शादियों में बैठाने का इंतज़ाम कोई एक आदमी करता है और उसे कोई पूछता नहीं।

उस परिवार में यह काम जीवन के छोटे चाचा करते हैं।

जीवन और उसका चचेरा भाई एक ही आँगन में बड़े हुए। एक ही स्कूल, एक ही कमरा, और नौ बरस तक एक ही चारपाई।

उनके बीच चार महीने का फ़र्क़ है। बस चार महीने।

आज दोनों की हालत में जो फ़र्क़ है, वह बड़ा है।

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चचेरा भाई हैदराबाद में एक कंपनी में है। बड़ी तनख़्वाह, अपना घर, दोनों बच्चे अंग्रेज़ी स्कूल में।

जीवन उसी क़स्बे में है। उसकी लोहे की छोटी दुकान है, जिसमें कील, कब्ज़े, ताले और तार मिलते हैं, और महीने का चौदह-पंद्रह हज़ार निकलता है।

यह फ़र्क़ किसी एक चीज़ से नहीं बना। दोनों बारहवीं में लगभग बराबर थे। आगे चचेरे भाई का दाख़िला एक अच्छी जगह हो गया और जीवन का नहीं हुआ, और उसमें दो नंबर का फ़र्क़ था।

उसके बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए, और उसमें किसी ने कोई चाल नहीं चली।

अब वह चीज़ जो उस परिवार में चलती है। नौ बरस से।

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परिवार बड़ा है और उसमें साल में दो-तीन शादियाँ पड़ जाती हैं।

हर शादी में जीवन और उसका चचेरा भाई अलग-अलग बिठाए जाते हैं।

यह उनके चाचा जान-बूझकर करते हैं और उन्होंने यह किसी से नहीं कहा।

उनकी नीयत ख़राब नहीं है। उन्हें यह लगता है कि दोनों को साथ बिठाने पर जीवन को बुरा लगेगा, क्योंकि बात कमाई और बच्चों के स्कूल पर आ जाती है, और उस मेज़ पर बैठे बाक़ी लोग वही पूछते हैं।

यह डर बेवजह भी नहीं है। ऐसा एक बार हो चुका है, दो हज़ार सत्रह में, जब किसी रिश्तेदार ने भरी मेज़ पर जीवन से पूछ लिया था कि तू भी बाहर चला जा, भाई से कह।

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उस दिन जीवन ने हँसकर बात टाल दी थी और उसके चचेरे भाई ने कुछ नहीं कहा, और शाम को भी वह बात नहीं उठी।

उसके बाद से चाचा का यह इंतज़ाम चालू है।

अब असली हिस्सा।

नौ बरस में जितनी शादियाँ हुईं, उनमें से लगभग हर एक में वे दोनों आख़िर में एक ही जगह बैठे मिले।

यह अपने आप नहीं हुआ। दोनों ने किया।

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इसके तरीक़े अलग-अलग रहे और वे दोनों ने अलग-अलग निकाले।

चचेरा भाई खाने के वक़्त अपनी थाली उठाकर जीवन की मेज़ पर चला आता था और कहता था कि यहाँ जगह है।

जीवन दूसरी तरफ़ से करता था। वह मेज़ पर बैठता ही नहीं था, वह पंडाल के पीछे उस जगह पर खड़ा हो जाता था जहाँ हलवाई कड़ाही चलाते हैं, और उसका भाई वहीं आ जाता था, क्योंकि उसे मालूम था कि वह वहीं मिलेगा।

उन दोनों में जो बात होती थी, उसमें कमाई का ज़िक्र कभी नहीं आया।

बात दुकान की होती थी, कील और ताले के भाव की, हैदराबाद के मौसम की, बचपन की, और सबसे ज़्यादा उन लोगों की जो वहीं पंडाल में मौजूद होते थे।

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यानी वे दोनों साथ बैठकर बाक़ी परिवार का मज़ाक़ बनाते थे।

यह उन नौ बरसों की सबसे साफ़ बात है और किसी ने इसे नहीं पकड़ा।

इन नौ बरसों में दो शादियाँ ऐसी भी रहीं जिनमें वे नहीं मिल पाए। एक में चचेरा भाई नहीं आ सका, क्योंकि उसे दफ़्तर से छुट्टी नहीं मिली। दूसरी में जीवन दो घंटे में लौट गया, क्योंकि उसकी दुकान पर उस शाम एक बड़ा ऑर्डर उतरना था। दूसरी वाली में चचेरे भाई ने उसे तीन बार फ़ोन किया और हर बार उसने काटकर लिख दिया कि दुकान पर हूँ।

पिछले बरस उनके चाचा ने एक शादी में एक चीज़ की, जिसमें उन्हें अपनी ही मेहनत का नतीजा दिखा।

उन्होंने दोनों की जगहें पंडाल के दो सिरों पर रखीं, यानी अलग-अलग हिस्सों में, और उसमें बीच में मंडप पड़ता था।

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उस रात दोनों ढाई घंटे मंडप के पीछे वाली उस जगह पर बैठे रहे, जहाँ बिजली का जनरेटर रखा था और जहाँ आवाज़ इतनी थी कि बात करने के लिए चिल्लाना पड़ता था।

वे चिल्लाकर बात करते रहे। ढाई घंटे।

यह उनके चाचा ने देखा। उन्होंने कुछ नहीं कहा।

एक बात दोनों के बीच है जिसका ज़िक्र दोनों नहीं करते और जो उन नौ बरसों में एक बार सामने आई। जीवन की दुकान दो हज़ार इक्कीस में बंद होने के कगार पर थी और उसे अस्सी हज़ार की ज़रूरत थी। उसने अपने चचेरे भाई से नहीं माँगा, उसने बैंक से लिया, ज़्यादा ब्याज पर। यह उसके भाई को दो बरस बाद पता चला भाई ने वह बात कभी नहीं छेड़ी, और वह चुप्पी जीवन को अच्छी लगी।

उस परिवार में अब भी यह माना जाता है कि उन दोनों में दूरी है और उसे संभालकर रखना पड़ता है।

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यह बात दोनों को मालूम है, और आज तक इसका खंडन किसी ने नहीं किया।

इसकी वजह जीवन ने एक बार अपने भाई को बताई थी, और वह बहुत सादी थी। उसने कहा कि अगर घर वालों को यह मालूम हो जाए कि हम साथ बैठना चाहते हैं, तो वे हमें साथ बिठाने लगेंगे, और तब उस मेज़ पर बाक़ी दस लोग भी होंगे।

अगली शादी दिसंबर में है और उसमें बैठाने का काम फिर उनके चाचा के पास है। दोनों को यह मालूम है कि उन्हें अलग बिठाया जाएगा और इस पर उन दोनों में कुछ तय नहीं हुआ है, और किसी ने दूसरे से यह पूछा भी नहीं कि कहाँ मिलेंगे।