राजा सुजान के पास चीज़ें बहुत थीं और उनमें से किसी की नाप उसने ख़ुद नहीं ली थी। यह बात आगे काम आएगी, इसलिए इसे यहीं रख देते हैं। उसने एक हुक्म भेजा। वह छोटा था। उसे एक ऐसी चादर चाहिए थी जो अँगूठी के छल्ले से निकल जाए।
अँगूठी वह ख़ुद भेजेगा और छल्ला उसी का नाप होगा। पहला बुनकर आया और वह चौक का सबसे बड़ा बुनकर था। उसने चार महीने लगाए और एक चादर बुनी, जो इतनी महीन थी कि उसके आर-पार हथेली की लकीरें दिखती थीं।
वह छल्ले तक गई और अटक गई। आधे में अटकी। आधी निकली और आधी वहीं रुक गई। उसे खींचा नहीं गया, क्योंकि खींचने पर वह फट जाती। दूसरा बुनकर आया और उसने पहले वाले से पतला धागा लिया। पतला धागा लेने में एक दिक़्क़त है और वह हर बुनकर जानता है।
पतले धागे की चादर छोटी बनती है, क्योंकि उसे उतनी दूर तक खींचा नहीं जा सकता। उसने चादर छोटी बनाई और उसे छल्ले से निकाल दिया। राजा ने उसे खोलकर देखा और वह चादर उसके कंधे तक भी नहीं आई।
उसने कहा कि यह चादर नहीं है, रूमाल है। यह बात सही थी। रूमाल ही था। तीसरा बुनकर सात महीने लगाकर आया और उसने वह किया जो सबसे चतुर काम था। उसने चादर के बीच से धागे निकाल दिए, जाली की तरह, जिससे कपड़ा हल्का हो गया और नाप पूरी रही।
वह छल्ले से निकल गई। पूरी निकल गई। राजा ने उसे ओढ़ा और वह जाली से हवा आती रही, और जाड़ा उस दिन तेज़ था। उसने कहा कि यह ओढ़ने के काम की नहीं है। तीनों को कुछ नहीं मिला और तीनों को कुछ नहीं कहा गया, और तीनों लौट गए।
चौथी बार जो आई, वह उस चौक की नहीं थी। वह तीन कोस दूर के गाँव से आई और उसका नाम बालो था, और उसका करघा उसके घर के बरामदे में था। उसने आकर बुनने की बात नहीं की। उसने एक सवाल पूछा। बस एक।
उसने पूछा कि यह किसके लिए है। यह सवाल किसी ने नहीं पूछा था, और तुम सोचोगे कि पूछने से क्या बदलता है। बदलता है। और जवाब यह निकला। वह चादर राजा के लिए नहीं थी। उसकी बुआ के लिए थी।
वह उसकी बुआ के लिए थी, जो बहुत बूढ़ी थीं और जो पाँच बरस से बिस्तर पर थीं और उठकर बैठ नहीं पाती थीं। अँगूठी वाली शर्त भी उन्हीं की थी। उन्होंने बचपन में कहीं यह सुना था कि ऐसी चादर होती है और उन्होंने राजा से यह कहा था, हँसी में, बरसों पहले।
राजा को वह याद रह गई और उसने हुक्म भेज दिया। बालो ने यह सुनकर दूसरा सवाल पूछा। उसने पूछा कि वे लेटी रहती हैं या बैठती भी हैं। जवाब मिला कि लेटी रहती हैं। हमेशा।
इसके बाद उसने जो बुना, वह चादर की नाप की नहीं थी।
लेटे हुए आदमी को कंधे से घुटने तक चाहिए होता है और उससे नीचे का हिस्सा बेकार रहता है, क्योंकि वह खाट के सिरे पर लटका रहता है और उसका वज़न पैरों पर पड़ता है। यह बात बालो को अपने घर से मालूम थी, जहाँ उसकी सास आठ बरस बिस्तर पर रही थीं।
उसने चादर चौड़ी बुनी और छोटी बुनी। लंबाई में वह पहले वाली चादरों से कम थी और चौड़ाई में ज़्यादा। कपड़ा उतना ही महीन था जितना पहले बुनकर का, न उससे पतला। जाली उसने नहीं डाली। एक धागा नहीं निकाला।
कुल कपड़ा कम था, इसलिए वह छल्ले से निकल गई, और आराम से निकल गई, दो बार। दरबार में इस पर एक बात उठी और वह उठनी ही थी। एक आदमी ने कहा कि यह पूरी चादर नहीं है, यानी शर्त पूरी नहीं हुई।
बालो ने इस पर बहस नहीं की। एक शब्द नहीं। उसने कहा कि शर्त में यह नहीं लिखा था कि चादर कितनी लंबी हो। यह सही था। हुक्म में नाप नहीं थी। राजा ने वह चादर ली और अपनी बुआ के पास गया और उसे उन्हें ओढ़ा दिया।
उन्होंने पहले उसे छुआ और फिर एक बात कही, जो दरबार की बात से बड़ी थी। उन्होंने कहा कि पैरों पर भारी नहीं है। बस इतना कहा। बालो को उसका दाम मिला और उससे पूछा गया कि वह चौक में दुकान लेगी।
उसने मना कर दिया और अपने गाँव लौट गई, और उसका करघा उसी बरामदे में रहा। इसके बाद उस गाँव में एक चीज़ शुरू हुई, जो अब तक चल रही है। उसके पास लेटे हुए बीमारों के लिए चादरें बुनवाने वाले आने लगे, और वह उनसे हर बार वही दो सवाल पूछती थी।
किसके लिए है, और वे लेटे रहते हैं या बैठते भी हैं। उस गाँव में यह दोनों सवाल अब एक साथ बोले जाते हैं और उनका मतलब वहाँ सब समझते हैं। जब कोई बीमार पड़ता है और कोई उसके लिए कुछ बनवाने चलता है, तो घर का कोई बुज़ुर्ग उससे यही पूछ लेता है, उसी क्रम में।
बालो के करघे की जगह अब भी उस बरामदे में है और वहाँ फ़र्श पर दो गड्ढे बने हुए हैं, जहाँ उसके पैर पैडल पर पड़ते थे। उस घर के बच्चे उन गड्ढों में अपने पैर रखकर खड़े होते हैं और यह उन्हें कोई नहीं सिखाता, वे अपने आप करते हैं।