ऐलान शाम पाँच बजे हुआ और भैंस छह बजे लौट आई। दिक़्क़त इसी एक घंटे की है। पूरे किस्से की जड़ यही है।

मोतीराम की भैंस दोपहर से नहीं मिल रही थी और उसने तीन जगह देख लिया था, यानी तालाब, बाजरे का खेत, और अपनी बहन का घर, जहाँ वह एक बार पहले जा चुकी थी। चार बजे उसने बंसीलाल से कहा। बंसीलाल ने हाँ कर दी।

बंसीलाल मंदिर का लाउडस्पीकर चलाता है और उस गाँव में जो कुछ भी सुनाया जाना होता है, वह उसी से सुनाया जाता है। पाँच बजे ऐलान हुआ और उसमें भैंस का पूरा हुलिया बताया गया। काली, बाएँ सींग पर निशान, गले में लाल रस्सी।

ऐलान तीन बार दोहराया गया। यही चलन है। छह बजे भैंस अपने आप आ गई। किसी ने नहीं लाई। वह मुखिया के परिवार के गन्ने के खेत में थी, जहाँ मोतीराम ने देखा नहीं था, और शाम को भूख लगने पर वह ख़ुद चली आई।

अब बात वहाँ ख़त्म हो जानी चाहिए थी। वह हुई नहीं। और उसकी वजह लाउडस्पीकर है। ऐलान वापस लेने के लिए दोबारा ऐलान करना पड़ता है। और दोबारा ऐलान करने का मतलब यह है कि पूरा गाँव यह सुने कि भैंस मिल गई, और उसके साथ यह भी सुने कि वह कहाँ मिली।

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वह मुखिया के खेत में मिली थी। यही सारी दिक़्क़त थी। उस खेत में गन्ना खड़ा था और भैंस ने उसका कुछ हिस्सा खाया था। यानी ऐलान वापस लेने में एक और बात खुलती थी, जिसका हर्जाना बनता। मोतीराम ने बंसीलाल से कहा कि रहने दो, दो-चार दिन में बात अपने आप ठंडी पड़ जाएगी।

बंसीलाल ने कहा कि जैसा तुम कहो। यह फ़ैसला उस शाम ठीक लगा था और अगली सुबह से उसका असर शुरू हुआ। पहला आदमी सात बजे आया और उसके साथ एक भैंस थी। वह भैंस काली थी और उसके गले में रस्सी थी, पर सींग का निशान नहीं था।

उस आदमी ने कहा कि उसे लगा कि यही होगी। मोतीराम ने कहा कि यह उसकी नहीं है। उस आदमी ने पूछा कि तेरी मिल गई। और यहाँ मोतीराम ने वह बात कही जिसने पूरे नौ दिन बना दिए। उसने कहा कि नहीं, अभी नहीं मिली। यह झूठ था।

उसने यह झूठ इसलिए बोला कि सच बोलने पर अगला सवाल यह आता कि कहाँ मिली। इसके बाद जो हुआ, उसकी गिनती उसने ख़ुद रखी। नौ दिन में कुल छह भैंसें उसके घर आईं। एक बगड़ से आई, दो पड़ोस के गाँव से, और तीन उसी गाँव से।

छहों में से एक भी उसकी नहीं थी और यह हर बार दो मिनट में साफ़ हो जाता था। लाने वाले किसी ने पैसा नहीं माँगा और यह उस गाँव का चलन है। पर हर लाने वाले को चाय पिलानी पड़ती है और यह भी उसी चलन का हिस्सा है।

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छह चाय, नौ दिन, और हर बार वही बातचीत। इस बीच उसकी अपनी भैंस उसके ही घर के पीछे बँधी थी और उसे रोज़ चारा डाला जा रहा था। उसे पीछे बाँधने का इंतज़ाम उसकी पत्नी ने किया था और उसने इस पर कोई राय नहीं दी।

दूसरी और तीसरी भैंस एक ही दिन आईं और वह तीसरा दिन था। दोनों पड़ोस के गाँव से आईं और दोनों लाने वाले एक-दूसरे को जानते थे। उन्होंने आँगन में खड़े होकर आपस में यह तय किया कि किसकी भैंस पहले दिखाई जाए।

इसमें दस मिनट गए। मोतीराम उस पूरे वक़्त चुपचाप खड़ा रहा। पाँचवें दिन जो आदमी आया, वह पहली बार आ चुका था। उसने दूसरी भैंस लाई, अपने ही घर की, और उसने कहा कि पहली वाली उसकी ग़लती थी। उसे लौटाते वक़्त मोतीराम ने उसे रास्ते तक छोड़ा और यह उस पूरे किस्से में उसका सबसे मुश्किल काम था।

नौवें दिन बात इस तरह खुली।

जो आदमी बगड़ से भैंस लाया था, वह जाते वक़्त पीछे से निकला, क्योंकि आगे का रास्ता खुदा हुआ था। उसने पीछे बँधी भैंस देखी। ध्यान से देखी। उसने सींग देखा, रस्सी देखी, और उसने कुछ नहीं कहा। वह चला गया और उसने नुक्कड़ पर जाकर बता दिया।

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उस शाम मोतीराम के घर सात-आठ लोग बैठे और वहाँ हँसी बहुत हुई, और उस हँसी में मोतीराम भी शामिल था। उसने पूरी बात बताई। गन्ने वाली भी। मुखिया के घर से उस गन्ने का कोई ज़िक्र आज तक नहीं आया।

बंसीलाल ने अगले दिन एक ऐलान किया, अपनी तरफ़ से, और उसमें भैंस का नाम नहीं लिया। उसने बस यह कहा कि जिस बात का ऐलान हो जाए, उसका नतीजा भी बताना ज़रूरी है। यह वाक्य उसने ख़ुद बनाया था और वह तीन बार दोहराया गया।

उस गाँव में अब यह चलन है कि खोई हुई चीज़ का ऐलान तीन दिन रुककर किया जाता है, और यह किसी बैठक में तय नहीं हुआ। बंसीलाल पूछने वालों से बस इतना कहता है कि तीन दिन देख लो, और वे देख लेते हैं, और उनमें से ज़्यादातर की चीज़ इसी बीच मिल जाती है।