गाँव में बस दो जगह रुकती है और उनके बीच की दूरी सत्तर क़दम है। पहली जगह पर छप्पर है, बेंच है, और एक बोर्ड है। दूसरी जगह पर कुछ नहीं है। कुछ भी नहीं। सब दूसरी जगह खड़े होते हैं। सब।
यह सात बरस से चल रहा है। पूरे सात। छप्पर वाली जगह पंचायत ने बनवाई थी और उस पर छियालीस हज़ार लगे थे। बेंच सीमेंट की है और उस पर हरा रंग किया गया था। बोर्ड पर गाँव का नाम लिखा है और नीचे बस के समय लिखे हैं, जो अब बदल चुके हैं।
बनने के बाद पहले चार महीने लोग वहीं खड़े हुए। फिर एक बरसात आई। दो हज़ार अठारह की। उस बरसात में छप्पर वाली जगह के सामने की सड़क बैठ गई और वहाँ पानी भरने लगा। पानी घुटने तक नहीं आता था, टख़ने तक आता था, और बस रुकने पर चढ़ते वक़्त पैर उसी में जाता।
इसलिए लोग सत्तर क़दम आगे खड़े होने लगे, जहाँ सड़क ऊँची थी। बस वाले को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता और वह जहाँ हाथ दिखे वहीं रोक देता है। अगली गर्मी में सड़क बनी। वह अच्छी बनी और उसमें छप्पर के सामने का हिस्सा ऊँचा उठाया गया, क्योंकि ठेकेदार को यह बताया गया था।
पानी उसके बाद कभी नहीं भरा। एक बार भी नहीं। और लोग वापस नहीं आए। कोई नहीं आया। इसकी कोई एक वजह नहीं है और यह उस गाँव में कई लोगों ने कई तरह से बताई। सबसे सादा जवाब हेतराम का है, जो चौदह बरस से उसी बस से क़स्बे जाता है।
उसने कहा कि वह जहाँ सब खड़े होते हैं वहीं खड़ा होता है। पूछने पर उसने यह भी कहा कि अकेले खड़े होने में यह डर रहता है कि बस वहाँ रुकेगी या नहीं। यह डर बेवजह नहीं है। इसका आधार है।
जिस जगह पाँच आदमी खड़े हों, वहाँ बस ज़रूर रुकती है। जहाँ एक खड़ा हो, वहाँ ड्राइवर कभी-कभी आगे निकल जाता है, और फिर सत्तर क़दम पैदल चलकर चढ़ना पड़ता है, दौड़कर। यानी छप्पर वाली जगह पर खड़ा होने का ख़तरा असली है, और वह ख़तरा उस जगह के ख़ाली होने से ही बना है।
यह बात इस पूरे मामले की जड़ है। बीच में तीन कोशिशें हुईं और तीनों नाकाम रहीं। पहली कोशिश पंचायत की थी। बोर्ड के नीचे एक और बोर्ड लगाया गया, जिस पर लिखा था कि यात्रीगण यहीं प्रतीक्षा करें। उस बोर्ड को पढ़ने के लिए छप्पर वाली जगह पर जाना पड़ता है।
दूसरी कोशिश कस्तूरी की थी, जो उसी गाँव की है और जो सबसे ज़्यादा उस बेंच के हक़ में रही। वह लगातार नौ दिन छप्पर वाली जगह पर खड़ी हुई। उन नौ दिनों में बस सात बार रुकी और दो बार नहीं रुकी।
दो बार में एक बार उसे दौड़ना पड़ा और एक बार बस निकल गई और उसे अगली का इंतज़ार करना पड़ा, जो डेढ़ घंटे बाद थी। दसवें दिन वह आगे वाली जगह पर खड़ी हुई। फिर वहीं खड़ी होती है।
उसने बाद में कहा कि उसने हार मान ली, और यह उसने बिना किसी शिकायत के कहा। तीसरी कोशिश सबसे अच्छी थी और वह एक लड़के की थी। उसने बस वाले से बात की और उससे कहा कि वह छप्पर वाली जगह पर ज़रूर रुके, चाहे कोई खड़ा हो या न हो।
बस वाला मान गया। उसने चार दिन रोका। चार दिन में कोई नहीं चढ़ा, और पाँचवें दिन उसने रोकना बंद कर दिया, और उसकी कोई ग़लती नहीं थी। इस बीच एक चीज़ हुई जिसने आगे वाली जगह को पक्का कर दिया।
आगे वाली जगह पर एक दीवार है, जो किसी के घर की पिछली दीवार है। उस घर के आदमी ने पहले तीन बरस इस पर कुछ नहीं कहा। चौथे बरस उसने वहाँ एक टीन का छज्जा निकाल दिया, दो फ़ुट का, अपने पैसे से।
पूछने पर उसने कहा कि बरसात में लोग उसके दरवाज़े के अंदर घुस आते थे। यानी उस जगह पर अब थोड़ी छाया भी है। वह छज्जा दो फ़ुट का है और छप्पर आठ फ़ुट का, और इससे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
अब उस बेंच का इस्तेमाल दो तरह से होता है। दिन में उस पर कोई नहीं बैठता। एक भी आदमी नहीं। शाम को छह बजे के बाद उस पर चार-पाँच बुज़ुर्ग बैठते हैं, क्योंकि उस वक़्त बस नहीं आती और बैठने की जगह अच्छी है।
यानी वह जगह अपने काम के लिए बेकार है और दूसरे काम के लिए सबसे अच्छी। इस बात पर उस गाँव में कोई परेशान नहीं है।
उस बेंच पर हरा रंग आज भी बचा हुआ है, बीच के हिस्से में, जहाँ बुज़ुर्ग नहीं बैठते। और सत्तर क़दम आगे जिस दीवार से टिककर लोग खड़े होते हैं, उस पर कंधों की ऊँचाई पर एक चिकनी पट्टी बन गई है, जिसका प्लास्टर घिस चुका है और नीचे की ईंट दिखने लगी है। पंचायत ने पिछले बरस उस दीवार की मरम्मत करवाई और मरम्मत के तीन महीने में पट्टी दोबारा बन गई।