-अलग दुकान से नहीं ली, कुछ ने एक ही से ली, पर दुकानदार ने किसी को नहीं बताया।

उसने बाद में कहा कि उसे इसमें कुछ अजीब लगा ही नहीं, क्योंकि शादी के दिनों में घड़ी बिकती ही है। दो लोगों ने आख़िर में घड़ी नहीं दी। एक ने प्रेशर कुकर दिया, क्योंकि उसकी पत्नी ने मना कर दिया।

दूसरे को घड़ी मिली नहीं, क्योंकि वह आख़िरी दिन गया और उस नाप वाली ख़त्म हो चुकी थीं। यानी तेरह में से ग्यारह। पूरी ग्यारह। भेंट खोलने का काम शादी के तीसरे दिन हुआ और वह शिवचरण की बहू और उसकी बहन ने किया।

पहली घड़ी पर कुछ नहीं हुआ। किसी को कुछ नहीं लगा। दूसरी पर बहन ने कहा कि यह अच्छी बात है, दो कमरे हो गए। तीसरी पर दोनों चुप हो गईं। बिलकुल चुप। चौथी पर बहू ने बाहर जाकर शिवचरण को बुलाया।

शिवचरण आया और उसने ख़ुद पाँचवीं खोली, और उसके बाद उसने बाक़ी सब डिब्बे एक साथ खोलने को कहा। ग्यारह डिब्बे खुले और उनमें ग्यारह घड़ियाँ थीं। उस कमरे में उस वक़्त छह लोग थे और आधा घंटा कोई कुछ नहीं बोला।

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फिर शिवचरण के भाई ने वह सवाल पूछा जो पूछा जाना था। उसने पूछा कि सबने एक ही चीज़ क्यों दी। इसका जवाब निकालने में उन्हें दो दिन लगे और वह तेरहवें आदमी से निकला, जिसे घड़ी मिली नहीं थी और जिसने कुकर वाले से इसका ज़िक्र कर दिया।

उसके बाद बात जुड़ती चली गई। बीच में एक कोशिश हुई और वह नाकाम रही। शिवचरण की पत्नी छह घड़ियाँ लेकर बाज़ार गई, इस इरादे से कि उन्हें बदलवाकर कुछ और ले लिया जाए। दुकानदार ने पहली बात यह पूछी कि ये कहाँ से ली गई थीं।

छहों एक ही दुकान से नहीं ली गई थीं। दो उसी की थीं, तीन सामने वाली की, और एक पीछे की गली वाली की, और यह डिब्बे के नीचे छपे नाम से साफ़ था। यानी उन्हें तीन दुकानों में तीन बार यही बात समझानी पड़ती।

वह छहों वापस ले आई और उसने घर पर सिर्फ़ इतना कहा कि नहीं हो सका। दौलतराम को इसका पता चौथे दिन चला। उसे बताने कोई नहीं गया। एक भी नहीं। उसने ख़ुद सुना, नुक्कड़ पर, जहाँ दो आदमी इस पर हँस रहे थे।

वह उसी दिन शिवचरण के घर गया और उसने बहुत सीधी बात कही। उसने कहा कि सलाह उसकी थी, और वह ठीक थी, और उसे यह नहीं मालूम था कि इतने लोग पूछेंगे। शिवचरण ने कहा कि बात ठीक ही है, चार कमरे हैं और घड़ी चारों में लगनी है।

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यह उस दिन का सबसे अच्छा वाक्य था और उसने माहौल हल्का कर दिया। चार घड़ियाँ चार कमरों में लगीं। एक बरामदे में और एक रसोई के बाहर। बाक़ी पाँच डिब्बों में ही रह गईं। बंद। उनमें से चार अगले दो बरस में उसी गाँव की चार शादियों में गईं, और यह बात देने वालों ने छिपाई भी नहीं।

देते वक़्त वे बता देते थे कि यह शिवचरण के घर से आई है।

और दो घड़ियाँ लौटकर उसी घर आ गईं, दो अलग शादियों से, अलग रास्तों से, और यह बात शिवचरण को उन्हें खोलने के बाद पता चली, क्योंकि उसकी बहू ने पीछे लिखा एक निशान पहचान लिया। वे दोनों अब भी उस घर में हैं, उसी डिब्बे में, और दौलतराम से अब भी लोग पूछते हैं कि शादी में क्या दें, और वह जवाब देने से पहले एक सवाल पूछता है, कि तुमसे पहले किसने पूछा।