बैनर पर लिखा था कि श्री मदनलाल जी का हार्दिक अभिनंदन। बैनर सुबह आठ बजे टँग गया। समारोह ग्यारह बजे था। मदनलाल उस वक़्त बस में था, चौवन किलोमीटर दूर, और उसे यह मालूम नहीं था कि उसका अभिनंदन है।
वह उस क़स्बे के सहकारी बैंक में तैंतीस बरस रहा और उसी महीने रिटायर हुआ। अभिनंदन का आयोजन बैंक की एक समिति ने किया, जिसमें चार लोग थे। उन चारों ने यह मान लिया कि बताने का काम किसी और ने कर दिया है।
यह कैसे हुआ, उसका पूरा हिसाब बाद में निकला और वह इस तरह है। समिति के सबसे बड़े आदमी ने दूसरे से कहा था कि मदनलाल जी को बता देना। दूसरे ने तीसरे से कहा था कि आप बता दीजिए, आप उनके पास ही बैठते हैं।
तीसरे ने सोचा कि यह काम चौथे का है, क्योंकि चौथा उसी मुहल्ले में रहता है। चौथे को यह बताया ही नहीं गया। किसी ने नहीं बताया। इस बीच एक और चीज़ हुई जिसने पूरा मामला पक्का कर दिया। समिति ने बैंक के सूचना पट पर एक काग़ज़ लगा दिया, जिस पर तारीख़ और समय लिखा था।
मदनलाल ने वह काग़ज़ देखा भी। दो बार देखा।
उसने उसे पढ़ा और उसमें उसका नाम पढ़कर वह यह समझा कि यह उसकी विदाई का वह वाला काग़ज़ है जिसकी बात पिछले हफ़्ते हुई थी, और उसने यह मान लिया कि वह समारोह हो चुका है, क्योंकि पिछले हफ़्ते बैंक में चाय-समोसे हुए थे।
उस चाय-समोसे का उस अभिनंदन से कोई लेना-देना नहीं था। वह किसी और के तबादले पर हुआ था। यानी दोनों तरफ़ से पूरा इंतज़ाम हो गया था कि वह न आए।
उस दिन वह अपनी बहन के गाँव गया, क्योंकि रिटायर होने के बाद उसका वही पहला काम था।
हॉल का किराया छह हज़ार का था और वह समिति ने चंदे से दिया था। कुर्सियाँ एक सौ अस्सी लगाई गईं। माला, शॉल, मिठाई और चाय मिलाकर कुल ख़र्च चौदह हज़ार के आसपास बैठा, और उसका हिसाब बाद में लिखा गया, और उसमें एक भी आदमी ने यह नहीं पूछा कि यह पैसा किस काम आया।
ग्यारह बजे हॉल में एक सौ चालीस लोग बैठे थे। उनमें बैंक के लोग थे, ग्राहक थे, तीन नेता थे, और एक पत्रकार था। साढ़े ग्यारह तक यह माना गया कि वे रास्ते में हैं। फिर शक हुआ। बारह बजे समिति के चारों आदमी एक कोने में इकट्ठा हुए और उस कोने में जो बातचीत हुई, वह इस पूरे किस्से का सबसे अच्छा हिस्सा है।
पहले ने पूछा कि उन्हें बताया था न। दूसरे ने कहा कि हाँ। बताया था। तीसरे ने कहा कि मैंने ख़ुद देखा था, काग़ज़ लगा हुआ था। चौथे ने कहा कि मुझे कल पता चला।
इसके बाद पहले ने दूसरे से पूछा कि तुमने कहा था न। दूसरे ने कहा कि मैंने तीसरे से कहा था। तीसरे ने कहा कि मुझे लगा कि यह इनका काम है। यह पूरी बातचीत नौ मिनट चली और उसमें चारों में से किसी ने भी यह नहीं माना कि बताया नहीं गया था।
बारह बजकर पंद्रह मिनट पर उसे फ़ोन किया गया। मदनलाल ने फ़ोन उठाया और उसने पहला वाक्य यह कहा कि वह बहन के गाँव में है। उससे कहा गया कि आप फ़ौरन आ जाइए, आपका अभिनंदन है। उसने पूछा कि किसका अभिनंदन।
यह भी उस दिन के अच्छे वाक्यों में से एक था। और वह सचमुच पूछ रहा था। वह वहाँ से एक बजे निकला। डेढ़ बजे पहुँचा। हॉल में उस वक़्त तैंतीस लोग बचे थे और तीनों नेता जा चुके थे। पत्रकार बैठा था, क्योंकि उसे एक फ़ोटो चाहिए थी।
जो लोग बचे थे, उनमें से आधे बैंक के थे और उन्हें रुकना ही था। मदनलाल मंच पर बुलाया गया और उसके गले में माला डाली गई और उसे शॉल पहनाया गया।
उसके बाद उससे कुछ बोलने को कहा गया। वह मंच पर खड़ा रहा। उसने जो बोला, वह डेढ़ मिनट का था और उसमें उसने बैंक का, ग्राहकों का और अपने साथियों का धन्यवाद किया। अपने बताए न जाने का ज़िक्र उसने उस मंच से नहीं किया।
इसकी वजह शिष्टाचार नहीं था। वजह यह थी कि उसने वह काग़ज़ ख़ुद पढ़ा था और अपनी ग़लती वह भी नहीं मानना चाहता था।
समिति की एक बैठक उसके चार दिन बाद हुई और उसमें इस पर कार्यवाही लिखी गई। कार्यवाही में यह दर्ज है कि समारोह सफल रहा और मुख्य अतिथि विलंब से पहुँचे। मुख्य अतिथि वही मदनलाल था, जिसका अभिनंदन था, और वह उस काग़ज़ पर मुख्य अतिथि लिखा गया, क्योंकि देर से आने वाले को अभिनंदित लिखना किसी को ठीक नहीं लगा।
अख़बार में अगले दिन ख़बर छपी। उसमें लिखा था कि समारोह में भारी भीड़ रही। वह फ़ोटो डेढ़ बजे की थी और उसमें पीछे की कुर्सियाँ ख़ाली दिखती हैं।
उस अख़बार की कटिंग मदनलाल के घर में लगी है, फ़्रेम में, और उसमें वह कोना काट दिया गया है जिसमें ख़ाली कुर्सियाँ थीं। यह काटना उसकी पत्नी ने किया था और मदनलाल ने उस पर आज तक कुछ नहीं कहा।