फ़र्क़ एक नंबर का था। वह चार महीने चला। शादी फागुन में थी और पंडाल क़स्बे के बाहर वाले मैदान में लगा था। खाने के लिए अंदर जूते-चप्पल उतारने पड़ते हैं और उतारने की जगह एक ही होती है, दरवाज़े के बाईं तरफ़।
उस शाम वहाँ लगभग दो सौ जोड़ी थीं। किसी पर नाम नहीं लिखा होता। किसी पर भी नहीं। भैरू खाना खाकर निकला और उसने अपनी चप्पल पहनी, और वह तंग थी। उसने पहले यह सोचा कि पैर सूज गया है, क्योंकि दिन भर खड़ा रहा था।
आधे रास्ते में उसे समझ आ गया कि पैर ठीक है और चप्पल दूसरी है। कालूराम को यह उसी वक़्त समझ आ चुका था, दूसरी तरफ़ के रास्ते पर, क्योंकि उसकी चप्पल पैर में ढीली घूम रही थी। दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे।
अब सवाल यह था कि किया क्या जाए, और इसका जवाब दोनों के पास एक ही था। कुछ नहीं करना। इसकी वजह बहुत सादी है। अगली सुबह पंडाल उखड़ चुका था और मैदान ख़ाली था। और अगर कोई पूछने जाता, तो उसे यह कहना पड़ता कि उसके पास किसी और की चप्पल है।
यह वाक्य बोलने में जितना सीधा लगता है, उतना नहीं है। गाँव में यह बात दो दिन में इस तरह फैलती कि किसी की चप्पल ले आया। इसलिए दोनों ने अपनी-अपनी तरफ़ से इसे चुपचाप निपटाने की कोशिश की। भैरू ने पहले उसे पहनकर घिसाया, दो हफ़्ते, यह सोचकर कि चमड़ा खुल जाएगा।
चमड़ा उतना ही खुला जितना खुल सकता था। यानी बहुत कम। तीसरे हफ़्ते उसके दाएँ पैर के अँगूठे के पास छाला पड़ा। छाला ठीक हुआ, फिर वहाँ की खाल सख़्त हो गई, और उसके बाद उसे तंगी महसूस होना बंद हो गई।
यह इंसानी शरीर की एक अच्छी ख़ूबी है और इस किस्से में सबसे काम की चीज़ यही निकली। कालूराम का मामला उलटा था और उलटे मामले में शरीर मदद नहीं करता। ढीली चप्पल में पैर आगे-पीछे खिसकता है और उसे रोकने के लिए उँगलियाँ मोड़नी पड़ती हैं।
उसने चार महीने उँगलियाँ मोड़कर चलाईं। पूरे चार। उसकी चाल बदल गई और यह उसकी पत्नी ने पकड़ा। उसने पूछा कि तू घोड़े की तरह पैर क्यों पटक रहा है। कालूराम ने कहा कि रास्ते के पत्थर बदल गए हैं।
यह जवाब उस पूरे किस्से का सबसे बहादुर जवाब था। उसने अपनी तरफ़ से भी एक इलाज किया। उसने चप्पल के अंदर पीछे की तरफ़ चमड़े की एक पट्टी चिपकाई, जिससे जगह कम हो जाए। पट्टी ग्यारहवें दिन उखड़ गई। दोबारा नहीं लगाई।
इस बीच गाँव ने दोनों के बारे में अपने-अपने नतीजे निकाल लिए थे। भैरू के बारे में यह माना गया कि उसने सस्ती चप्पल ख़रीदी है, क्योंकि तंग चप्पल सस्ती होने की निशानी मानी जाती है। कालूराम के बारे में यह माना गया कि उसने अपने भाई की पहन ली है, जो शहर में रहता है और जिसका पैर बड़ा है।
दोनों बातें ग़लत थीं और दोनों ने किसी को नहीं टोका। टोकने से असली बात बतानी पड़ती। बीच में एक बार मामला खुलने के बहुत क़रीब आ गया था। वैशाख में उसी शादी वाले घर में एक और कार्यक्रम था और दोनों उसमें गए।
जूते-चप्पल उतारने की जगह वही थी, दरवाज़े के बाईं तरफ़। भैरू ने उस दिन अपनी चप्पल उतारकर एक कोने में, दीवार से सटाकर रखी। कालूराम ने भी वही किया, दूसरे कोने में। दोनों ने यह अपने-अपने हिसाब से किया और दोनों की वजह एक ही थी।
दोबारा बदलने का जोखिम कोई नहीं ले सकता था, क्योंकि अब वह चप्पल कम से कम पहनी हुई थी। चौथे महीने में जो हुआ, वह किसी की योजना नहीं थी। क़स्बे में मोची एक ही है और वह बस अड्डे के पीछे बैठता है।
जेठ की एक दोपहर भैरू उसके पास गया, इस काम से कि चप्पल का अगला बंद सिलवाना था। वह वहीं बैठा था जब कालूराम आया, उसी काम से नहीं, पर उसी चप्पल के साथ। मोची ने दोनों जोड़ी हाथ में लीं। एक साथ।
उसने कुछ नहीं कहा। पहले कुछ नहीं कहा। उसने दोनों को उलटा-पलटा, तली देखी, और फिर दोनों को अपने सामने ज़मीन पर रख दिया। चारों एक ही चमड़े की थीं, एक ही रंग की, और एक ही कारीगर की सिलाई की।
फ़र्क़ सिर्फ़ नाप का था। मोची ने इसके बाद एक ही बात कही, और वह भी सवाल की तरह नहीं। उसने कहा कि फागुन वाली शादी में गए थे। दोनों ने हाँ कहा। दोनों ने।
उसके बाद वहाँ जो हुआ, उसमें ग़लती शब्द एक बार भी नहीं आया। भैरू ने अपनी उतारी और कालूराम ने अपनी, और दोनों ने दूसरे की पहन ली, और दोनों के पैर में वह ठीक बैठी। कालूराम ने कहा कि यह मेरी है।
भैरू ने कहा कि हाँ। इतनी ही बात हुई। मोची ने दोनों का अगला बंद सिल दिया, बिना कहे, और पैसे एक जोड़ी के लिए लिए। वापसी में दोनों साथ चले, बस अड्डे से नुक्कड़ तक, और उन्होंने मौसम की बात की।
अब वे मिलते हैं और मिलने पर चप्पल का ज़िक्र नहीं करते।
उस मोची की दीवार पर एक कील है और उस पर चमड़े के कतरन टँगे रहते हैं, हर मरम्मत का एक। उस दोपहर के दो कतरन आज भी वहीं हैं, आमने-सामने, और वे एक ही चमड़े के हैं, यह देखने में साफ़ दिखता है। कोई नया आदमी उसकी दुकान पर बैठे और नाप की बात करे, तो वह उस कील की तरफ़ हाथ उठा देता है, और आगे कुछ नहीं बताता।