दुकान गल्ले की थी और उसमें तीन हिस्से बनने थे। बाप के जाने के बाद तीनों भाइयों ने यह तय किया कि झगड़ा नहीं होगा और उन्होंने यह निभाया भी। बँटवारे का तरीक़ा उन्होंने ख़ुद बनाया। तीन पर्चियाँ बनीं और तीनों पर एक-एक हिस्सा लिखा गया, और पर्चियाँ उठाई नहीं गईं।

उठाने की जगह उन्होंने बड़े से छोटे का क्रम रखा, यानी सबसे बड़ा पहले चुनेगा। यह भी उन्होंने आपस में तय किया और यह उस वक़्त सबको ठीक लगा। पहला हिस्सा माल था, यानी गोदाम में जो अनाज रखा था।

दूसरा हिस्सा दुकान का सामान था, यानी तराज़ू, बाट, बोरे और गद्दी। तीसरा हिस्सा एक कापी थी। बस एक कापी। कापी मोटी थी और उसका नाम बही है, और उसमें बाप के हाथ का हिसाब लिखा था। सबसे बड़े ने माल चुना और यह किसी को अजीब नहीं लगा।

माल का दाम उस दिन पैंतालीस हज़ार बैठता था और तीनों को यह मालूम था। दूसरे ने सामान चुना और वह भी ठीक चुनाव था। तराज़ू और बाट के बिना दुकान नहीं चलती और नए बाट महँगे मिलते हैं। तीसरे के लिए बही बची। और कुछ नहीं।

उसका नाम नेमीचंद है और वह उस वक़्त उन्नीस का था। उसने बही ली और उसने इस पर कोई शिकायत नहीं की। बात यह है कि उसने उसे उसी रात पढ़ा। पूरी रात पढ़ा। अब तुम सोचोगे कि बही में क्या होता है।

📚 यह भी पढ़ें सात दरवाज़े
सात दरवाज़े

बही में हिसाब होता है, यानी किसने कितना लिया और किसने कितना दिया। यह हिसाब बेकार नहीं होता, पर पुराना पड़ जाता है। जिस पैसे की उम्मीद हो, वह अगर तीन बरस पुराना है तो वह उम्मीद ही रहता है।

यह नेमीचंद को भी मालूम था। वह मूर्ख नहीं था। उसने जो ढूँढ़ा, वह उधार नहीं था। कुछ और था। बाप के हिसाब में एक जगह एक और चीज़ लिखी जाती थी और उसका ख़ाना अलग था। वह ख़ाना उस माल का था जिसका पैसा आ चुका था और माल उठाया नहीं गया था।

गाँव में यह आम है। आदमी फ़सल के बाद पैसे दे जाता है और अनाज बाद में उठाता है, जब घर में जगह हो। उस ख़ाने में इकतालीस नाम थे। पूरे इकतालीस। इकतालीस लोगों का माल उस गोदाम में पड़ा था, जिसका पैसा उनका दिया हुआ था।

यानी गोदाम का सारा माल दुकान का नहीं था। और वह ख़ाना बही में था, गोदाम में नहीं। गोदाम में बोरे एक जैसे दिखते हैं। सब एक जैसे। नेमीचंद ने यह अगली सुबह अपने बड़े भाई को बताया। बताने का तरीक़ा उसने पहले से सोचकर रखा था।

वह बही लेकर गया और उसने वह ख़ाना खोलकर उसके सामने रख दिया, और कुछ नहीं कहा। बड़े भाई ने उसे पढ़ा और उसे पूरा पढ़ने में देर लगी, क्योंकि नाम इकतालीस थे। पढ़ने के बाद उसने एक ही बात पूछी।

📚 यह भी पढ़ें पहिये का धुरा
पहिये का धुरा

उसने पूछा कि यह कितने का है। नेमीचंद ने कहा कि लगभग सत्रह हज़ार का। यानी पैंतालीस का माल असल में अट्ठाईस का था। इसके बाद उस कमरे में जो हुआ, वह झगड़ा नहीं था। कोई आवाज़ ऊँची नहीं हुई।

तीनों बैठे और उन्होंने बँटवारा दोबारा किया, उसी दिन। दोबारा करने में उन्होंने पर्चियाँ नहीं बनाईं। उन्होंने वही तीन हिस्से रखे और उनमें रक़म से बराबरी की, यानी बड़े ने छोटे को कुछ पैसा दिया और मँझले ने भी। कितना दिया, यह उस बही में नहीं लिखा गया, और यह जान-बूझकर नहीं लिखा गया।

एक बात यहाँ जोड़नी है, नहीं तो बड़े भाई के साथ नाइंसाफ़ी हो जाएगी। उसे वह ख़ाना ख़ुद भी मिल जाता, देर-सबेर। गोदाम का माल जब बिकने निकलता है तो लेने वाले आते हैं और अपना बोरा माँगते हैं। पाँच-छह लोग आकर यह कहते कि यह हमारा है, और तब बात खुलती।

फ़र्क़ इतना ही था कि तब वह दो-चार लोगों के सामने खुलती, और भाइयों के बीच नहीं। यह बात नेमीचंद ने उस दिन कही थी और उसी ने कही थी। अब वह बात, जो ऊपर से दिखती नहीं है। नेमीचंद को उस बही से पैसा नहीं मिला।

उसे जो मिला, वह इकतालीस नाम थे। सिर्फ़ नाम। उन इकतालीस लोगों का माल उसके भाई के गोदाम में था और उन्हें यह मालूम नहीं था कि बाप के जाने के बाद उनका हिसाब किसके पास है। नेमीचंद उन इकतालीस के घर गया, एक-एक करके, और उसमें उसे पाँच महीने लगे।

📚 यह भी पढ़ें बैल के कान
बैल के कान

वह हर घर में जाकर उन्हें उनका ख़ाता दिखाता था और पूछता था कि माल कब उठाना है। इकतालीस में से एक भी ऐसा नहीं था जिसे यह अच्छा न लगा हो। पाँच महीने बाद जब उसने अपनी दुकान खोली, तो पहले दिन ग्यारह लोग आए, और वे उन्हीं इकतालीस में से थे।

उस बही में अब तीनों भाइयों की लिखावट है।

पहली दो सौ पंद्रह पन्नों पर उनके बाप की, उसके बाद नेमीचंद की, और बीच में दो पन्नों पर बड़े भाई की, जो उसने उस एक दिन लिखे थे जब बँटवारा दोबारा हुआ। वह बही अब भी नेमीचंद की दुकान की गद्दी पर रहती है और उसका जिल्द तीन बार बदला गया है।

उस घर में जब कोई बच्चा कुछ चुनने में लंबा वक़्त लेता है, तो कोई बड़ा उसे एक बात कह देता है, और वह बात हर बार वही होती है। वह कहता है कि जो चीज़ हल्की है, उसे उठाकर पहले खोलकर देख लो। बच्चे इसका मतलब पूछते हैं और बताने वाला हर बार कहता है कि बाद में बताऊँगा।