नंबर में एक अंक का फ़र्क़ था। वह सात महीने चला। नाहर के भतीजे का नंबर सात के बाद तीन से शुरू होता था और नाहर ने उसे आठ लिखा था। यह उसने लिखा भी ठीक था और डायल करते वक़्त वह हर बार अपनी कापी देखता था, और कापी में आठ लिखा था।

कापी में आठ किसने लिखा, यह आज तक तय नहीं हुआ। किसी ने नहीं माना। नाहर सत्तर का है और उसे मोबाइल में नंबर सहेजना नहीं आता। उसके पास बटन वाला फ़ोन है और वह हर बार पूरा नंबर दबाता है।

भतीजा जयपुर में पढ़ता है और घर से हर हफ़्ते बात होनी चाहिए, यह उसकी माँ का हुक्म है। पहली बार जो फ़ोन उठा, वह जोधपुर के एक आदमी ने उठाया। उस आदमी का नाम चिरंजी है और वह इस पूरे किस्से में सबसे अच्छा आदमी है। वह जोधपुर के एक होटल में हिसाब लिखता है।

पहली बात में नाहर ने कहा कि बेटा, तीन बीघे में सरसों बो दी है। चिरंजी ने कहा कि अच्छा किया। उसने ऐसा क्यों कहा, यह उसने बाद में ख़ुद बताया। कारण सादा था। उसे लगा कि किसी बुज़ुर्ग का ग़लत नंबर लग गया है और उन्हें टोकने से बुरा लगेगा, इसलिए उसने बात पूरी होने दी।

बात नौ मिनट चली। पूरे नौ। अगले हफ़्ते फिर वही नंबर लगा। वही आठ। इस बार चिरंजी ने सोचा कि बता देगा, और फिर नाहर ने बात शुरू ही यह कहकर की कि पिछली बार तूने जो सलाह दी थी, वह काम आई।

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चिरंजी ने कोई सलाह नहीं दी थी। उसने बस अच्छा किया कहा था। अब उसने यह सोचा कि इस वक़्त बताने से बात और बिगड़ेगी। तीसरे हफ़्ते तक वह फँस चुका था। बुरी तरह। सात महीने में उन दोनों में लगभग तीस बार बात हुई और उसमें जो-जो हुआ, वह इस तरह है।

नाहर ने उसे सरसों, चने और बाजरे का पूरा हिसाब बताया।

उसने उससे दो बार सलाह माँगी और चिरंजी ने दोनों बार वही कहा जो उसे ठीक लगा, यानी सोच-समझकर करना और जल्दबाज़ी नहीं करना, जो हर सलाह में चल जाता है। उसने उसे एक बार डाँटा भी, कि पढ़ाई में ध्यान नहीं दे रहा।

चिरंजी ने उस पर कहा कि अब से ध्यान देगा। एक बार नाहर ने उससे पूछा कि तेरी माँ का फ़ोन आया था, तू उससे क्यों नहीं बात करता। इस पर चिरंजी ने कहा कि नेटवर्क की दिक़्क़त थी। यह उस पूरे सात महीने का सबसे बड़ा झूठ था और चिरंजी उसे आज भी मानता है।

इस बीच असली भतीजा भी उस घर से बात करता रहा, अपनी माँ से, अपने ही नंबर पर। पकड़ में यह इसलिए नहीं आया कि दोनों घरों की बातें आपस में मिलती नहीं थीं। नाहर खेत की बात करता था और उसकी माँ पढ़ाई और खाने की।

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और भतीजे ने कभी नहीं कहा कि चाचा फ़ोन नहीं करते, क्योंकि उसे इससे कोई शिकायत नहीं थी।

बीच में दो बार चिरंजी ने बताने की कोशिश की और दोनों बार वह पीछे हट गया। पहली बार उसने बात की शुरुआत में कहा कि चाचाजी, एक बात कहनी है, और नाहर ने उसी वक़्त बताना शुरू कर दिया कि नहर का पानी कब छूटेगा। दूसरी बार उसने पूरा वाक्य सोचकर रखा था और उस दिन नाहर ने उसे अपनी बहू के बारे में कुछ बताया, जो घर की बात थी, और उसके बाद कहने की हिम्मत नहीं हुई।

पता आठवें महीने में चला और वह भी अजीब तरीक़े से। नाहर जयपुर गया, किसी काम से, और उसने वहीं से फ़ोन किया कि मैं आ गया हूँ, बस अड्डे पर हूँ, आ जा। चिरंजी उस वक़्त जोधपुर में था। तीन सौ किलोमीटर दूर।

उसने पहली बार सच बताया। सात महीने बाद। उसने कहा कि चाचाजी, मैं आपका भतीजा नहीं हूँ। नाहर ने पूछा कि तो तू कौन है। उसने अपना नाम बताया और यह भी बताया कि वह जोधपुर में है और सात महीने से यही चल रहा है।

नाहर ने इस पर जो कहा, वह उस पूरे किस्से का आख़िरी अच्छा वाक्य है। उसने कहा कि तूने पहले क्यों नहीं बताया। चिरंजी ने कहा कि आपको बुरा लगता। इसलिए नहीं बताया।

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नाहर उस दिन बस अड्डे पर खड़ा रहा और उसने अपने असली भतीजे को फ़ोन किया, और वह भी आधे घंटे में आ गया, क्योंकि वह वहीं शहर में था। घर पर यह किस्सा सुनाया गया और सबसे ज़्यादा नाहर की भाभी हँसी, क्योंकि उसने बरसों से कह रखा था कि नंबर सहेजना सीख लो।

नाहर ने अपनी कापी में वह आठ काटकर तीन लिखा और वह कापी उसने किसी को नहीं दिखाई। एक चीज़ जो उसके बाद हुई, उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।

चिरंजी का फ़ोन उस घर में अब भी आता है, महीने में एक बार, और वह ख़ुद करता है। बात सात-आठ मिनट होती है और उसमें वह फ़सल का हिसाब पूछता है, और नाहर उसे बताता है, और अब वह उसे सलाह भी सचमुच की देता है, क्योंकि सात महीने में उसे उस खेत का पूरा हिसाब याद हो गया था।