वह दुकान इकतालीस बरस में एक दिन बंद नहीं हुई थी।
बरतनों की दुकान थी, मुज़फ़्फ़रनगर के बाज़ार में, और ठाकुरदास ने उसे उन्नीस सौ पचासी में खोला था।
इकतालीस बरस में वह खुली रही। बीमारी में, शादियों में, दोनों बच्चों के इम्तिहानों में, और उस बरस भी जब उसके पिता नहीं रहे, जब उसने दोपहर तीन घंटे बंद रखकर बाक़ी दिन खोली।
उसका बेटा सूरजभान चार बरस से दुकान पर बैठ रहा था।
वह चौबीस का था और उसने बीकॉम किया था।
इतवार की छुट्टी की बात उसने पहली बार दो बरस पहले उठाई।
जो हुआ, वह बहस नहीं थी। ठाकुरदास ने उस दिन दुकान पर, चार ग्राहकों के सामने, आवाज़ ऊँची करके कहा कि जिस दिन शटर गिरेगा उस दिन ग्राहक दूसरी दुकान पर जाएगा और लौटेगा नहीं।
यह बात उस बाज़ार में ग़लत भी नहीं है।
सूरजभान ने उस दिन जवाब नहीं दिया।
उसने वह बात दो बरस में चौदह बार उठाई। यह गिनती उसकी माँ ने रखी, क्योंकि हर बार घर में शोर होता था।
हर बार वही होता था। सूरजभान हिसाब देता और ठाकुरदास आवाज़ ऊँची करता।
हिसाब सूरजभान का यह था। इतवार की बिक्री हफ़्ते की बिक्री का ग्यारह फ़ीसदी है, और उस दिन बाज़ार में भीड़ ज़्यादा और ख़रीदार कम रहते हैं। बाक़ी छह दिन में एक-एक घंटा ज़्यादा खोलकर वह ग्यारह फ़ीसदी निकल आएगा।
उसने यह हिसाब एक कापी में तीन बार बनाया, महीनों का, और हर बार वही निकला।
ठाकुरदास ने वह कापी एक बार भी नहीं देखी। खोली भी नहीं।
उसने जो कहा, वह हिसाब का नहीं था। उसने कहा कि दुकान बंद रखने की आदत ख़राब चीज़ है और एक बार लग जाए तो जाती नहीं।
यह भी पूरी तरह ग़लत नहीं है। दोनों बातें सही थीं।
बीच में एक बार सूरजभान ने चुपचाप कोशिश की भी। एक इतवार वह जान-बूझकर देर से पहुँचा, ग्यारह बजे, यह देखने के लिए कि दुकान अकेले चलती है या नहीं। ठाकुरदास उस दिन ग्यारह से पहले तीन ग्राहक निपटा चुका था और उसने इस पर कुछ नहीं कहा, और अगले इतवार सूरजभान ठीक वक़्त पर पहुँच गया।
पिछले नवंबर में सूरजभान अपने साले की शादी में सत्ताईस दिन के लिए हरिद्वार गया।
दुकान उन सत्ताईस दिन ठाकुरदास ने अकेले चलाई, जैसी वह इकतालीस बरस चलाता आया था। नौकर उसने नहीं रखा और किसी से मदद भी नहीं माँगी।
उसकी उम्र सड़सठ है। कमर पुरानी है।
सूरजभान लौटा और अगले इतवार सुबह दुकान पर पहुँचा।
शटर गिरा हुआ था। ताला लगा था।
वह घर गया और पूछा। सिर्फ़ इतना कि क्यों।
ठाकुरदास ने कहा कि आज इतवार है। बस इतना।
उसके बाद उसने कुछ नहीं कहा।
यानी वे सत्ताईस दिन में उसने चार इतवार अकेले खोले थे और पाँचवें से उसने बंद रखना शुरू कर दिया था, और लौटने पर लड़के को यह बताया नहीं गया।
सूरजभान ने उस दिन उससे कुछ नहीं पूछा और यह भी नहीं कहा कि मैं कहता था।
इसकी वजह उसकी समझदारी नहीं थी। उसे यह डर था कि पूछने पर वह बात हिसाब पर आ जाएगी और ठाकुरदास दोबारा दुकान खोलने लगेगा।
उस दिन घर में और किसी ने भी इस पर बात नहीं की। सूरजभान की माँ ने दोपहर के खाने पर एक बार यह कहा कि आज इतवार है, और यह उसने किसी से नहीं कहा, हवा में कहा, और उस पर दोनों में से किसी ने सिर नहीं उठाया।
दुकान अब हर इतवार बंद रहती है।
ग्राहक कम नहीं हुए। बिक्री का जो ग्यारह फ़ीसदी था, वह लगभग नौ बाक़ी दिनों में आ गया और दो का फ़र्क़ रह गया, जो सूरजभान के हिसाब से भी था।
पहले तीन इतवारों में सूरजभान ने दुकान खोलने की कोशिश की, यह देखने के लिए कि बात पक्की है या नहीं। तीनों बार ठाकुरदास ने उसे रोक दिया, और तीसरी बार उसने वही आवाज़ ऊँची की जो दो बरस दूसरी तरफ़ लगती थी, कि इतवार को दुकान नहीं खुलेगी। सूरजभान उस दिन हँस पड़ा और उसे यह छिपाना पड़ा।
एक बात जो घर में अब भी नहीं कही गई, वह यह है कि ठाकुरदास ने क्यों बदला।
सूरजभान का अंदाज़ा यह है कि सत्ताईस दिन अकेले चलाने में उसकी कमर ने जवाब दिया होगा। यह उसका अंदाज़ा है और उसने पूछा नहीं।
उसकी माँ का अंदाज़ा दूसरा है। उसके हिसाब से ठाकुरदास ने उन इतवारों में यह देखा कि दुकान बंद रखने पर बाज़ार में कुछ नहीं होता, और उसे यह सत्ताईस दिन में समझ आया, जो दो बरस में नहीं आया था।
दोनों में से कौन सही है, यह किसी को नहीं मालूम। पूछा भी नहीं गया।
इतवार को ठाकुरदास अब सुबह साढ़े नौ बजे तक सोता है, जो उसने इकतालीस बरस नहीं किया। दस बजे वह नहा-धोकर तैयार होकर बैठ जाता है, और फिर उसे कुछ करना नहीं होता, और वह दोपहर तक वैसे ही बैठा रहता है, और यह बात घर में सबको खटकती है और कोई कहता नहीं।