राजा सुमेर ने एक हुक्म भेजा और उसमें दाम की बात नहीं थी। उसने कहा कि उसके इलाक़े में जो चीज़ सबसे बढ़िया बनी हो, वह उसके सामने आए। बढ़िया बनी, यह उसने साफ़ लिखवाया। क़ीमती नहीं, बड़ी नहीं, पुरानी नहीं।
बस बनी हुई। इस हुक्म का नतीजा तय था। पहले महीने में जो चीज़ें आईं, वे ये थीं। सोने का एक कटोरा, जिस पर बेल-बूटे उठे हुए थे। हाथीदाँत का एक डिब्बा, जिसमें सात डिब्बे एक के अंदर एक थे।
एक ताला, जो सात चाबियों से खुलता था और छह से नहीं। और एक चादर, जो बहुत महीन थी। राजा ने चारों देखीं और चारों रख लीं, क्योंकि लौटाना ठीक नहीं होता। पर उसने किसी को इनाम नहीं दिया। एक को भी नहीं।
पूछने पर उसने जो कहा, वह उस दरबार में किसी को समझ नहीं आया। उसने कहा कि इनमें से कोई चीज़ काम में नहीं है। दूसरे महीने में और चीज़ें आईं और वे पहले वाली से बेहतर थीं। उनमें एक तराज़ू था, जिसका काँटा एक बाल के वज़न पर हिलता था।
यह अच्छी चीज़ थी। राजा ने इसे माना भी। उसने पूछा कि यह कहाँ काम आता है। जवाब मिला कि सर्राफ़ की दुकान पर। उसने पूछा कि उस दुकान पर यह कितने बरस चलेगा। जवाब मिला कि पाँच-सात बरस, फिर काँटा ढीला पड़ जाता है।
उसने इस पर कुछ नहीं कहा और तराज़ू भी रख लिया। तीसरे महीने में दरबार का एक आदमी उससे मिला और उसने एक सवाल पूछा। उसने पूछा कि हुज़ूर ढूँढ़ क्या रहे हैं। राजा ने जवाब दिया और वह जवाब पूरा नहीं था, और उसे ख़ुद भी यह मालूम था।
उसने कहा कि वह वह चीज़ ढूँढ़ रहा है जिसे बनाने वाले ने सबसे ठीक बनाया हो। उस आदमी ने पूछा कि सबसे ठीक कैसे नापेंगे। और यहीं बात मुड़ गई, क्योंकि राजा के पास इसका जवाब नहीं था। उसने तीन दिन सोचा। चौथे दिन हुक्म बदल दिया।
नए हुक्म में एक लाइन जुड़ी। बस एक। उसमें लिखा गया कि वह चीज़ आए जो सबसे ज़्यादा चली हो और अब भी चल रही हो। इस लाइन ने सब बदल दिया। तुम देखोगे कि कैसे। अब सोने का कटोरा आगे नहीं आ सकता था, क्योंकि वह चलता नहीं, रखा रहता है।
हाथीदाँत का डिब्बा भी नहीं, और महीन चादर भी नहीं, क्योंकि महीन चीज़ रोज़ इस्तेमाल नहीं होती। चौथे महीने जो आया, वह एक पहिया था। बैलगाड़ी का पहिया, लकड़ी का, और उसका रंग उतर चुका था। लाने वाला एक किसान था और वह उसे अपनी गाड़ी से उतारकर लाया था, और उसकी गाड़ी उस दिन बिना पहिये के अपने गाँव में खड़ी थी।
उसने बताया कि यह पहिया उसके बाप के वक़्त का है। वह उन्तालीस बरस चला था और अब भी चल रहा था। उसमें बीच का धुरा घिसा हुआ था, पर वह गोल घिसा था, यानी एक तरफ़ से ज़्यादा नहीं।
यह बात बढ़ई की होती है और राजा को यह किसी ने समझाई। धुरा अगर बीच में ठीक न बैठा हो तो वह एक तरफ़ से घिसता है और तीन-चार बरस में पहिया डोलने लगता है। यह उन्तालीस बरस से गोल घिस रहा था। एक ही तरह से।
राजा ने पूछा कि इसे किसने बनाया। और यहाँ जवाब वह मिला जिसकी उम्मीद नहीं थी। किसान ने कहा कि उसे नहीं मालूम। नाम पता ही नहीं था। उसने कहा कि पहिया उसके बाप ने बनवाया था और बनाने वाले का नाम उसने नहीं सुना।
पूछताछ करवाई गई और वह चार गाँव तक गई और उसमें ग्यारह दिन लगे। बनाने वाला मिल गया। ज़िंदा मिला। वह बहुत बूढ़ा था और वह अब कुछ नहीं बनाता था, क्योंकि उसकी आँखें चली गई थीं। उसे दरबार में बुलाया गया और उससे पूछा गया कि उसने वह धुरा कैसे बैठाया।
उसने कहा कि उसे याद नहीं। कुछ भी याद नहीं। फिर उसने एक बात कही, जो उससे पूछी नहीं गई थी। उसने कहा कि वह हर धुरा बैठाने के बाद पहिये को हवा में घुमाकर छोड़ देता था और आवाज़ सुनता था।
अगर आवाज़ बराबर आती, तो वह उसे भेज देता था। अगर आवाज़ में कहीं भारीपन आता, तो वह उसे दोबारा खोलता था। उससे पूछा गया कि कितनी बार दोबारा खोलना पड़ता था। उसने कहा कि हर तीन में से एक बार।
यह गिनती सुनकर दरबार में कोई नहीं बोला। कुछ देर सन्नाटा रहा। क्योंकि इसका मतलब यह था कि उसने अपनी उम्र में जो पहिये बनाए, उनमें से एक तिहाई उसने अपने हाथ से तोड़े थे। उसे इनाम मिला और वह इनाम पैसा था, और उसने वह ले लिया।
पहिया उसे लौटा दिया गया और उसने वह किसान को वापस कर दिया, वहीं दरबार में। उस पहिये को दरबार में रखने की बात उठी थी और बूढ़े ने ही मना किया। उसने कहा कि यह चलता है, इसे चलने दो।
वह पहिया उसके बाद बारह बरस और चला और तेरहवें बरस उसका एक हिस्सा टूटा और उसे बदल दिया गया। धुरा नहीं बदला। वह नहीं बदला गया। धुरा अब भी वही है और वह अब भी गोल घिस रहा है।
उस गाँव में यह किस्सा सुनाया जाता है और सुनाने वाले उसमें एक चीज़ हमेशा जोड़ते हैं। जब कोई बच्चा कुछ बनाकर दिखाने लाता है, तो उसे कहा जाता है कि इसे घुमाकर छोड़ और सुन। बच्चे यह करते हैं, चाहे वह चीज़ घूमने वाली न हो, और उस पर कोई हँसता नहीं।