दोनों बहनों की शादी एक ही क़स्बे में हुई और उनके घरों के बीच तीन किलोमीटर हैं।

यह इत्तिफ़ाक़ नहीं था। दूसरी शादी उसी क़स्बे में इसी वजह से करवाई गई थी कि दोनों पास रहें।

रमीला बड़ी है और उसकी शादी दो हज़ार आठ में हुई। छोटी की दो हज़ार दस में।

पाँच बरस दोनों के घरों में आना-जाना रहा।

दो हज़ार पंद्रह में उनके पतियों में एक बात हुई और उसके बाद वह आना-जाना बंद हो गया।

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बात ज़मीन की थी और वह उनके अपने घरों की नहीं थी। रमीला के पति ने एक प्लॉट में साझा पैसा लगाया था, अपने बहनोई के साथ, और उसमें नुक़सान हुआ और उस नुक़सान का हिसाब दोनों के बीच बराबर नहीं बैठा।

रक़म बड़ी नहीं थी। उन्नीस हज़ार का फ़र्क़।

दोनों आदमियों में उस पर एक बार बहुत बुरी बात हो गई और उसके बाद दोनों ने तय कर लिया।

दोनों बहनों ने कुछ तय नहीं किया। एक बात भी नहीं।

यहाँ जो चीज़ हुई, वह इस पूरी बात को अलग बनाती है।

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उन दोनों ने मिलना बंद नहीं किया। एक हफ़्ता भी नहीं।

क़स्बे के बीच में एक मंदिर है और वहाँ मंगलवार को भीड़ रहती है। दोनों बहनें ग्यारह बरस से हर मंगलवार वहाँ मिलती हैं।

बात पूरी होती है। बच्चों की पढ़ाई, तबीयत, राशन का भाव, ससुराल की बातें, और वह सब जो बहनें बात करती हैं।

आधा घंटा। कभी पौना घंटा। सीढ़ियों पर बैठकर।

ग्यारह बरस में एक भी मंगलवार वे नहीं चूकीं, सिर्फ़ उन हफ़्तों को छोड़कर जब कोई बीमार था या मायके गया था।

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जो उन्होंने नहीं किया, वह यह है। ग्यारह बरस में दोनों में से कोई एक बार भी दूसरी के घर के अंदर नहीं गई।

ऐसा कोई फ़ैसला उन दोनों ने आपस में नहीं लिया, और इसका कारण उनके पति भी नहीं हैं, क्योंकि दोनों पतियों को यह मालूम है कि वे मंगलवार को मिलती हैं और दोनों ने कभी रोका नहीं।

कारण छोटा और साफ़ है। घर के अंदर जाने पर बैठना पड़ता है, और बैठने पर आदमी सामने आ जाता है, और सामने आने पर उन्नीस हज़ार की बात कमरे में आ जाती है।

मंदिर की सीढ़ी पर वह बात नहीं आती। वहाँ जगह नहीं है उसकी।

इसलिए दोनों ने वह जगह नहीं बदली। ग्यारह बरस।

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मंगलवार तय होने की भी एक वजह है और वह श्रद्धा नहीं है। उस दिन उस मंदिर पर भीड़ रहती है, इसलिए दो औरतों का वहाँ आधा घंटा बैठना किसी को दिखता नहीं। बाक़ी दिनों में मंदिर ख़ाली रहता है और वहाँ बैठने पर बात बनती है, और क़स्बे में बात बनने में देर नहीं लगती।

इन ग्यारह बरसों में जो हुआ, वह अजीब है और उसे दोनों जानती हैं।

रमीला को अपनी बहन के घर का पूरा नक़्शा मालूम है और वह वहाँ कभी नहीं गई। उसे मालूम है कि रसोई किस तरफ़ है, पानी की टंकी कब भरी जाती है, कौन सा कमरा गरमी में गरम रहता है, और छत पर जाने की सीढ़ी कहाँ से चढ़ती है।

यह सब उसे बताया गया, हफ़्ते-दर-हफ़्ते, ग्यारह बरस में।

उसकी बहन को भी उसके घर का वैसा ही नक़्शा मालूम है।

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दोनों के बच्चे आपस में मिलते हैं और उन पर कोई रोक नहीं है। रमीला की बड़ी बेटी अपनी मौसी के घर जाती है और वहाँ खाना भी खाती है, और लौटकर अपनी माँ को बताती है।

यानी वह घर उस घर के बच्चों के लिए खुला है और बहनों के लिए नहीं।

एक बार, दो हज़ार बीस में, यह लगभग टूट गया था।

छोटी बहन की तबीयत ख़राब हुई और वह तीन दिन बुख़ार में रही। रमीला उसके दरवाज़े तक गई।

वह अंदर नहीं गई। दरवाज़े पर रुक गई। उसने दरवाज़े पर से पूछा, दवा का नाम लिखवाया, और लौट आई।

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उसकी बहन ने उसे अंदर बुलाया भी और उसने कहा कि मंगलवार को बात करेंगे।

यह बात उन दोनों में एक बार भी दोबारा नहीं उठी।

बच्चों के ज़रिए एक और चीज़ चलती रही, जो दोनों ने कभी नहीं मानी। त्योहारों पर मिठाई और कपड़े दोनों घरों के बीच जाते रहे, और वे हमेशा बच्चों के हाथ गए। रमीला ने ग्यारह बरस में एक बार भी अपने हाथ से कुछ नहीं भेजा और एक बार भी कुछ रुका नहीं।

पिछले बरस उनके पतियों में एक तीसरी जगह आमना-सामना हुआ, किसी की शादी में, और दोनों ने एक-दूसरे को नमस्ते किया।

इस पर दोनों बहनों ने अगले मंगलवार बात की, और घर आना शुरू करने की बात किसी ने नहीं उठाई।

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दोनों की उम्र अब चालीस के आसपास है। वक़्त निकल गया।

उन्नीस हज़ार का वह हिसाब आज तक बराबर नहीं हुआ और अब उसका कोई मतलब भी नहीं है, क्योंकि वह प्लॉट दो हज़ार अठारह में बिक गया।

मंदिर की वही सीढ़ी है, बाईं तरफ़ की तीसरी, और दोनों वहीं बैठती हैं। बीच में दो बार वहाँ मरम्मत हुई और सीढ़ियाँ नई पड़ीं, और दोनों ने उसी जगह बैठना जारी रखा, और अब उस पत्थर का रंग बाक़ी सीढ़ियों से हल्का है।