दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था, हाथ में एक लिफ़ाफ़ा लिए।

जेठा ने उसे पहचाना नहीं। बिल्कुल नहीं। उसकी उम्र सड़सठ थी और उसकी आँखें ठीक थीं, पहचान की बात नहीं थी। वह आदमी उसे मालूम ही नहीं था।

उस आदमी ने अपना नाम बताया और वह भी जेठा को कुछ याद नहीं दिलाया।

फिर उसने जगह बताई। कोटा का पुराना बस अड्डा, चाय की दुकान, उन्नीस सौ पंचानबे।

जेठा की उस बस अड्डे पर चाय की दुकान थी, इकतीस बरस पहले, और वह चार बरस चली और उसके बाद बस अड्डा नई जगह चला गया और दुकान बंद हो गई।

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इसके बाद उस आदमी ने पूरी बात बताई और जेठा उसे सुनता रहा और उसे उसमें से कुछ भी याद नहीं आया।

बात यह थी। उन्नीस सौ पंचानबे की एक शाम वह लड़का उस बस अड्डे पर था, अठारह बरस का, और उसे अपने गाँव जाना था और उसका बटुआ खो गया था।

उसने जेठा की दुकान पर खड़े होकर चाय पी और पैसे नहीं थे।

जेठा ने उससे चाय के पैसे नहीं लिए और उसके बाद उसे बीस रुपए भी दिए, बस के किराए के।

बीस रुपए उस वक़्त बस का किराया था, और वह छोटी रक़म नहीं थी, और बहुत बड़ी भी नहीं थी।

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लड़के ने कहा था कि वह अगले हफ़्ते आकर दे देगा।

वह नहीं आ सका। उसके गाँव में उसी हफ़्ते कुछ हो गया और वह छह महीने बाद कोटा आया, और तब तक वह दुकान वहाँ थी, पर जेठा उस दिन दुकान पर नहीं था।

उसने दुकान पर बैठे लड़के को बीस रुपए दिए और चला गया।

वह पैसा जेठा तक पहुँचा या नहीं, यह किसी को नहीं मालूम। जेठा को भी नहीं।

इकतीस बरस बाद वह आदमी उस पते पर आया, जो उसे किसी पुराने जानकार से मिला था।

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उसकी उम्र अब उनचास थी। वह जयपुर में एक सरकारी दफ़्तर में था और उसके दो बच्चे थे।

उसने लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाया। दोनों हाथों से।

जेठा ने उसे नहीं लिया और उसकी वजह शिष्टाचार नहीं थी। उसने कहा कि मुझे यह याद ही नहीं है।

उस आदमी ने कहा कि मुझे याद है। पूरा याद है।

दोनों वहीं खड़े रहे और उसमें एक चीज़ बहुत अजीब थी। एक आदमी के लिए वह इकतीस बरस का बोझ था और दूसरे के लिए कुछ भी नहीं।

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जेठा ने उसे अंदर बुलाया और चाय बनवाई।

बातचीत में उसे यह मालूम हुआ कि उस आदमी ने वे बीस रुपए दो बार लौटाने की कोशिश की थी। एक बार छह महीने बाद, और एक बार दो हज़ार चार में, जब वह कोटा आया था और उसे उस दुकान का पता नहीं चला।

यह उसके मन में इकतीस बरस रहा।

जेठा ने उससे पूछा कि इतनी छोटी बात क्यों रखी।

उसने जो जवाब दिया, वह पैसे का नहीं था। उसने कहा कि उस शाम उसे यह लगा था कि अब कुछ नहीं होगा और वह वहीं बैठा रहेगा, और उस डर से उसे किसी ने निकाला था।

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उन इकतीस बरसों में जेठा का ख़ुद क्या हुआ, यह भी उस शाम बताया गया। दुकान बंद होने के बाद उसने चार बरस मज़दूरी की, फिर एक कारख़ाने में चौकीदारी, और अब वह पेंशन के बिना घर पर रहता है और उसका बेटा उसे रखता है। यानी उन दो हज़ार की उसे ज़रूरत थी, और यही वजह है कि उन्हें न लेना उसके लिए आसान नहीं था।

जेठा ने उससे लिफ़ाफ़ा नहीं लिया।

इस पर वह आदमी ज़िद पर आ गया और उसमें आधा घंटा गया।

आख़िर में हल यह निकला। लिफ़ाफ़े में दो हज़ार रुपए थे। जेठा ने उसमें से बीस रुपए निकाले और बाक़ी उसे लौटा दिए।

बीस रुपए उसने जेब में रखे।

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वह आदमी उस शाम गया और उसके बाद दो बार फ़ोन किया, और तीसरी बार जेठा ने ही किया।

अब दोनों में महीने में एक बार बात होती है और उसमें कोई ख़ास बात नहीं होती। वह आदमी हर बार यह पूछता है कि कुछ चाहिए तो बताइए, और जेठा हर बार कहता है कि नहीं।

दो हज़ार लौटाते वक़्त उसने एक बात कही, जो उस आदमी को अच्छी नहीं लगी। उसने कहा कि तुम पचास बरस के हो और तुम्हारे बच्चे हैं, यह पैसा उनके काम आएगा, मेरे नहीं। उस आदमी ने इस पर कुछ कहा नहीं, लिफ़ाफ़ा जेब में रख लिया, और उस शाम के बाद उसने इसका ज़िक्र दोबारा नहीं किया।

जो चीज़ जेठा को उसके बाद खटकती रही, वह यह है। उन चार बरसों में उसने ऐसे और भी लोगों को पैसे दिए होंगे, और उसे एक भी याद नहीं है।

यानी जो चीज़ इस आदमी की पूरी उमर में एक जगह अटकी रही, वह जेठा की तरफ़ से रोज़ का काम था।

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वे बीस रुपए उसने ख़र्च नहीं किए। वे उसकी उसी अलमारी में एक पुरानी डिबिया में पड़े हैं, दस-दस के दो नोट, और वे उस वक़्त के नहीं हैं, नए हैं, क्योंकि पुराने नोट अब चलते ही नहीं।