जीवनराम ने कूपन डाला था और वह भूल भी गया था। कूपन दो रुपए का था। एक ही डाला था। बाज़ार की एक दुकान ने दीवाली पर लकी ड्रा रखा था और उसमें कुल तेईस सौ कूपन पड़े। पहला इनाम फ़्रिज था और वह जीवनराम के नाम निकला।
ख़बर उसे शाम को मिली और वह ख़ुश हुआ, और यह ख़ुशी असली थी। मुश्किल दूसरे दिन शुरू हुई। सुबह-सुबह। उस गाँव में बिजली छह घंटे आती है और वे छह घंटे लगातार नहीं आते। फ़्रिज उन छह घंटों में ठंडा होता है और बाक़ी अठारह में गरम।
यह बात उसे मालूम थी और दुकानदार को भी मालूम थी। फिर भी उसने वह इनाम लिया, क्योंकि इनाम लेने से मना करना बहुत बड़ी बात हो जाती। फ़्रिज उसके घर ट्रैक्टर से आया और उसे उतारने में चार आदमी लगे।
उतारने वाले चारों उसी गाँव के थे और उन्होंने पैसे नहीं लिए। उस दिन उसके घर पंद्रह-बीस लोग आए, बस देखने। फ़्रिज बड़े कमरे में रखा गया, दरवाज़े के सामने वाली दीवार से लगाकर। अब उसके पास तीन रास्ते थे और तीनों बंद निकले।
पहला रास्ता था लौटा देना। यह उसने सोचा भी और तीन दिन सोचा। लौटाने में दिक़्क़त यह थी कि दुकानदार उसका जानने वाला है और उसका इनाम लौटाना उसकी बेइज़्ज़ती होती। और दूसरी दिक़्क़त बड़ी थी। उसका कोई हल नहीं था।
इनाम की ख़बर अख़बार में छप चुकी थी, फ़ोटो के साथ, जिसमें वह और दुकानदार दोनों हैं। दूसरा रास्ता था बेच देना। इसमें दिक़्क़त पैसे की नहीं थी, ख़रीदने वाले की थी। उस गाँव में जो भी ख़रीदता, वह उसी गाँव का होता, और तीन दिन में सबको मालूम हो जाता कि जीवनराम ने इनाम बेच दिया।
शहर में बेचने के लिए उसे शहर तक ले जाना पड़ता, जिसमें भाड़ा और चार आदमी फिर लगते। और वे चार आदमी वही होते जो उतारने आए थे। तीसरा रास्ता था चला लेना। यह उसने चार महीने किया और यह सबसे महँगा निकला।
फ़्रिज छह घंटे में ठंडा होता, फिर बंद हो जाता, और उसमें रखी चीज़ें उतनी ही जल्दी ख़राब होतीं जितनी बाहर। दो बार दूध ख़राब हुआ। एक बार सब्ज़ी। और बिजली का बिल चार सौ बढ़ गया, जो उसके घर के हिसाब में साफ़ दिखता है।
उन चार महीनों में एक बात हुई जिसने उसे कुछ दिन के लिए ठीक लगाया। पड़ोस की एक बुज़ुर्ग औरत की दवा ठंडी रखनी होती थी और वह दवा महीने में एक बार आती थी। उसने वह दवा उस फ़्रिज में रखवाई और तीन महीने रखवाई।
यह अच्छा काम था। फिर उसका बेटा उसे शहर ले गया और वहीं इलाज चलने लगा, और दवा आनी बंद हो गई। एक और बात दूसरे महीने में हुई। गाँव में एक शादी थी और उस घर वालों ने ठंडे पानी के लिए वह फ़्रिज माँगा।
जीवनराम ने दे दिया और उसे ट्रैक्टर से भेजा। वह दो दिन बाद वापस आया और उसके एक कोने का प्लास्टिक टूटा हुआ था। टूटने की बात उस घर वालों ने ख़ुद बताई और उन्होंने उसे ठीक कराने के पैसे भी दिए, जो जीवनराम ने नहीं लिए।
वह टूटा कोना अब भी वैसा है और वह पीछे की तरफ़ है, दीवार से लगा हुआ, और दिखता नहीं। चौथे महीने उसने वह बंद कर दिया और तार निकालकर पीछे लपेट दिया।
उसके बाद उस फ़्रिज का जो इस्तेमाल शुरू हुआ, वह उसकी पत्नी शांतिबाई ने शुरू किया। उसने उसमें अनाज के डिब्बे रखे। बिना किसी से पूछे। ऊपर के हिस्से में आटा, दाल और चावल के तीन डिब्बे, और नीचे के हिस्से में मसाले।
यह इस्तेमाल अच्छा निकला और उसकी वजह सादा है। फ़्रिज का दरवाज़ा कसकर बंद होता है और उसमें चूहा नहीं घुसता। उस घर में पहले टीन के डिब्बे थे और उनमें दो बार चूहे लगे थे। यानी वह फ़्रिज उस घर की सबसे अच्छी अलमारी है।
चार बरस हो गए। वह वहीं है। उस पर एक कढ़ाई वाला कपड़ा ढका रहता है और उसके ऊपर दो डिब्बे और एक टार्च रखी रहती है। साल में एक बार, दीवाली से पहले, उसे बाहर निकालकर धोया जाता है और यह काम जीवनराम ख़ुद करता है।
वह उसे धोता है, सुखाता है, और वापस उसी दीवार से लगाकर रखता है।
इस पर उससे कोई मज़ाक़ नहीं करता और इसकी वजह उस गाँव के लोग जानते हैं। जिन चार आदमियों ने उसे उतारा था, उनमें से दो अब भी उसी गली में रहते हैं, और उन्होंने चार बरस में यह कभी नहीं पूछा कि वह चलता है या नहीं।
उस गाँव में उन चार बरसों में और भी इनाम निकले, दो पंखे और एक मिक्सी, और तीनों चलते हैं।
वह अख़बार की कटिंग अब भी उस घर में है और वह फ़्रिज के अंदर रखी है, नीचे के हिस्से में, एक थैली में, मसालों के डिब्बों के पीछे। शांतिबाई ने उसे वहीं रखा था, इस वजह से कि वहाँ वह गलेगी नहीं, और उसे वहाँ से हटाने की बात किसी ने नहीं उठाई।