पीपल मोहना के आँगन के किनारे पर था और उसकी जड़ें दीवार के नीचे से पड़ोस में चली गई थीं। पेड़ पुराना था और उसकी छाया दोपहर में पूरे आँगन को ढक लेती थी। मोहना को पैसे की ज़रूरत पड़ी और वजह वही थी जो हमेशा होती है, यानी एक शादी।
उसने पेड़ बेचने की बात चलाई और फिर रोक ली। पेड़ बेचने का मतलब पेड़ कटना होता है और उस आँगन में उसके बिना कुछ नहीं रहता। इसलिए उसने एक और तरीक़ा निकाला, और वह तरीक़ा उसका ही था। उसने कहा कि वह पेड़ नहीं बेचेगा। छाया बेचेगा।
यह बात पहले किसी को समझ नहीं आई। किसी को भी नहीं। उसने समझाई। बात सादी थी। पेड़ उसका रहेगा, पत्ते उसके, लकड़ी उसकी, और फल भी उसके, अगर पीपल में कुछ आता हो। जो ख़रीदेगा, उसे छाया मिलेगी, यानी वह उसमें बैठ सकेगा, जब चाहे, जितनी देर चाहे।
ख़रीदने वाला धरमू था, जो उसी गली में रहता था और जिसका घर छोटा था और तंग था। उसके घर में दोपहर में बैठा नहीं जा सकता था, क्योंकि छत टीन की थी। उसके लिए यह सौदा अच्छा था और उसने उसे अच्छा माना, और उसने पैसे दे दिए।
काग़ज़ भी लिखा गया और उस पर दो गवाह हुए। काग़ज़ में एक ही लाइन थी। पीपल की छाया धरमू की है। यहाँ रुककर सोचो कि उस लाइन में क्या नहीं लिखा था। जगह नहीं लिखी थी। और वक़्त भी नहीं।
छाया एक जगह नहीं रहती। वह घूमती है। सुबह वह पश्चिम की तरफ़ पड़ती है, दोपहर में पेड़ के नीचे सिमट जाती है, और शाम को पूरब की तरफ़ लंबी हो जाती है। मोहना का आँगन पेड़ के पश्चिम में है।
और मोहना का बरामदा, जहाँ वह अपनी चारपाई डालता है, पेड़ के पूरब में है। पहले दिन दोपहर में धरमू पेड़ के नीचे आकर बैठा और वह ठीक रहा।
दूसरे दिन वह सुबह नौ बजे आया। जल्दी आ गया। सुबह नौ बजे छाया मोहना के आँगन के बीच में पड़ रही थी, उस जगह जहाँ बर्तन धुलते हैं। धरमू वहीं बैठ गया, क्योंकि छाया उसकी थी। इस पर मोहना ने कुछ कहा नहीं और वह वहीं खड़ा रह गया।
तीसरे दिन शाम को धरमू उस बरामदे में जाकर बैठ गया, जहाँ मोहना की चारपाई थी। छाया उस वक़्त वहीं थी। पूरे बरामदे पर। मोहना ने कहा कि यह मेरा बरामदा है। धरमू ने कहा कि यह तेरा बरामदा है और छाया मेरी है, और मैं छाया में बैठा हूँ।
दोनों बातें सही थीं। यही मुश्किल थी। चौथे दिन बात पंचायत तक नहीं गई, और यह अच्छा हुआ। उससे पहले उस गली की एक बुज़ुर्ग औरत ने दोनों को बुला लिया। उसका नाम किसी ने बाद में पूछा नहीं, इसलिए वह किसी को याद नहीं।
उसने दोनों से एक ही सवाल पूछा और वह सवाल छाया के बारे में नहीं था। उसने पूछा कि तुम दोनों को छाया कब चाहिए होती है। मोहना ने कहा कि शाम को, चारपाई पर। धरमू ने कहा कि दोपहर में, जब टीन तपता है।
यहीं पूरा मामला ख़त्म हो गया, और तुम देख सकते हो कि वह अपने आप ख़त्म हुआ। दोनों को अलग-अलग वक़्त चाहिए था और छाया दोनों वक़्त एक ही जगह नहीं रहती। उसी दिन काग़ज़ पर एक लाइन और लिखी गई।
उसमें लिखा गया कि छाया धरमू की है, ग्यारह बजे से चार बजे तक। उस लाइन पर दोनों ने निशान लगाए और वही दो गवाह फिर बुलाए गए। यह इंतज़ाम उनतीस बरस चला। उनतीस बरस में एक बार भी झगड़ा नहीं हुआ और इसकी वजह वह लाइन नहीं थी।
वजह यह थी कि दोनों ने अपने वक़्त से पहले आना बंद कर दिया। धरमू ग्यारह बजने के बाद आता था और चार बजने से पहले उठ जाता था, और उठते वक़्त वह चारपाई की जगह साफ़ कर देता था।
मोहना चार बजे से पहले बरामदे में नहीं बैठता था, चाहे धरमू आया हो या न आया हो। बीच में एक बरस ऐसा आया जब यह इंतज़ाम टूटने के क़रीब पहुँच गया। उस बरस मोहना बीमार पड़ा और उसे दिन में लेटना पड़ता था, और उसकी चारपाई बरामदे में ही थी।
ग्यारह से चार का वक़्त धरमू का था और उसमें बरामदे तक छाया नहीं आती, यह सब जानते हैं। फिर भी धरमू ने उन दिनों ग्यारह से चार वाला अपना वक़्त छोड़ दिया। उसने यह कहा नहीं और उसने वजह भी नहीं बताई।
वह उन दिनों दोपहर में अपने ही टीन के नीचे बैठा और छह हफ़्ते बैठा। मोहना ने ठीक होने के बाद उससे इसका ज़िक्र किया और धरमू ने कहा कि उसे याद नहीं। पेड़ अब भी वहीं है और वह और बड़ा हो गया है, इसलिए छाया भी बड़ी है।
दोनों अब नहीं हैं। उनके बाद वह काग़ज़ धरमू के बेटे के पास है और उसमें दोनों लाइनें हैं, एक के नीचे एक, और दूसरी लाइन की स्याही पहली से हल्की है। उस काग़ज़ की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि अब दोनों घरों के लोग उस छाया में एक साथ बैठते हैं और वक़्त कोई नहीं देखता।
फिर भी वह काग़ज़ रखा हुआ है, तह किया हुआ, एक डिब्बे में। धरमू का बेटा उसे साल में एक बार निकालता है, दीवाली की सफ़ाई में, और उसे खोलकर पढ़ता नहीं, बस देखता है और वापस रख देता है।