पूरन उन्नीस सौ अट्ठानबे में उस दफ़्तर में लगा और उसकी सिफ़ारिश उसके दोस्त ने की थी।
दोस्त का नाम ज्ञानदेव था और वह उसके साथ जबलपुर के उसी कॉलेज में पढ़ा था। ज्ञानदेव के मामा उस दफ़्तर में बाबू थे और उसी रास्ते से बात चली।
जगह एक थी। लिखित परीक्षा दोनों को देनी थी।
पूरन का चयन हुआ। ज्ञानदेव का नहीं हुआ।
जो बात उस वक़्त सबने मानी, वह यह थी कि पूरन का पर्चा बेहतर रहा। दोनों में कोई झगड़ा नहीं हुआ और ज्ञानदेव ने उसे बधाई भी दी।
उसके बाद उनके रास्ते अलग हो गए।
पूरन उसी दफ़्तर में अट्ठाईस बरस रहा और सहायक तक पहुँचा। पेंशन के साथ रिटायर हुआ।
ज्ञानदेव को दो बरस बाद एक निजी कंपनी में काम मिला, जो चली नहीं। उसके बाद उसने बीमा का काम किया, फिर एक कोचिंग में पढ़ाया, और आख़िर में अपने गाँव की तरफ़ खाद-बीज की दुकान खोल ली।
दोनों एक ही ज़िले में रहे और साल में एक-दो बार मिले।
इन अट्ठाईस बरसों में एक चीज़ हर बरस हुई।
दिवाली से दो-तीन दिन पहले पूरन उसे मिठाई भेजता था। पहले ख़ुद जाकर, बाद में किसी के हाथ, और आख़िर के बरसों में एक दुकान से सीधे।
ज्ञानदेव ने कभी कुछ नहीं भेजा। एक बरस भी नहीं।
यह उस इलाक़े में बहुत बड़ी बात है और मुहल्ले में इस पर बात भी होती थी। पूरन के घर में यह कहा जाता था कि वह आदमी अकड़ में है।
पूरन ने उस पर कभी कुछ नहीं कहा और भेजना बंद भी नहीं किया।
उसकी वजह उदारता नहीं थी। उसे यह मालूम था कि उस नौकरी की वजह से उसका घर चला और ज्ञानदेव का नहीं, और यह भी, कि उस दफ़्तर तक का रास्ता उसे ज्ञानदेव ने ही दिखाया था।
बीच में एक बार बात लगभग खुल गई थी। दो हज़ार नौ में ज्ञानदेव की दुकान पर नुक़सान हुआ और पूरन ने उसे बिना कहे तीस हज़ार भेज दिए। ज्ञानदेव ने वे लौटा दिए, उसी हफ़्ते, और साथ में कहलवा दिया कि इसकी ज़रूरत नहीं है। उस वक़्त पूरन को लगा कि यह उसकी अकड़ है।
पिछले बरस पूरन का रिटायरमेंट हुआ और उसमें वह पुरानी फ़ाइलें देखने बैठा, क्योंकि उसे अपनी सेवा-पुस्तिका की नक़ल चाहिए थी।
उस अलमारी में उन्नीस सौ अट्ठानबे की भर्ती का पूरा बंडल पड़ा था और उसमें उसकी नियुक्ति के काग़ज़ भी थे।
उसी बंडल में एक और काग़ज़ था। एक ही पन्ना।
ज्ञानदेव का आवेदन, जिसके ऊपर उसकी अपनी लिखावट में लिखा था कि वह इस पद के लिए अपना नाम वापस लेता है।
तारीख़ लिखित परीक्षा से नौ दिन पहले की थी। नौ दिन।
यानी उसने पर्चा दिया ही नहीं था। बैठा ही नहीं।
पूरन ने वह काग़ज़ दो बार पढ़ा और फिर वह उसे लेकर अपनी सीट पर आ गया और आधे घंटे बैठा रहा।
उस बंडल में कारण नहीं लिखा था, क्योंकि उस फ़ॉर्म में कारण का ख़ाना नहीं होता।
उसने उसी हफ़्ते ज्ञानदेव के पास जाकर पूछा।
ज्ञानदेव ने पहले यह कहा कि उसे याद नहीं है। फिर उसने कहा कि हो सकता है।
तीसरी बार पूछने पर उसने जो बताया, वह यह था। मामा ने उससे साफ़ कह दिया था कि सिफ़ारिश एक की चलेगी, दो की नहीं, और तुम दोनों में से जिसे कहो उसका नाम आगे बढ़ा दूँ।
ज्ञानदेव ने पूरन का नाम कहा। अपना नहीं।
उसने यह इसलिए किया कि उन दिनों पूरन के घर की हालत उससे ख़राब थी। पूरन के पिता नहीं थे और उसकी दो बहनों की शादी बाक़ी थी।
यह बात उसने अट्ठाईस बरस किसी को नहीं बताई, अपने घर में भी नहीं।
पूरन ने उससे यह पूछा कि तुमने मुझे क्यों नहीं बताया।
उसने कहा कि बताने से तुम नौकरी छोड़ नहीं देते, और तुम्हें भारी लगता रहता।
यह जवाब पूरा नहीं है और पूरन को यह मालूम है। असल वजह इसमें भी नहीं आई और ज्ञानदेव अब उसे नहीं बताएगा।
ज्ञानदेव के घर में यह बात अब भी नहीं मालूम है। उसकी पत्नी को इतना पता है कि उस बरस नौकरी नहीं हुई थी, और उसने बरसों उस बात पर ताना दिया, कि तुम्हारे मामा दफ़्तर में थे और तुमसे कुछ नहीं हुआ। ज्ञानदेव ने हर बार वही सुना और कुछ नहीं कहा।
दोनों की उम्र अब साठ के ऊपर है।
पूरन ने उसे पैसे देने की बात की और ज्ञानदेव ने मना कर दिया, और उसमें कोई नाराज़गी नहीं थी, उसने कहा कि दुकान चल रही है।
इस पिछली दिवाली पर पूरन ने मिठाई नहीं भेजी। पहली बार।
वह ख़ुद गया और सुबह आठ बजे उसकी दुकान पर पहुँच गया, जब दुकान खुलती है, और वहाँ दो घंटे बैठा रहा और ग्राहकों को थैलियाँ पकड़ाता रहा। इस पर ज्ञानदेव ने उसे दो बार टोका और वह उठा नहीं, और अगली दिवाली को भी वह यही करने वाला है, यह उसने अपने घर में बता दिया है।