गाड़ियाँ नौ थीं। वे एक के पीछे एक चल रही थीं। रास्ता कच्चा था और भादों के दिन थे, यानी बरसात हो चुकी थी और ज़मीन नीचे से नरम थी। ऊपर से वह सूखी दिखती है और यही उसकी सबसे बड़ी बात है।

सबसे आगे गंगाराम की गाड़ी थी और उसमें दो बैल थे। दाईं तरफ़ वाला बूढ़ा था और उसे कोई नाम नहीं दिया गया था, क्योंकि उस इलाक़े में बैलों के नाम नहीं रखे जाते। उसे गंगाराम बड़ा कहता था, क्योंकि वह दूसरे से बड़ा था।

नदी के पुल से आगे एक मोड़ आता है और वहाँ रास्ता ढलान पर उतरता है। उस मोड़ पर बड़ा रुक गया। पूरा रुक गया। वह ऐसे नहीं रुका जैसे थका हुआ जानवर रुकता है। थका जानवर धीमा होता है और चलता रहता है।

यह पूरा रुक गया, दोनों पैर जमाकर, और उसने अपने कान पीछे कर लिए। कान पीछे करना एक बात कहता है और उस इलाक़े में हर गाड़ीवान उसे जानता है। गंगाराम ने भी जाना। फ़ौरन जाना। उसने रस्सी ढीली कर दी और वह नीचे उतर गया।

पर पीछे आठ गाड़ियाँ थीं और वे रुकी हुई थीं, और उन्हें उस दिन शाम तक मंडी पहुँचना था। पीछे से आवाज़ें आने लगीं। तेज़ आवाज़ें। दूसरी गाड़ी वाले ने कहा कि हाँको। तीसरी वाले ने कहा कि यह बूढ़ा हो गया है, बदल दो।

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पाँचवीं वाले ने वह किया जो नहीं करना चाहिए था। वह अपनी गाड़ी से उतरकर आगे आया और उसने बड़े को पीछे से मारा, बाँस से, दो बार। बड़ा आगे बढ़ा। मार से बढ़ा। उसने चार क़दम चले और पाँचवें में उसका दायाँ पैर धँस गया, घुटने तक।

उसके पीछे गाड़ी का पहिया भी धँसा। पूरा।

वह जगह ऊपर से सूखी थी और नीचे से खोखली, क्योंकि उसके नीचे एक पुरानी नाली दबी हुई थी, जिसका पानी बरसात में बहता है और मिट्टी बहा देता है। यह किसी को नहीं मालूम था और यह ऊपर से देखा नहीं जा सकता था।

अब गिनती करो कि इसमें क्या-क्या लगा। बैल को निकालने में सात आदमी और डेढ़ घंटा लगा। पहिया निकालने में उसके बाद और एक घंटा। गाड़ी का अनाज उतारकर दूसरी गाड़ियों में बाँटा गया और फिर वापस चढ़ाया गया। मंडी उस दिन कोई नहीं पहुँचा। एक गाड़ी भी नहीं।

बड़े का पैर छिल गया और वह तीन दिन जुता नहीं। और वह रास्ता उसके बाद बदल दिया गया, यानी उस मोड़ से पहले एक नई पगडंडी बनी, जो थोड़ी लंबी है और ऊपर से जाती है। उस डेढ़ घंटे में एक बात हुई जो गिनती में नहीं आती।

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बैल को गड्ढे से निकालते वक़्त सबसे पहले उसका सिर सँभालना पड़ता है, नहीं तो वह घबराकर और धँसता है। यह काम गंगाराम ने किया और वह उसके सिर के पास बैठा रहा, कीचड़ में, पूरे डेढ़ घंटे। वह उससे कुछ नहीं कह रहा था। वह बस हाथ उसके माथे पर रखे बैठा था।

बाक़ी सात आदमी पीछे से खींच रहे थे और उन्हें यह दिख रहा था। इसका ज़िक्र आगे कहीं नहीं आता और यह उन सात में से किसी ने बताया था। अब आगे की बात। पाँचवीं गाड़ी वाले ने माफ़ी नहीं माँगी। कभी नहीं माँगी।

उसने बात ही नहीं की और वह उस दिन सबसे पहले वहाँ से गया। गंगाराम ने उससे कुछ नहीं कहा, उस दिन भी नहीं और बाद में भी नहीं। और यहाँ यह कहना बेईमानी होगी कि उसे उस पर गुस्सा नहीं आया।

आया। और उसने वह अपने पास रखा। जो चीज़ उसने बदली, वह अपने आप में छोटी है। उसके बाद वह गाड़ी चलाते हुए रास्ता नहीं देखता। वह बैल के कान देखता है। सिर्फ़ कान। उसने यह न किसी को सिखाया और न किसी को बताया, और फिर भी यह उस इलाक़े में फैल गया।

फैलने का तरीक़ा यह था कि लोग उसे देखते थे। गाड़ी पर बैठा आदमी अगर आगे नहीं देख रहा है तो यह दूर से दिखता है और लोग पूछते हैं। पूछने पर वह कहता था कि आगे मुझसे पहले वह देखता है।

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इससे ज़्यादा उसने कभी कुछ नहीं कहा। बड़ा उसके बाद चार बरस चला और चौथे बरस के आख़िर में वह बैठ गया, अपने आप, बाड़े में। गंगाराम ने उसकी जगह नया बैल लिया और नए बैल के कान वह पहले दिन से देखता रहा।

नया बैल दो बार रुका और दोनों बार वजह नहीं थी, यानी वह बस रुका था। तीसरी बार वह रुका और वजह थी, और वह एक टूटा हुआ पुलिया था।

उस दिन गंगाराम उतरा और उसने आगे जाकर देखा और वापस आया और गाड़ी मोड़ ली। पीछे कोई गाड़ी नहीं थी, इसलिए किसी ने कुछ नहीं कहा। उस इलाक़े में अब यह चलन है कि गाड़ीवान बैल के कान देखता है, और इसे कोई अलग बात नहीं मानता।

छोटे बच्चे जब पहली बार गाड़ी पर बैठते हैं तो उन्हें यही बताया जाता है, और बताने वाला इसका कारण नहीं बताता। कारण उन्हें बाद में मालूम होता है, किसी से, और हर बार किस्सा थोड़ा बदला हुआ मिलता है।

किसी में गाड़ियाँ नौ हैं और किसी में ग्यारह। किसी में मारने वाला पाँचवीं गाड़ी का है और किसी में सातवीं का। एक बात हर बार वही रहती है, कि बैल ने कान पीछे कर लिए थे, और यह हिस्सा कोई नहीं बदलता।