किराया दो हज़ार दो में सात सौ रुपए तय हुआ था और दो हज़ार छब्बीस में वह सात सौ ही था।

मकान अजमेर में है, एक भीतरी गली में, और हुकुम उसकी ऊपरी मंज़िल पर रहता था। दो कमरे, एक रसोई, और छत का आधा हिस्सा।

वह वहाँ चौबीस बरस रहा। पूरे चौबीस।

उसका काम कपड़े की एक दुकान पर था और उसके तीनों बच्चे उसी मकान में बड़े हुए और उसी मुहल्ले के स्कूल में पढ़े।

मकान मालिक का नाम मानिकचंद था और वह नीचे रहता था।

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चौबीस बरस में किराया एक बार नहीं बढ़ा। एक रुपया भी नहीं।

यह उस शहर में अनहोनी है और हुकुम को यह मालूम था।

उसने इसका मतलब वही निकाला जो कोई भी निकालता। उसे यह लगा कि मानिकचंद भला आदमी है।

और वह भला आदमी था भी, यह अलग बात है और झूठी नहीं है। छब्बीस बरस के आना-जाने में उन दोनों घरों में झगड़ा एक बार नहीं हुआ। बच्चों की शादियों में दोनों तरफ़ से आना-जाना हुआ। बीमारी में मदद हुई।

हुकुम ने चौबीस बरस में तीन बार ख़ुद किराया बढ़ाने की बात की।

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यह अजीब लगता है और वह सचमुच की बात है। जिस आदमी का किराया न बढ़े, उसे अपने ऊपर एक बोझ जमा होता जाता है।

तीनों बार मानिकचंद ने मना कर दिया। हर बार।

पहली बार उसने कहा कि रहने दो। दूसरी बार उसने कहा कि बच्चों की पढ़ाई है। तीसरी बार, जो दो हज़ार उन्नीस में थी, उसने कोई कारण नहीं बताया, उसने बात ही बदल दी।

हुकुम ने उसके बाद नहीं पूछा। कभी नहीं।

पिछले बरस मानिकचंद ने वह मकान अपने बेटे के नाम कर दिया।

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बेटा जयपुर में रहता है और उसने वह मकान किराए के हिसाब से देखा।

उसने किराया बढ़ाया और उसने वह ठीक बढ़ाया।

उस इलाक़े में उस तरह की मंज़िल का किराया अब पैंतालीस सौ के आसपास है। उसने चार हज़ार माँगे।

यह ज़्यादती नहीं थी और हुकुम ने भी उसे ज़्यादती नहीं कहा।

उससे इतना हुआ नहीं। उसकी अपनी कमाई अब बीस हज़ार से कुछ ऊपर है और उसमें चार हज़ार का किराया नहीं बैठता।

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उसने तीन महीने का वक़्त माँगा और वह मिल गया, और उसने उसी मुहल्ले में दो गली छोड़कर एक कमरा ले लिया, अठारह सौ में, जो छोटा है।

सामान निकलते वक़्त वह बेटा ऊपर आया और उसने एक बात कह दी।

उसने कहा कि पिताजी किराया इसलिए नहीं बढ़ाते थे कि इस मंज़िल का नक़्शा पास नहीं है।

हुकुम ने पूछा कि इसका मतलब क्या है।

उसने बताया कि वह ऊपरी मंज़िल उन्नीस सौ अट्ठानबे में बनी थी और उसका नक़्शा नगर निगम में जमा नहीं हुआ था, और वह उस वक़्त आम बात थी और अब उसे ठीक कराने में पैसा और चक्कर लगते हैं।

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और उसने वह बात भी बता दी जो असल में सब कुछ है। किराया बढ़ाने पर किरायानामा नए हिसाब से बनवाना पड़ता, और किरायानामे में उस मंज़िल का ब्योरा जाता, और वहाँ से बात नक़्शे तक पहुँच सकती थी।

यानी चौबीस बरस का वह सात सौ का किराया दया नहीं था। वह एक इंतज़ाम था। दोनों तरफ़ का।

हुकुम उस दिन कुछ नहीं बोला। उसने अपना सामान उतारा।

सामान उतारने में उसे दो दिन लगे और उनमें एक चीज़ पीछे छूट गई। छत के आधे हिस्से में उसने बरसों पहले एक लोहे का जंगला लगवाया था, अपने पैसे से, क्योंकि उसके बच्चे छोटे थे और छत पर मुँडेर नीची है। वह जंगला वहीं है और उसे उखाड़ने का सवाल किसी ने नहीं उठाया।

अब वह चीज़ जो इसे आसान नहीं बनाती।

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यह भी सच है कि मानिकचंद ने उस चौबीस बरस में उससे कोई पैसा नहीं ऐंठा और उसे कभी निकालने की बात नहीं की, जबकि वह कर सकता था।

यानी दोनों बातें एक साथ सच हैं। वह इंतज़ाम भी था और वह आदमी भला भी था।

हुकुम को इन दो बातों में से एक चुननी नहीं है और वह चुनना भी नहीं चाहता।

जो चीज़ उसे खटकती है, वह दूसरी है। और छोटी है।

वह उन तीन बार को याद करता है जब उसने ख़ुद किराया बढ़ाने की बात की थी, और उसे अब यह लगता है कि उन तीनों बार वह आदमी अंदर से डर गया होगा।

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यह उसे बहुत बुरा लगता है, और इसका कोई हल नहीं है, क्योंकि वह बात उसने नेकनीयती में की थी।

मानिकचंद अब जयपुर में अपने बेटे के पास है और वह अस्सी पार का है।

हुकुम उसी मुहल्ले में है, दो गली छोड़कर।

नए कमरे में जाने के बाद तीन महीने उसके बच्चों ने वह बात उठाई, कि इतना छोटा क्यों लिया, दो गली दूर ही कुछ और मिल सकता था। हुकुम ने उसका जवाब नहीं दिया, जैसा वह हमेशा करता है। असल कारण यह था कि उस गली से पुराने मकान की छत दिखती है और उसे वह दिखना अच्छा लगता है, और यह बात उसने किसी को नहीं बताई।

साल में एक-दो बार मानिकचंद अजमेर आता है और उन दोनों की बाज़ार में मुलाक़ात हो जाती है।

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दोनों हाथ मिलाते हैं और तबीयत पूछते हैं और दो-तीन मिनट खड़े रहते हैं।

हुकुम ने उसे आज तक यह नहीं बताया कि उसे नक़्शे की बात मालूम है, और वह बताएगा भी नहीं, और यह उसने इसलिए तय किया है कि बताने पर उस आदमी को यह लगेगा कि चौबीस बरस का हिसाब बदल गया, और हुकुम के हिसाब से वह बदला नहीं है।