शुरुआत एक फ़ॉर्म से हुई। अंत चार गाँव पर। रामप्रताप बारहवीं पास है और उसकी लिखावट अच्छी है। गाँव में इतना ही काफ़ी है। इससे ज़्यादा की ज़रूरत नहीं। पहला फ़ॉर्म उसने अपने पड़ोसी का भरा, छात्रवृत्ति का, और उसमें उसे बीस मिनट लगे।

पड़ोसी को वह छात्रवृत्ति मिल गई। पूरी मिली। यहाँ से जो चला, उसे वह रोक नहीं सका। दूसरा फ़ॉर्म उसी पड़ोसी के जीजा का था, जो बगल के गाँव से आया। तीसरा उस जीजा के किसी जानने वाले का था।

चौथे के बाद उसने गिनना छोड़ दिया। पूरे डेढ़ बरस। डेढ़ बरस बाद जब उसने गिना, तब हिसाब यह निकला। चार गाँव, दो सौ इकतालीस फ़ॉर्म, और एक भी पैसा नहीं। पैसा न लेने की वजह भी सादा है और वह उसकी नेकी नहीं है।

पहला फ़ॉर्म उसने पड़ोसी का भरा था और पड़ोसी से पैसा नहीं लिया जाता। दूसरा उसी पड़ोसी के रिश्तेदार का था और उससे भी नहीं लिया जाता। तीसरे तक पहुँचकर यह तय हो चुका था कि रामप्रताप पैसा नहीं लेता।

यह बात उसने कभी कही नहीं थी। यह बन गई थी। और एक बार बन जाने पर पहली बार पैसा माँगने का दिन कभी नहीं आता। काम का हिसाब इस तरह चलता था। लोग सुबह आते थे, आठ से दस के बीच, क्योंकि उसके बाद वह अपने खेत जाता था।

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जो देर से आते, वे शाम को आते। जो और देर से आते, वे उसके खेत पर पहुँच जाते, फ़ॉर्म लेकर। खेत पर फ़ॉर्म भरना मुश्किल है और उसने यह कभी किसी को नहीं कहा। उसने अपनी जेब में एक पेन रखना शुरू कर दिया, और यही उसकी सबसे बड़ी ग़लती थी।

पेन जेब में हो तो मना नहीं किया जा सकता। फ़ॉर्म हर तरह के आते थे। छात्रवृत्ति, राशन, आवास, पेंशन, बिजली का नया कनेक्शन, और वे फ़ॉर्म भी जिनका मतलब लाने वाले को भी नहीं मालूम होता था। एक आदमी बीमे का फ़ॉर्म लाया, जो अंग्रेज़ी में था।

रामप्रताप ने उसे भर दिया। पूरा भर दिया। अंग्रेज़ी उसे उतनी ही आती है जितनी बारहवीं में आती है, और उस फ़ॉर्म में नाम, पता और तारीख़ के अलावा कुछ नहीं भरना था। उस आदमी ने गाँव लौटकर बताया कि रामप्रताप अंग्रेज़ी का फ़ॉर्म भी भर देता है।

इसके बाद अंग्रेज़ी के फ़ॉर्म आने लगे। हर महीने दो-तीन। इस पूरे मामले में उसकी पत्नी की भूमिका दो बार आई और दोनों बार साफ़ थी। पहली बार उसने कहा कि लोग चाय पीकर जाते हैं और चाय का हिसाब कौन देगा।

इसका जवाब रामप्रताप के पास नहीं था और उसने चाय बंद नहीं की। दूसरी बार, बरसात में, जब चार आदमी बैठे थे और आँगन में पानी भर रहा था, उसने कहा कि इन्हें बरामदे में बिठाओ। वह अच्छा सुझाव था और उसे मानने से जगह पक्की हो गई।

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बरामदे में एक चौकी रखी गई और वह चौकी वहीं की हो गई। अब फ़ॉर्म भरवाने वाले सीधे बरामदे में जाकर बैठ जाते हैं। एक बात जो सबसे ज़्यादा वक़्त लेती थी, वह फ़ॉर्म भरना नहीं था। असल दिक़्क़त यह थी कि लोग काग़ज़ अधूरे लाते थे।

आधार की छायाप्रति हो और बैंक की न हो। बैंक की हो और फ़ोटो न हो। फ़ोटो हो और वह छह बरस पुरानी हो, जिसमें आदमी पहचान में न आए। रामप्रताप ने इसके लिए एक तरीक़ा निकाला और वह काम कर गया।

उसने बरामदे की दीवार पर एक काग़ज़ चिपका दिया, जिस पर लिखा था कि साथ में क्या-क्या लाना है, पाँच लाइनों में। उस काग़ज़ को पढ़कर लोग आने लगे और अधूरे काग़ज़ आधे रह गए। फिर एक आदमी वह काग़ज़ ही उतारकर ले गया, अपने गाँव में लगाने के लिए, और यह उसने पूछकर किया।

उसके बाद रामप्रताप ने वह काग़ज़ चार बार लिखा। गिनती डेढ़ बरस बाद इसलिए हुई कि एक दिन उसे ख़ुद एक फ़ॉर्म भरना था। अपने ही खेत के बीमे का फ़ॉर्म। आख़िरी तारीख़ उसे याद नहीं रही, और वह निकल गई।

उस दिन उसने बैठकर अपने काग़ज़ गिने और तब दो सौ इकतालीस का हिसाब सामने आया। उसने किसी से इसका ज़िक्र नहीं किया। जो एक बात उसने की, वह यह थी कि उसने एक कापी बना ली, जिसमें तारीख़ लिखता है।

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अपनी नहीं। दूसरों की। अब वह हर फ़ॉर्म की आख़िरी तारीख़ उसमें लिख देता है और हर सोमवार उसे देख लेता है। उस कापी में उसका अपना नाम एक ही बार आया है, और वह भी सबसे पीछे वाले पन्ने पर।

पिछले जेठ में वह चार दिन के लिए अपनी बहन के गाँव गया। उन चार दिनों में बरामदे की चौकी पर उसका छोटा भाई बैठा, जिसकी लिखावट भी ठीक है। उसने ग्यारह फ़ॉर्म भरे और उनमें से दो में जन्म का साल ग़लत लिख गया, क्योंकि उसने बताने वाले पर भरोसा किया और दोबारा नहीं पूछा।

दोनों फ़ॉर्म लौट आए। दोनों। रामप्रताप ने वापस आकर उन्हें दोबारा भरा और भाई से इस पर कुछ नहीं कहा। उसने बस एक चीज़ बदली, और उसे बदलने में उसे कोई मेहनत नहीं लगी।

अब वह जन्म का साल दो बार पूछता है, एक बार शुरू में और एक बार लिखने के बाद, ऊँची आवाज़ में पढ़कर। यह उसने किसी को सिखाया नहीं है और गाँव के लोग अब इसके आदी हो चुके हैं, और कुछ लोग तो बैठते ही अपना साल दो बार बोल देते हैं, बिना पूछे।