फ़ोन हर रविवार शाम सात बजे आता था।
ओंकार पुणे में एक कंपनी में था और उसके पिता जबलपुर में रहते थे। चौदह बरस से यही चल रहा था।
बात दस-बारह मिनट की होती थी और उसमें कुछ नहीं होता था। तबीयत, मौसम, बिजली का बिल, और महीने में एक बार पेंशन का हिसाब।
ओंकार उस फ़ोन को अक्सर देख लेता था और उठाता नहीं था।
इसकी वजह झगड़ा नहीं था। रविवार शाम को उसके घर में मेहमान होते थे, या बच्चे की क्लास होती थी, या वह किसी काम में होता था, और वह सोचता था कि थोड़ी देर में कर लूँगा।
थोड़ी देर में वह कर भी लेता था। हर बार। कभी उसी शाम, कभी रात को, और कभी सोमवार को।
पिता ने इस पर शिकायत कभी नहीं की। एक बार भी नहीं।
यह उस पूरी बात का सबसे भारी हिस्सा है और वह उसे तब समझ नहीं आया। शिकायत करने वाला आदमी याद रह जाता है। न करने वाला हिसाब रखता है।
बीच के बरसों में दो बार ऐसा हुआ कि उन्होंने रविवार के अलावा भी फ़ोन किया। एक बार अगस्त में, जब जबलपुर में उनके मुहल्ले में पानी भर गया था और तीन दिन बिजली नहीं थी। दूसरी बार दिवाली के दो दिन पहले, यह पूछने के लिए कि बच्चे आ रहे हैं या नहीं। दोनों बार ओंकार ने उठाया और दोनों बार बात पाँच मिनट में ख़त्म हो गई।
दो हज़ार छब्बीस के मार्च में ओंकार का फ़ोन बदला।
पुराने फ़ोन से नए में सब कुछ चला आया, कॉल का रिकॉर्ड भी, और उस रिकॉर्ड में चार बरस का ब्योरा था।
एक शाम, किसी और चीज़ को ढूँढ़ते हुए, उसने उसमें पिता का नंबर खोला।
जो उसने देखा, वह यह था। चार बरस में उनकी दो सौ इक्यासी कॉल थीं।
उसकी अपनी उन्नीस थीं। पूरे चार बरस में।
यह उसने गिना नहीं था। यह वहाँ लिखा हुआ था, दो जगह, आने वाली और जाने वाली, और नंबर ऐसे लिखे थे कि उन्हें देखने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता।
उसमें से भी छत्तीस कॉल छूटी हुई थीं, यानी उन्होंने की और उसने नहीं उठाई।
उन्नीस कॉल में से आठ किसी काम की थीं। तीन बार उसे पैसे भेजने की बात करनी थी, दो बार किसी रिश्तेदार का नंबर चाहिए था, और तीन बार वह छुट्टी की तारीख़ बताने के लिए था। यानी चार बरस में उसने ग्यारह बार बिना काम फ़ोन किया, जो साल में तीन से कम बैठता है।
वह उस रात देर तक जागा, और उसने किसी से कुछ नहीं कहा, अपनी पत्नी से भी नहीं।
अगले रविवार उसने छह बजकर पचास मिनट पर फ़ोन किया।
पिता ने उठाया और पहला वाक्य यह कहा कि सब ठीक है।
यह सवाल नहीं था। यह उनका जवाब था, इस आदत का, कि जब बेटा फ़ोन करे तो कुछ हुआ होगा।
ओंकार ने कहा कि कुछ नहीं हुआ, बस किया है।
उस दिन बात चौबीस मिनट चली और उसमें भी कुछ नहीं हुआ। तबीयत, मौसम, और पेंशन।
उसके बाद के दस रविवार उसने पहले फ़ोन किया।
ग्यारहवें रविवार वह भूल गया और पिता का फ़ोन सात बजे आ गया।
उस दिन उन्होंने कोई बात नहीं की। यानी उन्होंने यह नहीं कहा कि तुमने आज नहीं किया, और उन्होंने यह भी नहीं कहा कि पिछले दस बार तुमने किया था।
यहीं ओंकार को वह चीज़ समझ आई जो उससे पहले नहीं आई थी। उन्होंने चौदह बरस में एक बार भी हिसाब नहीं बताया, और हिसाब उनके पास था।
इसके बाद उसने एक चीज़ बदली, और वह पीछे की तरफ़ नहीं थी, आगे की तरफ़ थी।
उसने फ़ोन का वक़्त बदलवा लिया। सुबह का।
उसने पिता से कहा कि रविवार शाम सात बजे मत करिए, सुबह आठ बजे करिए, और उसकी वजह भी बता दी, कि शाम को उसके घर में लोग होते हैं।
यह सुनकर उन्होंने कहा कि मुझे मालूम था।
चौदह बरस उन्होंने वह वक़्त इसलिए नहीं बदला था कि पूछने पर बेटे को लगेगा कि वह उससे कुछ माँग रहे हैं।
यह सुनकर ओंकार ने उनसे कुछ नहीं कहा और उसे कहने के लिए कुछ था भी नहीं। जो बात कही जा सकती थी, वह यह थी कि आपने पूछ लेना चाहिए था, और वह बात उसके अपने ऊपर आती थी, क्योंकि उसने भी चौदह बरस में यह नहीं पूछा था कि सात बजे ही क्यों।
अब फ़ोन रविवार सुबह आठ बजे होता है और उसे लगभग हर बार ओंकार करता है, और पिता आठ बजकर पाँच मिनट तक इंतज़ार करते हैं, यह उन्होंने बताया नहीं, यह उनके बग़ल वाले पड़ोसी ने बताया।
उन्नीस और दो सौ इक्यासी का फ़र्क़ बराबर नहीं हुआ है और होगा भी नहीं, क्योंकि वे चार बरस पीछे पड़े हैं।
वह पुराना फ़ोन उसने रखा हुआ है, दराज़ में, बिना सिम के, और उसकी बैटरी बैठ चुकी है। उसमें वह रिकॉर्ड अब भी है और ओंकार ने उसे दोबारा नहीं खोला, और वह फ़ोन उसने किसी को दिया भी नहीं, न बेचा।