कार्ड ग्यारह सौ छपे और उन सब में दूल्हे का नाम छोटूराम की जगह छोटूलाल था। पता किसी को नहीं चला। दो दिन तक नहीं। उस घर में वह कार्ड सात लोगों के हाथ से गुज़रा था। पहले देवीलाल ने देखा, जो दूल्हे के पिता हैं। उन्होंने कहा कि ठीक है।

फिर उनके बड़े भाई ने देखा और उन्होंने कहा कि छपाई अच्छी है। फिर दूल्हे की माँ ने, फिर उसकी बुआ ने, फिर मुहल्ले के एक आदमी ने जिसे पढ़ने में तेज़ माना जाता है, और आख़िर में ख़ुद छोटूराम ने।

सातों ने कहा कि ठीक है। सातों ने। पता तीसरे दिन चला, जब कार्ड बाँटने वाला लड़का लौटकर आया और उसने बताया कि लड़की के घर वालों ने पूछा है कि नाम में लाल क्यों लिखा है। उस वक़्त घर में नौ लोग बैठे थे। सब चुप।

पहले पाँच मिनट कोई कुछ नहीं बोला। इसके बाद जो हुआ, वह कार्ड के बारे में नहीं था। देवीलाल ने कहा कि उन्होंने कार्ड पढ़ा था और उसमें राम ही लिखा था, यानी छपाई वाले ने बाद में बदला होगा।

यह मुमकिन नहीं था। वहाँ बैठे सबको मालूम था। उनके बड़े भाई ने कहा कि उन्होंने छपाई देखी थी, नाम नहीं देखा था, क्योंकि नाम देखने का काम बाप का है। दूल्हे की माँ ने कहा कि उसे चश्मा नहीं मिल रहा था उस दिन।

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बुआ ने कहा कि उसने कार्ड हाथ में लिया ही नहीं, उसे बस दिखाया गया था। मुहल्ले वाले आदमी को बुलाया गया और उसने कहा कि उससे तारीख़ पूछी गई थी, नाम नहीं। और छोटूराम ने कहा कि अपना नाम कौन पढ़ता है। कोई नहीं पढ़ता।

यह वाक्य उस कमरे में सबसे अच्छा वाक्य था और उसके बाद दो लोग हँस पड़े, और देवीलाल ने उन दोनों को घूरा।

बीच में छपाई वाले को बुलाया गया और वह आया भी, आधे घंटे में, और उसके आते ही कमरे का रुख़ बदल गया। नौ लोगों ने एक साथ उससे बात की। उसने पहले चुपचाप सुना, फिर अपने थैले से वह पर्चा निकाला जिस पर घर से लिखकर दिया गया था, और उस पर्चे पर देवीलाल की लिखावट में छोटूलाल लिखा था। पर्चा कमरे में घूमा और उसके बाद पाँच मिनट फिर कोई कुछ नहीं बोला।

अब सवाल यह था कि क्या किया जाए। ग्यारह सौ में से लगभग तीन सौ कार्ड बँट चुके थे। देवीलाल का पहला सुझाव यह था कि बाक़ी आठ सौ दोबारा छपवा लिए जाएँ। इस पर उनके भाई ने पूछा कि जो तीन सौ बँट गए, उनका क्या।

देवीलाल ने कहा कि उन्हें कुछ नहीं करना, नाम में एक अक्षर का फ़र्क़ है, कोई नहीं देखेगा। इस पर बुआ ने याद दिलाया कि लड़की के घर वाले पहले ही देख चुके हैं। दूसरा सुझाव मुहल्ले वाले आदमी का था। उसने कहा कि तीन सौ घरों में जाकर कार्ड बदल दिए जाएँ।

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यह अच्छा सुझाव था और उस पर आधे घंटे बात हुई, और फिर देवीलाल ने पूछा कि जाकर क्या कहेंगे। यही असली सवाल था। और उसका जवाब नहीं था।

अगर आप किसी के घर जाकर कार्ड बदलते हैं, तो आपको यह बताना पड़ता है कि पहले वाले में ग़लती थी, और उसके बाद वह आदमी पहला कार्ड निकालकर देखता है, और ग़लती ढूँढ़ता है, और मिल जाने पर उसे बीस लोगों को बताता है।

यानी कार्ड बदलने से बात छोटी नहीं होती, बड़ी होती है। तीसरा सुझाव छोटूराम का था और वह सबसे सादा था। उसने कहा कि कुछ मत करो। छोड़ दो। इस पर देवीलाल भड़क गए और उन्होंने कहा कि तुम्हारी शादी है और तुम्हारा नाम ग़लत है।

छोटूराम ने कहा कि नाम ग़लत हो तो भी शादी होगी, कार्ड पर मेरा फ़ोटो नहीं है। देवीलाल इस पर और भड़के, और उनकी असली परेशानी नाम नहीं थी, और वह कमरे में सबको मालूम थी। उनकी परेशानी यह थी कि लड़की वालों ने पूछ लिया था।

बीच में एक और सुझाव आया, जो दूल्हे के चचेरे भाई का था, और वह सबसे बुरा था। उसने कहा कि छोटूलाल नाम भी रख लो, दोनों चलते रहेंगे, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इस पर देवीलाल ने उससे पूछा कि तेरा नाम कल से बद्रीलाल रख दें। उसने कहा कि रख दो। इस पर बात और आगे बढ़ जाती, इसलिए उसे कमरे से भेज दिया गया।

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आख़िर में जो तय हुआ, वह चौथा रास्ता था और वह किसी के सुझाव से नहीं निकला।

बाक़ी आठ सौ कार्डों पर छपाई वाले ने एक छोटी पर्ची चिपकाई, जिस पर सही नाम छपा था, और वह पर्ची इतनी सफ़ाई से चिपकाई गई कि देखने में वह कार्ड का हिस्सा लगती थी। पर्ची चिपकाने में तीन दिन लगे और उसमें घर के चार लोग बैठे।

उन तीन दिनों में देवीलाल ने एक बार भी यह नहीं माना कि उन्होंने कार्ड ठीक से नहीं पढ़ा।

शादी हो गई। अच्छी हुई।

उस शादी के बाद एक चीज़ उस मुहल्ले में चल पड़ी। जो भी कार्ड छपवाता है, उसका कार्ड देवीलाल के पास लाया जाता है, नाम जाँचने के लिए, और वे उसे बहुत ध्यान से पढ़ते हैं, दो बार, ऊँची आवाज़ में, और यह काम उन्होंने कभी मना नहीं किया है।