उस घर में शाम को शोर होता था और वह रोज़ होता था।

आवाज़ें दो थीं। एक विठोबा की, जो अड़सठ का था, और एक उसकी बहू की।

घर नागपुर के एक मुहल्ले में है, चार भाइयों का साझा मकान, और उसमें उस वक़्त चौदह लोग रहते थे।

शोर की वजह कैरम था। बस खेल।

विठोबा उसे बचपन से खेलता था और उसे अच्छा खेलता था। घर में और कोई उसके साथ नहीं खेलता था, क्योंकि उसके साथ खेलने में मज़ा नहीं आता था, वह जीत जाता था।

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बहू का नाम सपना है और वह दो हज़ार सत्रह में उस घर में आई।

पहले महीने में उसने उसे खेलते देखा, अकेले, अभ्यास करते हुए, और उसने पूछा कि खेलूँ।

पहली बाज़ी में वह हारी। दूसरी में भी हारी।

छठी बाज़ी में उसने उसे हरा दिया। पहली बार।

उसके बाद नौ बरस वे रोज़ खेले, शाम साढ़े सात से आठ बजे के बीच, आधा घंटा, दो बाज़ियाँ।

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अब उस शोर की बात। वह असली नहीं था।

कैरम में झगड़ा दो चीज़ों पर होता है। एक, गोटी लाइन के अंदर थी या बाहर। दो, रानी को ढकना ज़रूरी है और कब ढका गया।

इन दोनों पर वे दोनों रोज़ लड़ते थे और वह लड़ाई सचमुच की लगती थी।

आवाज़ें ऊँची होती थीं, बोर्ड पर उँगली ठोंकी जाती थी, और दो-तीन बार गोटियाँ बिखेर दी गईं।

उस घर के बाक़ी बारह लोगों ने नौ बरस इसे एक ही तरह से समझा।

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उनके हिसाब से ससुर और बहू में पटती नहीं थी और यह उसका रूप था।

यह उस घर में कहा भी जाता था। सपना की सास ने उससे दो बार कहा कि उनसे मत खेलो, बात बढ़ जाती है। उसके पति ने भी एक बार कहा।

सपना ने हर बार यही कहा कि ठीक है, और अगले दिन खेलने बैठ गई।

विठोबा से किसी ने कुछ नहीं कहा। उस घर में उससे कोई कुछ नहीं कहता था।

नौ बरस में कुल कितनी बाज़ियाँ हुईं, यह गिना नहीं गया।

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जो चीज़ किसी ने नहीं देखी, वह यह थी।

उन आधे घंटों में वे दोनों उस लड़ाई के अलावा और कुछ बात नहीं करते थे, और उन्हें और किसी बात की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।

उस घर में सपना पहले चार बरस बहुत अकेली रही। यह उसकी सास की गलती नहीं थी और यह चौदह लोगों के घर की आम बात है, जहाँ नई बहू के पास काम बहुत होता है और बात करने वाला कोई नहीं होता।

उन चार बरसों में शाम का वह आधा घंटा वह एक चीज़ था जिसमें उसे किसी बात का जवाब नहीं देना पड़ता था।

विठोबा की तरफ़ से भी वैसा ही था। रिटायर होने के बाद उसके पास दिन में कोई काम नहीं था और घर में उससे कोई बहस नहीं करता था, और बहस के बिना आदमी को यह लगता है कि उसे गिना नहीं जा रहा।

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इन दोनों बातों को न सपना ने कहा और न विठोबा ने।

नौ बरस में एक शाम ऐसी भी आई जब खेल नहीं हुआ। दो हज़ार बीस में सपना के मायके से कोई ख़बर आई और वह तीन दिन अपने कमरे में रही। विठोबा ने उन तीनों शामों को बोर्ड बरामदे में निकालकर रख दिया और अकेले बैठा रहा, और उसने बुलाया नहीं। चौथी शाम सपना ख़ुद आई और उसने कहा कि लगाओ।

पिछले बरस सपना के पति का तबादला हुआ और वे दोनों अपने बच्चों के साथ पुणे चले गए।

उस घर में इस पर सब दुखी हुए, जैसा होता है।

एक चीज़ जो किसी ने कही नहीं, पर जो सबने महसूस की, वह यह थी कि अब शाम को शोर नहीं होगा।

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यह उन बारह लोगों के लिए राहत थी। किसी ने कहा नहीं।

जाने के बाद पहले तीन दिन विठोबा ने बोर्ड बरामदे में निकाला और अकेले अभ्यास किया।

चौथे दिन उसने नहीं निकाला। उसके बाद कभी नहीं।

उसके बाद उसने वह बोर्ड नहीं छुआ, और अब उसे ग्यारह महीने हो गए हैं।

घर वालों ने इसका मतलब यह निकाला कि उसकी उम्र हो गई है और आँख कमज़ोर हो गई है, जो सही भी है।

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सपना पुणे से हफ़्ते में एक बार फ़ोन करती है और वह अपनी सास को करती है।

उसमें आख़िर के दो मिनट वह विठोबा से बात करती है और उन दो मिनट में दोनों में से कोई कैरम का ज़िक्र नहीं करता।

वह बोर्ड बरामदे की उसी अलमारी के ऊपर रखा है और उस पर धूल है।

सपना ने पुणे में एक बोर्ड ख़रीदा, जाने के तीन महीने बाद, और वह उसने अपने बच्चों के लिए ख़रीदा। बच्चे उससे खेलते हैं और वह उनके साथ खेलती है और जीत जाती है। इसमें झगड़ा नहीं होता, क्योंकि बच्चे नियम नहीं जानते और वह उन्हें बताती भी नहीं।

उस घर के बच्चों को कैरम खेलना आता है और वे उसे कभी-कभी नीचे उतारते हैं। जब वे खेलते हैं तो झगड़ा करते हैं, गोटी लाइन के अंदर थी या बाहर, और उस झगड़े में विठोबा को बुलाया जाता है और वह आकर बता देता है, और उसके बाद वह वहीं खड़े-खड़े लौट जाता है और बैठता नहीं।