कुआँ गली के एक सिरे पर था और गुलाबो का घर दूसरे सिरे पर। बीच में सात दरवाज़े पड़ते थे। पूरे सात। यह गिनती उसने ख़ुद नहीं की थी। यह गली में सब जानते थे। उस बरस गरमी लंबी चली और कुएँ का पानी नीचे चला गया।
नीचे चला गया, यानी बाल्टी डालने पर वह देर से भरती थी और आधी भरती थी। एक घड़ा भरने में गुलाबो को चौदह बाल्टी लगती थीं, जबकि आम दिनों में चार लगती हैं। इसलिए वह दिन में एक ही बार जाती थी और एक ही घड़ा लाती थी।
अब पहला दरवाज़ा। पहले दरवाज़े पर एक बूढ़ा बैठता था, जिसे धूप में बैठना अच्छा लगता था और जिसे प्यास जल्दी लगती थी। उसने कहा कि दो घूँट दे दे। बस दो। गुलाबो ने घड़ा नीचे उतारा और उसे दो घूँट दिए।
दूसरे दरवाज़े पर एक औरत खड़ी थी और उसके हाथ में आटा था। उसने कहा कि हाथ धुलवा दे। आटा लगा है। गुलाबो ने उसके हाथ पर पानी डाला। तीसरे दरवाज़े पर एक बकरी बँधी थी और उसका कठौता ख़ाली था।
बकरी ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि बकरियाँ कुछ नहीं कहतीं। गुलाबो ने कठौते में पानी डाला। थोड़ा-सा। चौथे दरवाज़े पर एक बच्चा रो रहा था और उसकी माँ अंदर थी। बच्चे को प्यास नहीं लगी थी। उसे कुछ और चाहिए था।
गुलाबो ने घड़ा नीचे रखा और उसे गोद में उठा लिया, दो मिनट, और वह चुप हो गया। इस दरवाज़े पर पानी नहीं गया। एक बूँद नहीं। यह याद रखो, क्योंकि आगे इसका हिसाब है। पाँचवें दरवाज़े पर एक आदमी दवा खाने बैठा था और उसके पास पानी नहीं था।
गुलाबो ने उसे एक गिलास भरकर दिया। छठे दरवाज़े पर कोई नहीं था। दरवाज़ा खुला था। दरवाज़ा खुला था और अंदर से बर्तन की आवाज़ आ रही थी और किसी ने बाहर नहीं देखा। गुलाबो आगे बढ़ गई। बिना रुके।
सातवें दरवाज़े पर उसकी सास बैठती थी, जो अब नहीं बैठती हैं, और उस बरस बैठती थीं। उन्होंने कुछ नहीं माँगा। कुछ भी नहीं। उन्होंने घड़ा देखा और पूछा कि आज कितना बचा। गुलाबो ने कहा कि देख लो। घड़ा उठाकर देखा गया और उसमें आधे से थोड़ा ऊपर पानी था।
यानी सात दरवाज़ों में लगभग आधा घड़ा गया। तुम पूछोगे कि उसने मना क्यों नहीं किया। इसका जवाब उस गली में कोई नहीं देता, और उस बरस किसी ने पूछा भी नहीं। जो हुआ, वह अगले हिस्से में है। आधा घड़ा उस घर के लिए कम था और यह उसी दिन शाम को पता चल गया।
रात के खाने में पानी कम पड़ा। उस रात सास ने एक काम किया और उन्होंने वह किसी को बताकर नहीं किया। वे अगली सुबह ख़ुद कुएँ पर गईं, गुलाबो से पहले, अँधेरे में। उनकी उम्र उस वक़्त सड़सठ थी और उन्होंने चौदह बाल्टी ख़ुद खींचीं।
एक घड़ा भरकर वे लौटीं और उन्होंने वह घड़ा घर में रख दिया, और किसी को कुछ नहीं कहा। उसके बाद जब गुलाबो अपना घड़ा भरकर लाई और उसमें आधा बचा, तो घर में पानी पूरा था। यह तीन दिन चला। किसी को पता नहीं चला।
चौथे दिन गली के लोगों को यह मालूम हो गया, और मालूम होने का तरीक़ा सादा था। बूढ़ी औरत को अँधेरे में कुएँ पर देखने वाले तीन लोग थे।
पाँचवें दिन जो हुआ, वह किसी ने तय नहीं किया था। पहले दरवाज़े वाले बूढ़े ने उस दिन पानी नहीं माँगा। उसने अपने घर से एक लोटा भरकर बाहर रख लिया, अपने लिए। दूसरे दरवाज़े वाली औरत ने अपने हाथ अपने घर के पानी से धोए।
तीसरे दरवाज़े का कठौता उस घर के आदमी ने भरना शुरू कर दिया। पाँचवें दरवाज़े वाले ने अपनी दवा के साथ एक गिलास पानी अपने पास रखना शुरू किया। और छठे दरवाज़े पर, जहाँ कोई नहीं था, एक मटका बाहर रख दिया गया, गली के लिए।
वह मटका किसने रखा, यह उस गली में आज तक तय नहीं हुआ, और तीन घर उसका दावा करते हैं। चौथे दरवाज़े का बच्चा अब भी रोता था और गुलाबो अब भी घड़ा नीचे रखकर उसे उठा लेती थी। वह हिस्सा नहीं बदला, क्योंकि उसमें पानी नहीं जाता था।
इस बीच एक और चीज़ हुई, जो गुलाबो ने ख़ुद बदली। उसने अपना घड़ा बदल दिया। पुराना घड़ा चौड़े मुँह का था और उसमें से पानी निकालना आसान था, और यही उसकी दिक़्क़त थी। नया घड़ा सँकरे मुँह का लिया गया, जिसमें से गिलास भरने के लिए उसे झुकाना पड़ता है।
इससे दो घूँट देना मुश्किल नहीं हुआ, बस उसमें एक पल की देर लगने लगी। उस एक पल में माँगने वाला अपने आप कह देता था कि रहने दे। यह तरीक़ा उसने किसी को बताया नहीं और उस गली में किसी ने पकड़ा भी नहीं।
उस बरस बरसात देर से आई और जब आई तो कुआँ भर गया, और चौदह बाल्टी फिर चार हो गईं। मटका वहीं रहा। उसे कोई नहीं हटाया। उस गली में अब वह मटका हर गरमी में बाहर निकलता है और हर बरसात में अंदर चला जाता है।
उसे भरने की बारी बनी हुई है और वह बारी कहीं लिखी नहीं है, बस सबको याद है।
जिन घरों में यह किस्सा सुनाया जाता है, वहाँ गिनती छह पर रुक जाती है और सातवाँ दरवाज़ा अलग से आता है, आख़िर में, क्योंकि सुनाने वाले उसे साथ में नहीं गिनते। वे कहते हैं कि सात दरवाज़े थे और छह पर माँगा गया, और सातवें पर पूछा गया, और यही फ़र्क़ था।