उसके स्कूल के चौदह बरसों में अमरनाथ एक भी कार्यक्रम में नहीं आया।

इसमें बहाना नहीं था, और उस घर के सब लोग यह जानते हैं।

वह ग्वालियर की एक मिल में तीन पालियों वाले काम पर था। कार्यक्रम स्कूल में सुबह ग्यारह बजे होते हैं और उस वक़्त वह या पाली में होता था या सो रहा होता था।

छुट्टी उस मिल में मिलती थी और उसकी गिनती होती थी। साल में बारह, और वे बीमारी और शादियों में जाती थीं।

बेटी का नाम नीरू है। एक ही बेटी।

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वह चौदह बरस में कार्यक्रमों में गई। कविता में तीन बार, नाटक में एक बार, और आठवीं में उसे विज्ञान की एक प्रदर्शनी में इनाम मिला।

उस इनाम वाले दिन उसकी माँ आई थी। अकेली।

अमरनाथ ने कभी यह नहीं कहा कि उसे बुरा लगता है और नीरू ने भी नहीं कहा।

जो हुआ वह इतना था कि वह बताना बंद कर दिया।

छठी तक वह घर आकर बताती थी कि कार्यक्रम कब है। सातवीं से उसने बताना छोड़ दिया।

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यह उसने ग़ुस्से में नहीं किया। उसे यह लग गया था कि बताने से घर में एक असहज बात खड़ी हो जाती है और उसका कोई फ़ायदा नहीं है।

अमरनाथ ने भी पूछना छोड़ दिया। उसी बरस।

नीरू ने बीएड किया और वह उसी शहर के एक स्कूल में पढ़ाने लगी। यह दो हज़ार सत्रह में हुआ।

उस स्कूल में साल में चार बड़े कार्यक्रम होते हैं। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, वार्षिक समारोह, और बाल दिवस।

अमरनाथ अब रिटायर है। मिल भी बंद हो गई।

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दो हज़ार बीस से वह उन कार्यक्रमों में आता है।

वह बताकर नहीं आता। किसी को नहीं।

वह गेट से अंदर आता है, हॉल में सबसे पीछे की क़तार में बैठता है, और कार्यक्रम ख़त्म होने से दस मिनट पहले उठकर चला जाता है।

नीरू को यह छह बरस मालूम नहीं था। पूरे छह बरस।

इसका कारण साफ़ है और वह अजीब नहीं है। कार्यक्रम में पढ़ाने वाले लोग आगे होते हैं, मंच के पास, और उन्हें बच्चों को संभालना होता है। पीछे की क़तार में अभिभावक बैठते हैं और वहाँ चार सौ लोग होते हैं।

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उन छह बरसों में वह एक कार्यक्रम में चूका भी, और वह वही था जिसमें नीरू को सबसे आगे बुलाया गया था। दो हज़ार तेईस के वार्षिक समारोह में उसे दस बरस की सेवा का प्रमाण पत्र मिला और मंच पर उसका नाम बोला गया। उस दिन अमरनाथ नहीं आया, क्योंकि उसकी बहन के घर कोई काम था। यह उसे भी बाद में मालूम हुआ और उसने घर पर इसका ज़िक्र नहीं किया।

पता उसे पिछले बरस चला।

स्कूल का एक चपरासी है, जो वहाँ बीस बरस से है। उसने बात-बात में कह दिया कि आपके पिताजी हर बार आते हैं और आख़िर में जल्दी निकल जाते हैं।

नीरू ने उससे पूछा कि कब से।

उसने कहा कि जब से मैं देख रहा हूँ। छह बरस से।

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फिर उसने एक बात और बता दी, जो चपरासी ने बिना मतलब बताई और जो सबसे भारी थी।

पहले दो बरस अमरनाथ ने गेट पर पूछा था कि नीरू मैडम का कार्यक्रम कब है, और उसके बाद उसने पूछना बंद कर दिया, क्योंकि उसे तारीख़ें याद हो गई थीं।

नीरू ने उस दिन घर जाकर कुछ नहीं पूछा। एक शब्द नहीं।

अगले कार्यक्रम में, जो बाल दिवस था, उसने कार्यक्रम के बीच में एक बार पीछे देखा।

वह वहीं बैठा था, बाईं तरफ़ से तीसरी कुर्सी पर, और उसने नीरू की तरफ़ नहीं देखा।

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उसके बाद के तीन कार्यक्रमों में वह वहीं बैठा और हर बार दस मिनट पहले उठ गया।

नीरू ने उससे आज तक इस बारे में एक शब्द नहीं कहा।

इसकी वजह वह ख़ुद बताती नहीं है। जो बात वह कह सकती है, वह यह है कि पूछने पर वह आना बंद कर देगा, और यह डर सचमुच का है, क्योंकि वह ऐसा आदमी है।

एक बार उसने उसे रोकने की कोशिश भी की और वह अजीब तरीक़े से की। उसने कार्यक्रम के बाद चाय-नाश्ते का इंतज़ाम हॉल के बाहर करवाया, ताकि उठकर जाने वाले को वहीं रुकना पड़े। अमरनाथ उस दिन भी दस मिनट पहले उठा और उस मेज़ के बग़ल से निकल गया।

इस बीच घर में एक और बात हुई जो इसी से जुड़ी है।

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नीरू की बेटी अब चौथी में है और उसी स्कूल में पढ़ती है।

उसके कार्यक्रमों में अमरनाथ आगे बैठता है, दूसरी क़तार में, क्योंकि वह उसका नाना है और नाना आगे बैठते हैं।

वह वहाँ पूरे कार्यक्रम रहता है और तालियाँ बजाता है और बाद में जाकर बच्ची से बात करता है।

नीरू यह देखती है। हर बार देखती है।

इन दो चीज़ों में जो फ़र्क़ है, उसे दोनों में से कोई नहीं छेड़ता।

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पिछले वार्षिक समारोह में कुर्सियाँ लगाने का काम नीरू के ज़िम्मे था और उसने एक चीज़ की, जो किसी ने नहीं देखी।

उसने सबसे पीछे की क़तार में बाईं तरफ़ से तीसरी कुर्सी पर एक काग़ज़ चिपका दिया, जिस पर आरक्षित लिखा था, और वह काग़ज़ उसने ख़ुद लिखा था।

अमरनाथ आया और उस कुर्सी पर बैठ गया। उसने वह काग़ज़ उतारकर तह किया और अपनी जेब में रख लिया, और उस दिन भी वह दस मिनट पहले उठकर चला गया, और अगले कार्यक्रम में वह उसी कुर्सी पर बैठा, जिस पर कोई काग़ज़ नहीं था।