वह बिस्कुट ग्यारह बैठकों तक बचा रहा। एक ही बिस्कुट। वही एक। बैठक सहकारी समिति की होती है और महीने में एक बार होती है, हर महीने की सात तारीख़ को। उसमें नौ लोग बैठते हैं और चाय के साथ बिस्कुट आते हैं।

बिस्कुट का इंतज़ाम शिवराम करता है, जो समिति का सचिव है और जो हिसाब भी रखता है। वह हर बार एक डिब्बा लाता है और डिब्बे में सोलह बिस्कुट होते हैं। नौ लोग और सोलह बिस्कुट का हिसाब कभी बराबर नहीं बैठता।

कोई एक लेता है, कोई दो, और कोई नहीं लेता। आख़िर में एक या दो बच जाते हैं। यह हर बार होता है। अगर दो बचें तो कोई एक उठा लेता है, क्योंकि दो में से एक उठाने पर एक और बचता है और वह किसी और के लिए बचा रहता है।

और अगर एक बचे तो वह वहीं रहता है। कोई नहीं उठाता। इसका कारण कोई नियम नहीं है। नियम कहीं लिखा नहीं। किसी ने यह कभी नहीं कहा कि आख़िरी नहीं उठाना। पर आख़िरी उठाने वाला वह आदमी बन जाता है जिसने आख़िरी उठाया, और यह किसी को नहीं बनना है।

अप्रैल की बैठक में और एक बचा। सिर्फ़ एक। शिवराम ने डिब्बा बंद किया और अलमारी में रख दिया, क्योंकि फेंकना ठीक नहीं लगता। मई की बैठक में उसने वही डिब्बा निकाला, नया डिब्बा भी खोला, और दोनों मेज़ पर रख दिए।

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नए डिब्बे के सोलह में से चौदह गए। पुराने डिब्बे का एक वहीं रहा। छुआ भी नहीं गया। जून में यही हुआ। जुलाई में भी। अगस्त में भी। अगस्त तक अलमारी में तीन डिब्बे थे और तीनों में एक-एक बिस्कुट था।

यहाँ शिवराम ने एक अच्छा काम किया और उससे मामला और उलझ गया। उसने तीनों को एक डिब्बे में डाल दिया, ताकि जगह बचे। अब एक डिब्बे में तीन बिस्कुट थे और तीन का मतलब यह होता है कि उठाने में हर्ज नहीं।

सितंबर की बैठक में उस डिब्बे से दो गए। एक बचा। और उसके बाद वह एक फिर वहीं का हो गया। अक्तूबर में शिवराम ने गिना और वह बिस्कुट अप्रैल वाला ही था, और यह उसने पहचान से तय किया।

उसने अप्रैल में जो डिब्बा लाया था, वह दूसरी कंपनी का था, क्योंकि उस महीने दुकान पर वही मिला। उसका बिस्कुट थोड़ा मोटा है और उस पर छेद की जगह लकीरें हैं। यानी वह पहचाना जा सकता था और शिवराम ने उसे पहचान लिया।

उसने यह बात बैठक में बताई नहीं। उसने अपनी कापी के पिछले पन्ने पर लिख लिया, अप्रैल से गिनती शुरू करके। नवंबर, दिसंबर, जनवरी और फरवरी में वह बिस्कुट वहीं रहा। इस बीच उसने रंग नहीं बदला और यह उन बिस्कुटों की एक ख़ूबी है।

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टूटा भी नहीं, क्योंकि डिब्बा हिलता नहीं था। इस बीच एक बार वह डिब्बा घर तक चला गया था। जनवरी की बैठक के बाद शिवराम की पत्नी उसकी अलमारी साफ़ कर रही थी और उसे तीन डिब्बे मिले, जिनमें दो ख़ाली थे।

उसने ख़ाली दोनों फेंक दिए और तीसरा नहीं फेंका, क्योंकि उसमें कुछ था। उसने वह डिब्बा शिवराम को दिखाया और पूछा कि इसमें एक बिस्कुट क्यों पड़ा है। शिवराम ने कहा कि समिति का है। यह जवाब अपने आप में पूरा नहीं था और उसकी पत्नी ने आगे नहीं पूछा।

उसने वह डिब्बा वापस उसी जगह रख दिया, और उसका मुँह दीवार की तरफ़ कर दिया, जो सफ़ाई करने वालों की आदत है। मार्च की बैठक ग्यारहवीं थी और उस बैठक में एक नया आदमी आया। उसका नाम देवकरण है और वह उस महीने समिति में लिया गया था, क्योंकि एक पुराना सदस्य गाँव छोड़कर चला गया।

देवकरण को यह कुछ नहीं मालूम था। कुछ भी नहीं। उसे न डिब्बे का पता था, न महीनों का, न इस बात का कि आख़िरी नहीं उठाया जाता। वह देर से आया, बैठा, और उसने चाय के साथ बिस्कुट उठाया।

मेज़ पर उस वक़्त दो डिब्बे थे और नए वाले में चार बिस्कुट थे। उसने नए वाले से नहीं उठाया। उसने पुराने वाले से उठाया, जो उसके ज़्यादा पास था। उस डिब्बे में एक ही था। अप्रैल वाला। उसने उसे उठाया और खाया और उसे यह भी मालूम नहीं हुआ कि उसने क्या किया।

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उस कमरे में उस वक़्त आठ और लोग थे। किसी ने कुछ नहीं कहा। एक शब्द नहीं। पर बैठक में उसके बाद कुछ देर के लिए एक चीज़ बदल गई और वह चीज़ आवाज़ थी। शिवराम ने बाद में बताया कि उसे उस वक़्त कुछ हल्का लगा।

बैठक ख़त्म होने पर उसने पुराना डिब्बा उठाया और उसे बाहर कूड़े में डाल दिया, और यह उसने किसी के देखते हुए किया। अब उस समिति में बिस्कुट का इंतज़ाम बदल चुका है और बदलाव शिवराम ने ही किया। वह अब डिब्बा मेज़ पर नहीं रखता। रखता ही नहीं।

वह बिस्कुट प्लेटों में बाँटकर रखता है, हर आदमी के आगे दो, और डिब्बा अपने पास रखता है। जिसे और चाहिए, वह माँग लेता है, और माँगने में किसी को कुछ नहीं लगता।

उसकी कापी का वह पिछला पन्ना अब भी है और उस पर ग्यारह महीनों के नाम लिखे हैं, एक के नीचे एक, और आख़िरी के आगे उसने कुछ नहीं लिखा। देवकरण को यह कापी दो बरस में एक बार दिखी और उसने पूछा कि यह क्या है। शिवराम ने कहा कि पुराना हिसाब है, और पन्ना पलट दिया।