रसोई दो हज़ार चौदह में बँटी। ठीक से बँटी।
मकान हरदोई के एक पुराने मुहल्ले का है। दो भाई अपने परिवारों के साथ रहते हैं। ऊपर-नीचे। बीच में सीढ़ी।
बँटवारे से पहले खाना एक ही चूल्हे पर बनता था और उसमें बारह लोग खाते थे।
जो झगड़ा हुआ, वह घी का था। बस घी का।
यह हँसने वाली बात लगती है और उसी तरह की बातों से घर बँटते हैं। धनवंती का कहना था कि घी उसके हिस्से से ज़्यादा जा रहा है, क्योंकि जसुमती के बच्चे तीन हैं और उसके दो।
बहस दो हफ़्ते चली और उसमें दोनों तरफ़ की बातें ठीक भी थीं।
आख़िर में दोनों भाइयों ने कहा कि चूल्हा अलग कर लो।
उसके बाद घर में शांति हो गई और यह भी सच है।
जो बंद हुआ, वह बातचीत थी।
दोनों में बारह बरस से बात नहीं होती।
यह पूरी बंदी नहीं है। ज़रूरत की बात होती है। बिजली का बिल, छत का पानी, किसी के आने-जाने की ख़बर। तीन-चार वाक्य, महीने में दो-तीन बार।
इसके अलावा कुछ नहीं। बारह बरस से।
त्योहारों पर दोनों अलग-अलग करती हैं और मेहमानों को यह मालूम है और उन्होंने पूछना बंद कर दिया है।
अब वह चीज़ जो बारह बरस चल रही है।
उस मुहल्ले के पीछे एक गोल सड़क है, जो एक पुराने तालाब के चारों तरफ़ जाती है। उसका घेरा लगभग एक किलोमीटर है।
उस पर सुबह लोग टहलते हैं। छह से सात के बीच बीस-पच्चीस लोग होते हैं, और उनमें से आधे उसी मुहल्ले के हैं, यानी दोनों को जानने वाले।
धनवंती वहाँ दो हज़ार बारह से जाती है और जसुमती दो हज़ार पंद्रह से।
दोनों उसी वक़्त जाती हैं, यानी सवा छह के आसपास।
और दोनों उलटी दिशा में चलती हैं।
धनवंती घड़ी की दिशा में और जसुमती उसके उलटे।
इसका मतलब यह है कि वे एक चक्कर में एक बार आमने-सामने आती हैं।
दोनों तीन चक्कर लगाती हैं। यानी रोज़ तीन बार।
इन तीन बार में कुछ नहीं होता। नमस्ते नहीं, सिर हिलाना नहीं, आँख मिलाना भी नहीं।
यह किसी ने तय नहीं किया। अपने आप हुआ।
जसुमती ने वह दिशा इसलिए चुनी थी कि उसकी जेठानी उस तरफ़ जाती थी और वह उसके पीछे चलती हुई नहीं दिखना चाहती थी।
बारह बरस में एक भी सुबह ऐसी नहीं हुई जब दोनों में से किसी ने दिशा बदली हो।
इन बारह बरसों में उस रास्ते पर दोनों ने अलग-अलग लोगों से जान-पहचान बनाई। धनवंती के साथ दो औरतें चलती हैं और जसुमती के साथ तीन। दोनों समूहों में बात होती है और उनमें एक-दूसरे के घर का ज़िक्र भी आता है, क्योंकि मुहल्ला वही है। दोनों में से कोई अपने समूह में दूसरी की बात नहीं करती और यह उन पाँच औरतों को अजीब लगता है।
अब उस चीज़ की बात, जो पिछले बरस हुई।
जनवरी में जसुमती को ठंड लग गई और उसे तीन दिन बुख़ार रहा।
उन तीन दिनों में वह टहलने नहीं गई।
पहले दिन धनवंती ने अपने तीन चक्कर पूरे किए।
दूसरे दिन भी वही तीन।
तीसरे दिन उसने दिशा बदल दी। दूसरे चक्कर में।
यह किसी ने नहीं देखा और वहाँ देखने वाला कोई नहीं था।
वह उलटी दिशा में चली और उसने पूरा चक्कर लगाया, यानी वह उस रास्ते के उस हिस्से से गुज़री जहाँ से जसुमती गुज़रती थी।
उसने वहाँ कुछ नहीं देखा, क्योंकि देखने के लिए वहाँ कुछ नहीं था। रास्ता वही था, बस उलटा।
चौथे दिन जसुमती वापस आ गई और धनवंती उसी सुबह अपनी पुरानी दिशा में लौट आई।
यह बात उन दोनों में कभी नहीं आई और जसुमती को यह मालूम भी नहीं है।
बीच में एक चीज़ और चलती रही, जिसका दोनों को मालूम है और जिसे दोनों नहीं मानतीं।
उन बारह बरसों में दोनों की रसोई से दवा एक-दूसरे के हिस्से में गई है। बच्चों के बुख़ार में, दो बार, और एक बार पेट के दर्द में। वह दवा हर बार बच्चों के हाथ गई और दोनों में से किसी ने माँगी भी नहीं थी, वह भेज दी गई।
पिछले बरस एक और चीज़ हुई जो बदली नहीं। जसुमती की बड़ी बेटी की शादी थी और उसमें धनवंती ने पूरा काम किया, तीन दिन, रसोई से लेकर मेहमानों तक। दोनों में उन तीन दिनों में भी वही तीन-चार वाक्य हुए, काम के, और शादी के बाद वे वापस अपनी-अपनी जगह पर आ गईं।
दोनों की उम्र अब पचास के आसपास है और उनके बच्चे बड़े हो गए हैं।
उस गोल सड़क पर अब सुबह चालीस लोग होते हैं, क्योंकि पिछले बरस वहाँ पत्थर लग गया और सड़क अच्छी हो गई।
दोनों अब भी सवा छह बजे पहुँचती हैं और अब भी उलटी दिशा में चलती हैं और अब भी तीन बार आमने-सामने आती हैं। भीड़ बढ़ने से एक चीज़ बदल गई है, कि अब उन तीन बार में दोनों के बीच दो-तीन लोग होते हैं, और अब वह आमना-सामना किसी को दिखता भी नहीं।