यशोदा उस शादी के ख़िलाफ़ थी। उसने वह छिपाया नहीं।
लड़का उसी शहर का नहीं था। वह छिंदवाड़ा की तरफ़ का था और यशोदा का घर बीकानेर में है।
उसका विरोध जाति का नहीं था। यह उस घर में सबको मालूम है। विरोध दूरी का था।
उसने अपनी बेटी से जो कहा, वह यह था कि तू नौ सौ किलोमीटर दूर चली जाएगी और बीमारी में मैं तेरे पास नहीं पहुँच सकूँगी।
यह बात उस वक़्त किसी को बड़ी नहीं लगी और आगे यह ठीक भी निकली।
शादी दो हज़ार बारह में हुई और यशोदा उसमें शामिल हुई।
उसने किसी के सामने बात नहीं बिगाड़ी। कन्यादान हुआ, विदाई हुई, और उसने वहीं खड़े होकर देखा।
जो उसने नहीं किया, वह यह था कि उसने कभी नहीं कहा कि वह ग़लत थी।
चौदह बरस में एक बार भी नहीं कहा।
बेटी का नाम नंदिनी है और उसकी शादी ठीक चली। पति अच्छा निकला और उसकी ससुराल में उसे कोई परेशानी नहीं हुई।
यशोदा ने यह देखा भी और माना भी। कहा नहीं।
यहाँ वह चीज़ है जो चौदह बरस चली और जिसका किसी ने ज़िक्र नहीं किया।
छिंदवाड़ा की तरफ़ खाने में कढ़ी बनती है और वह राजस्थान की कढ़ी से अलग है। उसमें बेसन कम होता है, खटास दही से आती है और अमचूर से नहीं, और उसमें पकौड़े नहीं डाले जाते।
नंदिनी को वह कढ़ी बचपन से नहीं मिली। उसे वह अपने ससुराल में मिली और वह उसे अच्छी लगने लगी।
पहली बार जब वह मायके आई, तीन महीने बाद, तो यशोदा ने अपनी वाली कढ़ी बनाई और नंदिनी ने उसे खाया और कुछ नहीं कहा।
दूसरी बार, आठ महीने बाद, यशोदा ने वही बनाई। बदला कुछ नहीं।
तीसरी बार जो बनी, वह दूसरी थी। अलग कढ़ी थी।
बेसन कम था। अमचूर नहीं था। पकौड़े भी नहीं थे।
नंदिनी ने उसे खाया और उसने पूछा कि यह कैसे बनाई।
यशोदा ने कहा कि बना ली। बस इतना।
बात यहीं ख़त्म हो गई और उसके बाद चौदह बरस में यशोदा ने वही कढ़ी बनाई, हर बार, जब नंदिनी आई।
जो उसने नहीं बताया, और जो नंदिनी को बहुत बाद में पता चला, वह तरीक़ा था।
बीकानेर के उसी मुहल्ले में एक परिवार महाराष्ट्र की तरफ़ का था और उनकी बहू छिंदवाड़ा के पास की थी। यशोदा उनके घर गई और उससे पूछा।
एक बार में वह नहीं आई। उसे चार बार जाना पड़ा और तीन बार वह कढ़ी ख़राब बनी, और वह उसने अपने घर वालों को खिलाई और नंदिनी को नहीं।
यह उसने दो हज़ार तेरह में किया, यानी शादी के एक बरस के अंदर।
उन चौदह बरसों में यशोदा ने और भी दो चीज़ें कीं और वे भी उसने बताई नहीं। उसने छिंदवाड़ा की तरफ़ के कुछ शब्द सीखे, जो नंदिनी के ससुराल में बोले जाते हैं, और फ़ोन पर उन्हें कभी-कभी इस्तेमाल किया। और उसने उस इलाक़े का मौसम याद रखना शुरू किया, यानी वहाँ बरसात कब आती है और गरमी कितनी पड़ती है, ताकि फ़ोन पर पूछ सके।
नंदिनी को यह दो हज़ार चौबीस में पता चला और वह भी उसी पड़ोसी की बहू से पता चला, जिसने बात-बात में कह दिया कि तेरी माँ हमारे यहाँ कढ़ी सीखने आई थी।
नंदिनी उस दिन घर आकर बैठ गई। कुछ नहीं पूछा।
उसने अगली बार पूछा। छह महीने बाद। सीधे पूछा।
यशोदा ने कहा कि हाँ। गई थी।
नंदिनी ने पूछा कि क्यों गई थीं।
उसने कहा कि तुझे वह अच्छी लगती थी। और कुछ नहीं।
यहीं वह बात आ गई जो चौदह बरस से नहीं आई थी और नंदिनी ने उसे पकड़ लिया।
उसने कहा कि आपको यह कैसे मालूम था कि मुझे अच्छी लगती है, मैंने तो कभी नहीं कहा।
यशोदा ने कहा कि तूने दूसरी बार वाली आधी छोड़ दी थी।
इसके आगे वह बातचीत नहीं गई। दोनों चुप हो गईं।
यशोदा ने उस दिन भी यह नहीं कहा कि उसका विरोध ग़लत था, और अब वह कहेगी भी नहीं, क्योंकि उसका विरोध ग़लत भी नहीं था। नंदिनी नौ सौ किलोमीटर दूर है और दो बरस पहले जब यशोदा गिरी थी, तब वह चौंतीस घंटे बाद पहुँची।
उस गिरने के बाद तीन हफ़्ते नंदिनी बीकानेर रही और उन तीन हफ़्तों में उसने रसोई संभाली। एक शाम उसने कढ़ी बनाई, राजस्थान वाली, पकौड़ों के साथ, और यशोदा ने उसे पूरा खाया और कुछ नहीं कहा। नंदिनी उस पर कुछ पूछने वाली थी और उसने नहीं पूछा।
दोनों को यह मालूम है और दोनों इस पर बात नहीं करतीं।
नंदिनी साल में दो बार आती है। दिवाली पर और गरमी की छुट्टी में।
दोनों बार पहले दिन की रात के खाने में कढ़ी बनती है, वैसी, और यशोदा उसे अब बिना सोचे बना लेती है। उस घर के बाक़ी लोगों को वह पसंद नहीं आती और वे उस रात दाल खाते हैं, और यह इंतज़ाम अब उस रसोई का नियम है और उस पर कोई बात नहीं होती।